रावण-वध के बाद रामजी को अयोध्या लौटने में पूरे बीस दिन लगे। यह अवधि अनावश्यक विलंब अथवा विजय-उत्सव की नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष और प्रत्येक समाज को समरसता के सूत्र में पिरोने की थी। इसका वर्णन रामचरितमानस में मिलता है। रावण-वध अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को हुआ, जबकि रामजी कार्तिक मास की अमावस्या को अयोध्या लौटे। इन दोनों तिथियों के बीच बीस दिन का अंतर है। इस अवधि में रामजी लंका में नहीं रुके थे। वे केवल दो दिन वहाँ रहे। रावण-वध के बाद वे नगर में नहीं गए, बल्कि अपने सैन्य शिविर में ही रहे।
उन्होंने विभीषण से युद्ध में मारे गए रावण सहित सभी परिजनों का अंतिम संस्कार करने को कहा। इसमें एक दिन लगा। अगले दिन विभीषण का राज्याभिषेक हुआ। इसके बाद विभीषण सीता माता को सम्मानपूर्वक लेकर रामजी के पास आए। वे भेंट और पुष्पक विमान भी लाए, ताकि रामजी शीघ्र अयोध्या लौट सकें।
पुष्पक विमान साधारण नहीं, दिव्य था। वह पवन से भी तीव्र गति से चल सकता था और उसमें यात्रियों की संख्या बढ़ने के साथ बैठने की क्षमता का विस्तार हो सकता था। रामजी उसी संध्या लंका से चल दिए, लेकिन अयोध्या पहुँचने में उन्हें अठारह दिन लगे। रामजी ने लौटने के लिए वही मार्ग चुना, जिससे वे लंका गए थे। यात्रा में वे उन सभी वन्य और ग्राम्य क्षेत्रों के निवासियों से मिले, जिनसे जाते समय मिले थे। वे उन ऋषि-आश्रमों में गए, जहाँ पहले गए थे और सभी समाज-प्रतिनिधियों से भेंट कर वनवासियों से लेकर ऋषियों तक को अयोध्या आने का आमंत्रण दिया। भील, निषाद और किरात समाजों के जो प्रमुख साथ चलने को तैयार हुए, उन्हें पुष्पक विमान में बैठा लिया। रामजी ने प्रत्येक स्थान पर एक-एक रात्रि भी बिताई। इसी कार्य में उन्हें अठारह दिन लगे। इन अठारह दिनों में रामजी ने पूरे भारत और सभी समाजों को स्वयं से जोड़ा तथा सबको परस्पर जुड़ने का संकल्प भी दिलाया। दानवी शक्तियाँ सात्विक समाज के बिखराव का लाभ उठाती हैं। समाज संगठित, जागरूक और एक सूत्र में आबद्ध हो तो आसुरी शक्तियाँ प्रभावी नहीं हो सकतीं। इसके साथ रामजी ने यह संदेश भी दिया कि उन लोगों के प्रति सदैव आभार का भाव रखना चाहिए, जो असामान्य परिस्थितियों में सहयोगी बनते हैं।
दीपोत्सव की तैयारी में भी संपूर्ण समाज के एक सूत्र में बंधने की झलक
रामजी ने श्रीलंका से अयोध्या लौटने की यात्रा में जो संदेश दिया था, वही आज भी दीपावली की तैयारियों में झलकता है। रामजी के लौटने पर केवल दीप जलाने की परंपरा होती तो यह कार्य एक ही दिन में हो सकता था। दीपावली पाँच दिन का त्योहार है और इसकी तैयारी में अठारह-बीस दिन लगते हैं। यह उत्सव और उसकी तैयारी समाज के प्रत्येक वर्ग को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से एक सूत्र में जोड़ती है। साफ-सफाई, लिपाई-पुताई, पुरानी वस्तुओं को हटाने और नई वस्तुओं की खरीद में सभी वर्गों की भागीदारी रहती है। घर की झाड़ू से लेकर स्वर्णाभूषण तक खरीदे जाते हैं और समाज के हर वर्ग को भेंट दी जाती है। दीपावली पूजन में आवश्यक मानी गई वस्तुओं का संबंध भी समाज के प्रत्येक शिल्प समूह से है।
रामजी ने लौटते समय संपूर्ण समाज को एकत्व का यही संदेश दिया कि भारतीय समाज संगठित और परस्पर सहयोगी रहे। तभी आसुरी शक्तियों से सभ्य-सुसंस्कृत समाज सुरक्षित रह सकता है। समाज को जोड़ने और जुड़ने की यह प्रक्रिया आज भी यथावत है। साफ-सफाई और लिपाई-पुताई से लेकर नए वस्त्र, बर्तन, आभूषण तथा घर-भवन सजाने की वस्तुओं की खरीद तक, हर गतिविधि से किसी न किसी को काम मिलता है। इससे हर हाथ को काम मिलता है और सब एक-दूसरे का महत्व समझते हैं। तभी सबकी दीवाली मनती है।
भारतीय संस्कृति मानवीय मूल्यों को महत्व देती है। त्योहारों का संदेश है कि विभिन्न समाजों और वर्गों के लोग परस्पर जुड़ें तथा एक-दूसरे के पूरक बनें। इसमें नगरवासी, ग्रामवासी और वनवासी का कोई भेद नहीं। भारतीय संस्कृति में जन्म, वर्ग, वर्ण अथवा जाति का भेद नहीं, उसका आधार गुण और कर्म हैं। इसीलिए निषाद, किरात और वनवासी सुग्रीव, सभी रामजी के मित्र हैं।
भूमि के हर हिस्से में एक जैसे फल-फूल या फसल नहीं होते, न हर पर्वत पर एक जैसी औषधि मिलती है, फिर भी सब एक-दूसरे के पूरक हैं। समाज की विविधता भी ऐसी ही है। प्राणियों की भाव-भाषा और जीवन-शैली में अंतर देश, काल और परिस्थिति के अनुरूप होता है। जीवन-शैली के विकास के साथ समूह, वर्ग और उपवर्ग बनते हैं, लेकिन आंतरिक स्वरूप में कोई अंतर नहीं होता। ग्राम और वन क्षेत्रों में रहने वाले भील, गोंड, कोल, कोरकू, माड़िया और मुंडा जैसे समुदाय रामायण काल में भी थे। उनके मानवीय सम्मान में कोई भेद नहीं था। तभी रामजी इन सभी समुदायों के बीच रहे और लौटते समय उनके मुखियाओं को पुष्पक विमान में अपने साथ अयोध्या लाए।
वृक्ष की शाखाएँ अलग-अलग दिशाओं में फैलती हैं और उसके फल का बीज दूसरे स्थान पर नया वृक्ष बन जाता है। इसी प्रकार समाज का विस्तार होता है। विश्व की संपूर्ण मानवता का केंद्रीय बिंदु एक ही है। रामजी का आचरण इसी भाव से भरा था और यही संदेश दीपावली की तैयारियों में भी निहित है।
रामायण काल को हजारों वर्ष बीत गए। दासत्व का अंधकार भी सैकड़ों वर्ष रहा, फिर भी भारतीय जीवन में यह परंपरा आज तक बनी हुई है। इसीलिए दीपावली पर केवल दीपोत्सव नहीं होता, बल्कि समूचे समाज का कायाकल्प होता है—धन से, श्रम से, परस्पर आदान-प्रदान से और भेंट-मिलाप से।
इस प्रकार विजयदशमी से दीपावली के बीच की यह बीस दिन की अवधि संपूर्ण राष्ट्र और समाज के विभिन्न वर्गों को परस्पर समरस होने, एक-दूसरे से जुड़ने और एक-दूसरे का पूरक बनने की अवधि है। यही भारतीय जीवन की सांस्कृतिक शक्ति का आधार है।

रमेश शर्मा
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)