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फिर से बैलेट पेपर की मांग

वोट लूट के लिए फिर से डिब्बों और कागज पर चुनाव की मांग

विपक्षी दलों ने भारतीय चुनावों में बैलेट पेपर की वापसी और ईवीएम की स्वतंत्र समीक्षा की मांग की है, यह कहते हुए कि निष्पक्ष चुनाव और जनता का विश्वास महत्वपूर्ण हैं।


वोट लूट के लिए फिर से डिब्बों और कागज पर चुनाव की मांग

AI |

आलोक मेहता

भारत में चुनाव केवल सरकार बदलने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा हैं। आज जब दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र लगभग 98 करोड़ मतदाताओं के साथ चुनाव कराता है, तब मतदान प्रणाली पर उठने वाला हर प्रश्न राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाता है। कई विपक्षी दलों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मांग की है कि देश में चुनाव फिर से बैलेट पेपर से कराए जाएं अथवा कम-से-कम इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए। उनका कहना है कि लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष चुनाव होना पर्याप्त नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया पर जनता का विश्वास भी पूरी तरह बना रहना चाहिए।

दिलचस्प तथ्य यह है कि कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भी चुनाव आयोग के साथ बैठक में मतपत्र प्रणाली की वापसी की मांग उठा चुके थे। इसके बाद इन्हीं दलों ने कई राज्यों के विधानसभा चुनाव जीतकर सरकारें भी बनाई। भाजपा का तर्क है कि कागजी मतदान पर लौटने का अर्थ बूथ कैप्चरिंग और मतपेटी लूट जैसी पुरानी समस्याओं की वापसी होगा। सरकार लगातार कहती रही है कि ईवीएम ने चुनाव प्रक्रिया को अधिक तेज, सुरक्षित और व्यवस्थित बनाया है।

निर्वाचन आयोग का स्पष्ट मत है कि भारतीय ईवीएम विश्व की सबसे सुरक्षित मतदान प्रणालियों में से एक है। आयोग के अनुसार, मशीनें इंटरनेट, वाई-फाई, ब्लूटूथ या किसी अन्य नेटवर्क से जुड़ी नहीं होतीं, इसलिए उन्हें दूर से हैक नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय भी कई महत्वपूर्ण मामलों में ईवीएम प्रणाली को संवैधानिक रूप से स्वीकार कर चुका है और पूर्ण रूप से बैलेट पेपर पर लौटने की मांग को अस्वीकार कर चुका है। इसलिए यह विवाद केवल तकनीक का नहीं, बल्कि चुनावी इतिहास, मतदाता के विश्वास और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का भी प्रश्न है।

एक समय भारत के अनेक राज्यों में चुनाव का अर्थ केवल मतदान नहीं, बल्कि हिंसा, बूथ कब्जा और मतपेटियों की लूट भी था। 1960 के दशक के उत्तरार्ध से लेकर 1990 के दशक तक, विशेष रूप से बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों और अन्य राज्यों में बूथ कैप्चरिंग चुनावी प्रक्रिया की सबसे बड़ी समस्या बन गई थी। हथियारबंद लोग मतदान केंद्रों पर कब्जा कर लेते थे, मतदान अधिकारियों को बंधक बना लेते थे, मतदाताओं को भगा देते थे और फिर बैलेट पेपरों पर एक ही उम्मीदवार के पक्ष में बड़ी संख्या में मुहर लगा देते थे। कई बार पूरी मतपेटी ही उठा ली जाती थी या बदल दी जाती थी।

यह केवल राजनीतिक आरोप नहीं था। संसद, चुनाव आयोग, न्यायालयों, मीडिया और अनेक चुनाव अध्ययन रिपोर्टों में इस समस्या का उल्लेख मिलता है। चुनाव आयोग को अनेक क्षेत्रों में मतदान रद्द कर पुनर्मतदान कराना पड़ता था। 1970 और 1980 के दशक में बिहार में बूथ कैप्चरिंग चुनावी शब्दावली का सामान्य हिस्सा बन गई थी। 1991 के लोकसभा चुनाव आतंकवाद, राजनीतिक हिंसा और बूथ लूट के कारण अत्यंत चुनौतीपूर्ण रहे। 1990 के दशक में हजारों संवेदनशील बूथों पर केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात करने पड़े।

हम जैसे पत्रकारों ने बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में हथियारों के बल पर मतपेटियां लूटे जाने की घटनाएं स्वयं देखी हैं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन ने चुनाव सुधारों के दौरान बूथ कब्जे को लोकतंत्र का सबसे बड़ा खतरा बताया। उनके कार्यकाल में चुनावी अनुशासन, आदर्श आचार संहिता का कड़ाई से पालन, चुनावी खर्च पर निगरानी, केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती, संवेदनशील बूथों की पहचान, मतदान अधिकारियों की सुरक्षा और फर्जी मतदान रोकने के लिए पहचान व्यवस्था को मजबूत किया गया। उनका प्रसिद्ध कथन था "चुनाव आयोग संविधान से शक्ति प्राप्त करता है, सरकार से नहीं।" इन सुधारों ने चुनावी हिंसा पर काफी हद तक नियंत्रण स्थापित किया, लेकिन जब तक मतदान कागज पर होता रहा, तब तक मतपेटियों और बैलेट पेपरों पर कब्जे की आशंका बनी रही। यहीं से तकनीकी समाधान पर गंभीर विचार प्रारंभ हुआ।

1982 में केरल के परूर विधानसभा क्षेत्र के कुछ मतदान केंद्रों पर पहली बार ईवीएम का प्रयोग किया गया। बाद में कानूनी संशोधनों के बाद 1998 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में सीमित स्तर पर इसका उपयोग हुआ। प्रयोग सफल रहने के बाद चुनाव आयोग ने इसका विस्तार किया और 2004 का लोकसभा चुनाव भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर बन गया, जब पूरे देश में पहली बार सभी मतदान केंद्रों पर ईवीएम से मतदान कराया गया। यह विश्व का सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक चुनाव था।

उल्लेखनीय है कि इसी चुनाव में कांग्रेस सत्ता में आई और लगातार दस वर्ष तक केंद्र में रही। बाद के वर्षों में भी कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दल विभिन्न राज्यों में चुनाव जीतकर सरकारें बनाते रहे। आज भी अनेक राज्यों में गैर-भाजपा सरकारें हैं। इसके बावजूद हरियाणा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चुनावी पराजय के बाद कांग्रेस और उसके सहयोगी दल चुनाव आयोग तथा ईवीएम पर प्रश्न उठाने लगे। कहावत है "नाच न जाने, आंगन टेढ़ा।" जनता यदि किसी दल को नकार दे, तो उसका कारण उसकी राजनीतिक कमजोरियां भी हो सकती हैं, केवल चुनाव प्रणाली नहीं।

अधिकांश चुनाव विशेषज्ञ मानते हैं कि ईवीएम ने बैलेट पेपर के दौर वाली व्यापक मतपेटी लूट, हजारों मतपत्रों पर एक साथ मुहर लगाने और बूथ कब्जे के प्रभाव को काफी हद तक सीमित किया है। यदि कोई समूह कुछ समय के लिए बूथ पर कब्जा भी कर ले, तो ईवीएम की मतदान गति और नियंत्रण प्रणाली के कारण वह बैलेट पेपर की तरह बड़ी संख्या में तुरंत वोट दर्ज नहीं करा सकता।2017 में चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को चुनौती दी थी कि यदि कोई निर्धारित शर्तों के भीतर अधिकृत भारतीय ईवीएम में छेड़छाड़ सिद्ध कर दे, तो आयोग उस पर विचार करेगा। आयोग का कहना है कि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कोई भी दल ऐसा सिद्ध नहीं कर सका।

यदि भारत आज फिर पूरी तरह बैलेट पेपर पर लौटता है, तो करोड़ों मतपत्र छापने, लाखों मतपेटियां तैयार करने, उनके परिवहन, सुरक्षा और लंबी मतगणना की विशाल व्यवस्था करनी होगी। दूसरी ओर, यदि ईवीएम प्रणाली जारी रहती है, तो चुनाव आयोग पर यह दायित्व रहेगा कि वह पारदर्शिता, सार्वजनिक संवाद और तकनीकी परीक्षणों के माध्यम से जनता का विश्वास लगातार मजबूत करे।

लोकतंत्र का मूल उद्देश्य किसी एक तकनीक का समर्थन या विरोध नहीं, बल्कि मतदाता के विश्वास की रक्षा करना है। भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति बैलेट पेपर या ईवीएम नहीं, बल्कि मतदाता का विश्वास है। यदि संस्थाएं पारदर्शी, उत्तरदायी और निष्पक्ष रहें, तो तकनीक लोकतंत्र की सहायक बनती है; यदि विश्वास कमजोर पड़ जाए, तो कोई भी तकनीक विवादों से मुक्त नहीं रह सकती। इसलिए भारत की सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास दिलाना है कि उसका मत सुरक्षित, गोपनीय और निर्णायक है।

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