जेन जी के उदय के कारण भारतीय चुनावों में शिक्षा और रोजगार के मुद्दे प्राथमिकता पा रहे हैं, जिससे राजनीतिक दलों पर नया दबाव बन रहा है।
युवाओं की बढ़ती आबादी के मद्देनजर 'युवा भारत' के नारे सुने जाते रहे हैं, लेकिन उन्हें बेहतर शिक्षा और उपयुक्त रोजगार देकर देश के विकास की मुख्यधारा का इंजन बनाने की योजना सामने नहीं आई। हां, देश और प्रदेशों में अंतहीन पेपर लीक और भर्ती घोटालों की तलवार अक्सर युवाओं के भविष्य पर लटकी नजर आई। कटु सत्य यह भी है कि देश का भविष्य कहे जाने वाले युवाओं के भविष्य से इस खिलवाड़ पर छात्रों-युवाओं के नाम पर बने राजनीतिक दलों के संगठन भी मूकदर्शक बने रहे।
अंतिम परिणति तो नतीजे ही बताएंगे, लेकिन 'जेन जी' के जंतर-मंतर प्रयोग ने चुनावी सिलेबस बदल दिया है। इसका दबाव राजनीतिक दलों-नेताओं पर दिख रहा है। नौकरी देने के अधूरे वायदों के अलावा याद नहीं पड़ता कि देश में कभी शिक्षा, परीक्षा और रोजगार जैसे मूलभूत मुद्दों को शासकीय तो दूर, चुनावी एजेंडे में भी प्राथमिकता मिली हो। युवाओं की बढ़ती आबादी के मद्देनजर 'युवा भारत' के नारे सुने जाते रहे हैं, लेकिन उन्हें बेहतर शिक्षा और उपयुक्त रोजगार देकर देश के विकास की मुख्यधारा का इंजन बनाने की योजना सामने नहीं आई। हां, देश और प्रदेशों में अंतहीन पेपर लीक और भर्ती घोटालों की तलवार अक्सर युवाओं के भविष्य पर लटकी नजर आई। कटु सत्य यह भी है कि देश का भविष्य कहे जाने वाले युवाओं के भविष्य से इस खिलवाड़ पर छात्रों-युवाओं के नाम पर बने राजनीतिक दलों के संगठन भी मूकदर्शक बने रहे।
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का ऑनलाइन जन्म सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी के चलते हुआ, लेकिन जंतर-मंतर पर और उसके बाद उसे मिल रहा समर्थन छात्रों और युवाओं के मुद्दों की अनवरत अनदेखी का परिणाम भी है। बेशक जंतर-मंतर पर और उसके बाद भी सीजेपी से कुछ राजनीतिक दलों-नेताओं का मेलजोल नजर आ रहा है, लेकिन इस सच से मुंह नहीं चुराया जा सकता कि देश के सभी दलों के शासन वाले राज्यों में पेपर लीक और भर्ती घोटाले होते रहे हैं। इसीलिए अब छात्र और युवा, जाति-धर्म-क्षेत्र-राजनीतिक रुझान की सीमाएं लांघकर शिक्षा, परीक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर कमोबेश सभी राज्यों में सड़क पर उतर रहे हैं।
जंतर-मंतर के बाद झारखंड में भी छात्रों-युवाओं का सफल आंदोलन और उसका राजनीतिकरण दिखा, तो अब स्कूली शिक्षा की बदहाली के विरुद्ध राज्य-दर-राज्य 'जेन अल्फा' के भी सड़क पर उतरने की खबरें हैं। जिन छात्र-छात्राओं को स्कूल-कॉलेज की कक्षाओं में होना चाहिए, उनका सड़क पर उतरना देश-समाज की सकारात्मक तस्वीर पेश नहीं करता, पर उन्हें व्यवस्था ने ही मजबूर किया है।
जिस देश में बच्चों को स्कूल आने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से 'मिड डे मील' जैसी योजना चलायी जा रही हो, वहां विलय के नाम पर लगभग एक लाख स्कूल बंद कर दिया जाना शिक्षा के अधिकार और 'नेबरहुड स्कूल' की सोच के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता पर सवालिया निशान है। यह स्थिति ग्रामीण भारत में ज्यादा है। जिस राजस्थान में स्कूल का निरीक्षण करने गए सीजेपी कार्यकर्ताओं और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष की खबरें आईं, वहां 611 स्कूल बिना इमारत के चलने का आंकड़ा है। जिस स्कूल के निरीक्षण पर विवाद हुआ, वह एक तबेले में चल रहा था, जिसे अब स्थानांतरित कर दिया गया है।
बिना भवन और पर्याप्त शिक्षकों के स्कूल चलने की शिकायतें देश भर में आम हैं, पर उनका निराकरण करने के बजाय बिना अनुमति स्कूल में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। व्यवस्था की दृष्टि से यह प्रतिबंध उचित लग सकता है, पर स्कूल की खामियां देखने-दिखाने की अनुमति भला कौन-सा प्रशासन देगा? कुछ राज्यों से स्कूल के बच्चे पैदल जिला मुख्यालय पहुंचकर स्कूल की बदइंतजामी प्रशासन को बताने की खबरें भी यही बताती हैं कि निगरानी जिनकी जिम्मेदारी है, वे अपना काम नहीं कर रहे।
हमारे यहां निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की त्रिस्तरीय व्यवस्था है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था की बदहाली के लिए निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकते। यही स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की है। सरकारें आंकड़ों की बाजीगरी में माहिर होती हैं। इसलिए आंकड़े जो भी कहें, सच यह है कि छात्र-शिक्षक और नागरिक-चिकित्सक अनुपात 'विकसित भारत' के सपने से मेल हरगिज नहीं खाता। स्कूल शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद हैं।
बुनियाद ही बदहाल है तो उस पर बनने वाली इमारत के हाल की कल्पना ही की जा सकती है। कुछ छात्र मेहनत और किस्मत से प्रतियोगी परीक्षाओं की दहलीज तक पहुंच जाते हैं तो पेपर लीक और भर्ती घोटाले सपने चकनाचूर करने का चक्रव्यूह रचे तैयार मिलते हैं। पेपर लीक के लिए अक्सर कोचिंग माफिया पर उंगली उठती है। बेशक कोचिंग का दिन दूना-रात चौगुना फैलता कारोबार पाक-साफ नहीं है, पर उसके लिए निगरानी तंत्र बनाने की जिम्मेदारी किसकी है? राजनीतिक, पुलिस और प्रशासनिक संरक्षण के बिना ही कोचिंग माफिया इतना ताकतवर हो गया? शिक्षा-परीक्षा तंत्र के राजनीतिकरण से कौन-सा दल और सरकार इनकार कर सकती है? तमाम राजनेता शिक्षण संस्थान चला रहे हैं, तो कारोबारियों को भी शिक्षा क्षेत्र का मोटा मुनाफा आकर्षित कर रहा है। राजनीतिकरण और भ्रष्टाचार से ग्रस्त शिक्षा-परीक्षा तंत्र से निष्पक्षता और पारदर्शिता की अपेक्षा ही बेमानी है।
राज्य-दर-राज्य अदालत में चुनौती दी गईं या रद्द कर दी गईं भर्तियों की फेहरिस्त बहुत लंबी बन सकती है, पर वह नौबत तो तभी आती है, जब प्रक्रिया दोषपूर्ण रहे। आखिर दो दशक पहले भी प्रतियोगी परीक्षाएं और भर्ती होती थीं। बेशक तब भी नकल और पेपर लीक के मामले आते थे। भर्तियों में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोप भी लगते थे, पर अपवाद स्वरूप। अब तो यह परंपरा-सी बन गई है।
अभ्यर्थियों के भविष्य से खिलवाड़ हमारी व्यवस्था का 'प्रिय शगल' बन गया लगता है। पेपर लीक हो गया तो दोबारा करा देंगे। दोबारा भी लीक हो गया तो तीसरी बार करा देंगे। बेरहम तर्क यह कि छात्र योग्य हैं तो उन्हें दूसरी-तीसरी बार परीक्षा देने में क्यों समस्या होनी चाहिए? दरअसल, जंतर-मंतर प्रयोग सरकारी तंत्र की इसी गैर-जिम्मेदार सोच पर वार था, पर सीजेपी और 'जेन जी' जानते हैं कि सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे से शिक्षा-परीक्षा तंत्र ठीक होने वाला नहीं।
इसलिए अब स्कूलों से ही व्यवस्था को दुरुस्त करने की मुहिम शुरू हुई है। शिक्षा और परीक्षा के बाद लक्ष्य रोजगार ही है। इसलिए भर्ती प्रक्रिया भी निष्पक्ष और पारदर्शी होना जरूरी है, ताकि उसे अदालत में चुनौती देने की जरूरत ही न पड़े। यह काम आसान नहीं है। दशकों में बिगड़ी शिक्षा-परीक्षा व्यवस्था चंद दिनों में दुरुस्त नहीं हो सकती। इसे दुरुस्त करने की जिम्मेदारी भी उसी तंत्र पर है, जिस पर इसे बिगाड़ने के आरोप हैं, पर सकारात्मक संकेत यह है कि इस बाबत 'जेन जी' और 'जेन अल्फा' का दबाव सभी दल-नेता महसूस कर रहे हैं।
यह उनकी अंतरात्मा अचानक जाग जाने का परिणाम नहीं है। इसके मूल में है 'जेन जी' की चुनावी ताकत। अगले साल जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां 18 से 29 साल के 'जेन जी' मतदाता लगभग 22 प्रतिशत हैं। इनकी ताकत का अंदाजा इस आंकड़े से लगाया जा सकता है कि पिछले चुनाव में इन राज्यों की ढाई सौ से ज्यादा सीटों पर हार-जीत का अंतर पांच प्रतिशत से भी कम था। जाति-धर्म-क्षेत्र और राजनीतिक विभाजन से मुक्त नजर आ रही 'जेन जी' ने किसी एक ओर रुख कर लिया तो चुनाव उधर ही पलट जाएगा।
महत्वपूर्ण आंकड़ा यह भी है कि अगले लोकसभा चुनाव तक 'जेन जी' मतदाताओं का प्रतिशत 29 हो जाएगा। इसीलिए हर दल और नेता अपने-अपने अंदाज में 'जेन जी' को रिझाने में जुटा है। चुनावी सिलेबस में अचानक आए इस बदलाव का असर चुनाव घोषणापत्रों से लेकर टिकट वितरण तक दिखेगा, जो एक सकारात्मक संकेत है।

राजकुमार सिंह
(लेखक दैनिक ट्रिब्यून के पूर्व संपादक हैं)