जरा एक दृश्य की कल्पना करें कि किसी घर में कोई लड़का बेरोजगार बैठा है और उसे कहीं भी नौकरी नहीं मिल रही है। तो उसे कैसे ताने दिए जाएंगे? शायद ऐसे कि “बेटा, पड़ोस वाली शर्माजी का बेटा तो न जाने कब का नौकरी पर लग गया है और एक तू है कि अभी तक सीवी ही भेज रहा है?"
या फिर “अरे, मेरे जमाने में तो 22 साल की उम्र में शादी + जॉब + बच्चा हो जाता था। अब तुझे क्या मंगल ग्रह पर नौकरी चाहिए?” या फिर "लड़की देखनी है तो पहले नौकरी तो दिखा। फ्री में कौन देगा बेटी?" आदि आदि। मगर कल्पना करें कि अगर यह अमीर मातापिता के बेरोजगार बच्चे हैं तो? तो क्या होगा? तो शायद यह होगा कि अगर उद्योगपति हैं मातापिता तो उसे कोई रोजगार शुरू करवा देंगे या फिर नौकरीपेशा हैं तो जुगाड़ लगाकर नौकरी लगवा देंगे। मगर यदि यह कहा जाए कि बच्चे फुल टाइम चिल्ड्रन बन गए हैं तो? और मातापिता की सेवा कर रहे हैं और बदले में उनसे वेतन ले रहे हैं?
शायद आप यकीन न करें! मगर टूटते परिवारों वाले कथित विकसित देशों में यह संभव है। तो आइए जानते हैं कि यह सब क्या है और कहाँ हो रहा है?
चीन में फुल टाइम चिल्ड्रन
यह कहानी है कथित रूप से आर्थिक रूप से विकसित और अनुशासित देश मानते हैं, वहां एक दिलचस्प नया पेशा उभर रहा है – ‘फुल टाइम चिल्ड्रेन’ यानी पूर्णकालिक बेटा या बेटी। भारत में संतान सहज ही अपने मातापिता की सेवा करती है। इसके लिए उसे कोई पैसा नही चाहिए होता है। मगर चीन में?
चीन में जो यह ट्रेंड चलन में आया है उसमें युवा जानबूझकर नौकरी की तलाश छोड़कर घर लौट आते हैं। उनके काम क्या हैं? माता-पिता के साथ समय बिताना, घर के कामकाज संभालना, उनकी डाक्टरी अपॉइंटमेंट फिक्स करना, घुमाना-फिराना और भावनात्मक सहारा देना। बदले में माता-पिता उन्हें मासिक वेतन देते हैं – औसतन 4000 से 8000 चीनी युआन (लगभग 45,000 से 90,000 रुपये)।
अब यह कल्पना से परे है कि बच्चे अपने मातापिता की सेवा करने, उनके साथ समय बिताने और उन्हें भावनात्मक रूप से सहारा देने के लिए सैलेरी लें? यह बाजारवाद का चरम है। यह परिवार के लिए सबसे घातक है, क्योंकि बच्चे इसलिए अपने मातापिता के पास नहीं रुक रहे हैं, कि उन्हें अपने मातापिता से प्यार है, बल्कि वे इसलिए रुक रहे हैं क्योंकि उनके पास काम करने के लिए कोई नौकरी नहेन है या फिर वे 996 वाले फॉर्मूले पर कॉर्पोरेट्स में नौकरी नहीं करना चाहते हैं।
और चीन मे बेरोजगारी की बढ़ती दर के चलते युवा यह करने के लिए मजबूर हुए हैं। ताजे आँकड़े और भी भयावह इशारा करते हैं। चीन में मार्च 2026 में 16-24 साल के शहरी युवाओं (छात्रों को छोड़कर) की बेरोजगारी दर 16.9 प्रतिशत पहुंच गई, जो फरवरी के 16.1 प्रतिशत से बढ़ी है। यह आंकड़ा नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स का है। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार 2025 में यह दर साल भर औसतन 15-18 प्रतिशत के आसपास रही, जबकि 2023 में यह 21.3 प्रतिशत के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गई थी। हर साल लगभग 1.2 करोड़ से अधिक ग्रेजुएट्स जॉब मार्केट में प्रवेश करते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा और बढ़ जाती है।
और एक तरफ भारत का एक बहुत बड़ा वर्ग है जिसकी सुबह शायद चीन के मुर्गे के द्वारा बांग किये जाने पर ही होती है, और जो चीन की इस समस्या और परिवार के मूल्यों के इस पतन पर कुछ नहीं कहता है।

सोनाली मिश्रा