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Bulldozer Politics And Cities

बंगाल से बांद्रा, बुलडोजर और बवाल

विजयमनोहरतिवारी


बंगाल से बांद्रा बुलडोजर और बवाल

Bulldozer Action From bengal To Bandra |

विजयमनोहर तिवारी

 

बंगाल से बांद्रा तक बीते दशकों में सरकारी जमीनों पर हुए कब्जों के खिलाफ एक मुहिम छिड़ी हुई है। इस संदर्भ में क्या आपने ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा के प्रवक्ता हाफिज गुलाम सरवर एक ताजा बयान सुना है? 

मुंबई यात्राओं के दौरान मैं बांद्रा के होटल रंगशारदा और मरीन ड्राइव पर सी-ग्रीन में रुकते हुए अक्सर खाली शामों को जुहू-बांद्रा के तटों और खार-अंधेरी की तंग गलियों में घूमता रहा हूँ। इन इलाकों में मुंबई की चमकदमक से परे एक अलग ही शहर पसरा हुआ देखा। रेल पटरियों से सटे टीन-टप्परों के चार मंजिला ऊंचे शेड, जो दरअसल कारखाने या रहने के ठिकाने बनते गए। ज्यादातर यूपी, बिहार और बंगाल के इलाकों से 40 साल पहले कोई एक आया था। अब उसी के चार सौ रिश्तेदार यहाँ दस बस्तियों में जमा हैं। धरावी एशिया की सबसे बड़ी स्लम तो यहाँ है ही, मुंबई के सारे उपनगरों में धरावी का संक्रमण तेजी से फैला हुआ है। बेरोकटोक सुनियोजित कब्जों की खुली कहानी, घुसपैठियों के लिए जन्नत बनती गई!

कोलकाता तो पूरा कबाड़खाना ही बन चुका है, जहाँ आप एक मरते हुए शहर की साँसें अनुभव कर सकते हैं। फुटपाथ और रेलवे स्टेशनों पर ऐसे कब्जे देश में शायद ही कहीं और देखने को मिलें, जैसी ईजाद बंगाल में हुई और यह किसी एक सरकार का योगदान नहीं है। सीपीएम के सत्ता में आते ही सबै भूमि जैसे हजरत लाल सलाम की हो गई। कब्जों से वसूली का मालदार नेटवर्क बाद में टीएमसी के खातों में जुड़ गया और कोलकाता अपने पुराने वैभव के साथ मरता रहा। आप गाँधी मार्ग के दोनों ओर की गलियों में घूमिए, ढाका और इस्लामाबाद के दीदार दूर-पास से होते ही रहेंगे। जैसे कानून नाम की कोई चीज ही नहीं बची थी।
एक बात साफ है कि भारत के ग्रामीण और जनजातीय समाज के लोगों का पलायन केवल मजदूरी के लिए है, जो आपको बंगाल से बांद्रा तक के संगठित और ताकतवर कब्जाधारियों में शायद ही कहीं दिखाई दें। वे असंगठित क्षेत्र की लेबर हैं, जो इन्फ्रास्ट्रक्चर के प्रोजेक्ट्स, खदानों और कारखानों में खपती है। कुछ महीनों के बाद लौट-लौटकर अपने गाँवों में आती रहती है। बुलडोजरों के निशाने पर आ रही यह एक अलग ही दुनिया है, हाफिज सरवर इसी की ओर इशारा कर रहे हैं। 

बंगाल और बांद्रा के कब्जों में डेमोग्राफी बदलने का संगठित पैटर्न साफ है, जो हर जगह दिन की रोशनी जैसा स्पष्ट है। एक ही शहर में पुरानी तंग बस्तियों के बाशिंदे रोजगार और कमाई के लिए नए विकसित होते इलाकों पर निर्भर हैं। शहरों का कोई फुटपाथ, कोई खाली जमीन, कोई नदी-नाले, पुल-पुलिया या कोई सरकारी जमीन इनसे सुरक्षित नहीं है। बहुत मामूली स्तर पर किसी धर्मस्थल के लिए कब्जाई गई जमीन पर केवल तीस साल में मेले का मजमा दिखाई देगा मगर यह गुनगुने पानी के लगातार बढ़ते तापमान जैसा परिवर्तन होगा, जिसमें बैठा मेंढक अपने अंत से बेखबर है। गैरकानूनी ढँग से फैलने-पसरने की लत कैसे और किन्होंने लगाई, हाफिज सरवर से सुनिए।

मध्यप्रदेश में लोकल फंड ऑडिट के डायरेक्टर डॉ. रमेश केवलिया नगर निगमों को 'नरक निगम' कहा करते थे। वे ऐसा केवल स्थानीय निकायों में व्याप्त भयावह भ्रष्टाचार के कारण कहते थे। नगरीय निकायों की अनदेखी या मिलीभगत लगातार बढ़ते कब्जों का मूल कारण है, जो सियासी संरक्षण के बिना संभव नहीं है। अदालतों के आदेशों की अवहेलना वर्ना कैसे मुमकिन है? बंगाल और बांद्रा के दृश्य यह बता रहे हैं कि यह नरक फैलता जब तक भी रहे मगर एक दिन मजबूर होकर सरकारों को इनके खिलाफ खुलकर आना ही होगा। असम, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में हो सकता है कि बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा हो और असल में प्रशासन केवल अपनी सुविधा से ही कब्जों को हटाने में लगा हो, मगर शहरों को पूरी तरह नर्क में बदलने के पहले यह एक व्यापक अभियान में बदलना चाहिए।

कब्जों के खिलाफ बुलडोजर एक प्रतीक बन गया है, जिसे उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ से जोड़ दिया गया है। मगर 1991 में मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के समय बाबूलाल गौर ने भोपाल रेलवे स्टेशन के पास कुछ ऐसी ही शुरुआत सबसे पहले की थी। भोपाल को कानून के शासन का अहसास कराया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक सीनियर वकील ने मुझे बताया था कि आपातकाल के पहले संजय गाँधी ने त्रिवेणी के रास्ते में ऐसी ही एक नाजायज घनी बस्ती साफ कराई थी और किसी भी प्रकार के उपद्रव की आशंका को देख स्थानीय मजहबी नेताओं को आगे करने के लिए खुद दिल्ली से अचानक आए थे। 

कब्जों के विरुद्ध जारी मुहिम की तस्वीरें भले ही बंगाल और बांद्रा से आ रही हों मगर यह नजारा पूरे देश का है। शहरों में कब्जों की बाढ़ आई हुई है। हर खाली जमीन पर झुग्गियाँ जंगल सी उग रही हैं। हर फुटपाथ पर गुमटी-ठेले प्रकट हो रहे हैं। अगर गाँवों से लोग शहरों में पलायन कर रहे हैं तो इनके समाजशास्त्रीय अध्ययन होने चाहिए कि वो कौन लोग हैं, कहां से आते हैं, उनकी सामुदायिक पहचान क्या है, वे एकल पलायन में हैं या डेमोग्राफी के लक्ष्य से कोई संगठित पैटर्न काम कर रहे हैं। घरों की रोज सफाई घरों को रहने लायक बनाए रखती है। हमारे छोटे-बड़े शहरों की नियमित निगरानी और साफ-सफाई शहरों को रहने लायक रखेगी। वोट बैंक की राजनीति ने दशकों तक कूड़ा फैलने दिया और अब बांद्रा से उखड़ रहे कब्जाधारी कांग्रेस सांसद सुनील दत्त की रहमदिली को याद कर रहे हैं, जब उन्हें बेरोकटोक बसाया गया होगा। बंगाल में भी यही हाल है।

भारत की तेज गति से बढ़ती आबादी और असंतुलित विकास की नीतियों में गाँवों की अनेदखी अंतत: शहरों को ही नर्क बना रही है। बीस लाख आबादी की क्षमता के शहर दो गुनी से ज्यादा आबादी झेल रहे हैं। हर दिन ऑफिस टाइम में ट्रैफिक इसके सबूत दे रहा है। हर बाजार, सड़क और फुटपाथ पर कब्जे उबल रहे हैं। वे हमारे दैनिक जन-जीवन पर बुरा असर कर रहे हैं। हमारे शहर दमघोंटू चिल्लपौं में बदल गए हैं, जहाँ शहर कम और भीड़ अधिक है। यह असंतुलन पुलिस के लिए भी भारी पड़ रहा है क्योंकि हर तरह के अपराध बढ़ ही रहे हैं और कब्जाई गई जमीन पर किसी योजना से बसाए गए घुसपैठिए एक स्थाई खतरा बन रहे हैं। समय रहते इनसे न निपटा गया तो दस साल बाद हम जानेंगे कि केवल वोट बैंक को संगठित ताकत बनाकर किस दूरगामी योजना के तहत तबाही की तैयारी थी।

बहरहाल हालातों को देखते हुए हाफिज गुलाम सरवर इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि मुसलमानों को गैरकानूनी काम करने की लत लगा दी गई थी। सेक्युलर पार्टियों ने मुसलमानों का गलत इस्तेमाल किया इसलिए सबसे बड़े भुक्तभोगी वे ही हैं। दुकान मछली, मुर्गे या गोश्त की हो लाइसेंस तो चाहिए। अब भाजपा का चाबुक चल रहा है तो ऐसे कारोबारों में मुसलमानों की अधिकता होने से उन्हें ही परेशानी हो रही है। गैरकानूनी निर्माण, गैरकानूनी दुकान, गैरकानूनी तिजारत जैसे मामले बढ़ा दिए गए थे। इसी का खामियाजा आज भुगतना पड़ रहा है।

ये उन्हीं के शब्द हैं। और भी बहुत कुछ बोले हैं मगर मैं गुलाम सरवर के आधे घंटे के इस वीडियो से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। वह काबिले-गौर जरूर है!

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