मध्य पूर्व तनाव और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदेश के क्या मायने हैं? जानिए तेल संकट, अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता पर विशेष विश्लेषण।
मध्य पूर्व एशिया में विगत दो-तीन माह से युद्ध के चलते विश्व में बनी आर्थिक नाकेबंदी और आयात-निर्यात से जुड़े मसलों पर उहापोह की स्थिति ने दुनियाभर की अर्थव्यवस्था एवं आर्थिक गतिविधियों को बुरी तरह से प्रभावित किया है... आने वाले समय में अमेरिका-इजराइल-ईरान युद्ध क्या रूप लेगा और उसके भयावह परिणाम किस तरह से वैश्विक आर्थिक दशा-दिशा को प्रभावित करेंगे किसी से छुपा नहीं है... प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह दूरदृष्टि ही है कि उन्होंने युद्ध के हालात के बीच वैश्विक स्थितियों को ध्यान में रखकर पहले भी देशवासियों से आव्हान किया था और रविवार को उन्होंने तेलंगाना में 9400 करोड़ रुपए की विकास कार्यों के शिलान्यास के बाद सार्वजनिक मंच से जिस तरह से अमेरिका-ईरान युद्ध से बने तेल संकट पर चिंता जताई और यहां तक कहा कि भारत में तेल के कुएं नहीं हैं..
पेट्रोल-डीजल बचाने, एक वर्ष तक सोना की खरीदारी ना करें यहां तक कि विदेश घूमने जाने से बचने और किसानों को फर्टिलाइजर का उपयोग 50 प्रतिशत घटाने, ऑनलाईन तरीके से कार्यालयीन कार्यों को आगे बढ़ाने, वर्चुअली बैठकें करने का जो आव्हान किया है वह राष्ट्र को संभावित संकटों से बचाने की रणनीति का ही एक हिस्सा है.. क्योंकि युद्ध कहीं पर भी हो उसका दुष्प्रभाव स्थानीय नागरिकों के साथ ही विश्व के तमाम पक्षों पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता ही है... आज भारत में उसी मध्य पूर्व एशिया के युद्ध की तनावपूर्ण स्थितियों का असर दिख रहा है... हमारा आयात-निर्यात या तो घट गया है या फिर जस का तस रुका हुआ है इससे उत्पादन और वितरण के साथ ही बेरोजगारी जैसी समस्या को भी पैर पसारने का अवसर मिला है.. युद्ध की स्थितियों में भारत अपने आर्थिक, सामाजिक, राष्ट्रीय व उत्पादन निर्माण एवं की वितरण में संतुलन किस तरह से बनाए रख सकता है इसके लिए राष्ट्र सर्वोपरि भावना जरूरी है.
क्योंकि अनेक बार आपदा में अवसर ढूंढने वाले तत्व क्षणिक और छोटे स्वार्थ के कारण कालाबाजारी, अवैध भंडारण एवं दामों में आसमानी वृद्धि करके पूरी व्यवस्था को तहस-नहस करने का खेल खेलते हैं... जिससे स्थितियां नियंत्रण से बाहर होती चली जाती है... अमेरिका-ईरान युद्ध ने वैश्विक हालात पेचीदा किए हैं. इसी के चलते वैश्विक ऊर्जा संकट के कारण पेट्रोल-डीजल रसोई गैस की बाधित होती आपूर्ति ने हर तरह के उत्पाद निर्माण को प्रभावित किया है.. इससे मितव्ययता पूर्वक ही पार पाया जा सकता है... यह राष्ट्र प्रथम की कसौटी का संकट भी है जिसमें हर किसी की परीक्षा होनी है... तभी तो प्रधानमंत्री कह रहे है कि देशभक्ति का अर्थ केवल देश के लिए अपने प्राणों को बलिदान देना ही नहीं है बल्कि इस कठिन समय में जिम्मेदारी से जीना और देश के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन स्वयं की जीवनशैली में दिखे इस तरह के प्रत्येक व्यक्ति को प्रयास करना यही सबसे बड़ा राष्ट्रधर्म है…
युद्ध के चलते वैश्विक आर्थिक तंगहाल को ध्यान में रखकर देशवासियों की भी जवाबदेही बनती है कि आयात-निर्यात के कारण जो उत्पाद आपूर्ति बाधित हुई है उसको संतुलित करने के लिए देश में बने उत्पादों को अपनाएं... देश में निर्मित सामग्रियों खाद्य तेल, इलेक्ट्रानिक कारों का उपयोग बढ़ाने, निजी के बजाय आवागमन के लिए सार्वजनिक साधनों को उपयोग में लाने को प्राथमिकता देने... यही नहीं आने वाले समय में कृषि कृषकों के लिए भी चुनौतीपूर्ण स्थितियां निर्मित हो सकती हैं क्योंकि युद्ध के कारण रासायनिक उर्वरकों की आपूर्ति बाधित हुई है...अतः प्राकृतिक खेती को बढ़ाते हुए कम से कम रासायनिक खाद कृषकों को उपयोग करना होगा... ट्रांसपोर्ट, ऑनलाइन प्लेटफार्म, मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया, रसायनमुक्त खेती एवं स्वास्थ्य के लिए देशी उत्त्पाद को दैनंदिनी जीवनशैली में शामिल कर राष्ट्र की अनेक समस्याओं का समाधान देशवासी अपने दायित्व निर्वाह कर सकते हैं...