हालिया पाकिस्तानी हवाई हमलों में अफगानिस्तान में 11 बच्चों की मौत हो गई, जिसे अफगानिस्तान और विश्व समुदाय ने गंभीरता से लिया है।
अनुराग तागड़े
अफगानिस्तान के कुनार, खोस्त और पक्तिका प्रांतों में हुए हालिया हवाई हमलों ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या किसी राष्ट्र की सुरक्षा नीति इतनी निर्मम हो सकती है कि उसमें बच्चों के जीवन का कोई मूल्य ही न रह जाए? अफगानिस्तान के तालिबान प्रशासन ने आरोप लगाया है कि पाकिस्तान की सेना द्वारा किए गए इन हवाई हमलों में 13 लोगों की मृत्यु हुई, जिनमें 11 बच्चे, एक महिला और एक वृद्ध व्यक्ति शामिल हैं। कई महिलाएं और बच्चे घायल भी हुए हैं। यदि ये आरोप सही हैं तो यह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध एक गंभीर अपराध है, जिसकी निंदा केवल अफगानिस्तान ही नहीं बल्कि पूरे विश्व समुदाय को करनी चाहिए।
दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा क्षेत्र बार-बार संघर्ष का केंद्र बनता रहा है। पाकिस्तान लगातार यह दावा करता रहा है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के आतंकवादी अफगानिस्तान की धरती का उपयोग करके पाकिस्तान के भीतर हमले करते हैं। दूसरी ओर अफगानिस्तान इन आरोपों को अस्वीकार करता है और पाकिस्तान पर अपनी संप्रभुता के उल्लंघन का आरोप लगाता है। लेकिन इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर निर्दोष नागरिकों और मासूम बच्चों का क्या दोष है?
किसी भी सभ्य समाज में युद्ध के भी नियम होते हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि सैन्य कार्रवाई के दौरान नागरिकों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि किसी अभियान में लगातार नागरिक हताहत हो रहे हैं, तो यह उस अभियान की वैधता और उसकी नैतिकता दोनों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। पाकिस्तान की सेना बार-बार आतंकवाद विरोधी कार्रवाई का तर्क देती है, किंतु जब परिणामस्वरूप बच्चों के शव सामने आते हैं, तब यह तर्क कमजोर पड़ जाता है।
वास्तव में पाकिस्तान आज जिस आतंकवाद की समस्या से जूझ रहा है, उसकी जड़ें उसी की दशकों पुरानी नीतियों में छिपी हैं। शीत युद्ध के दौर से लेकर अफगान संघर्ष तक पाकिस्तान की सत्ता और सैन्य प्रतिष्ठान ने अनेक कट्टरपंथी संगठनों को रणनीतिक साधन के रूप में देखा। तत्कालीन राजनीतिक और सामरिक लाभ के लिए जिन संगठनों को बढ़ावा दिया गया, वही आज पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं। यह इतिहास का ऐसा कटु सत्य है जिसे पाकिस्तान स्वीकार करने से बचता रहा है।
आज पाकिस्तान की स्थिति यह है कि एक ओर वह आतंकवाद का शिकार होने का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर दुनिया का एक बड़ा वर्ग यह प्रश्न पूछता है कि आखिर उन आतंकी संरचनाओं को खड़ा किसने किया था? यह विडंबना है कि जिस आग को कभी रणनीतिक लाभ के लिए प्रज्वलित किया गया था, वही आग आज पाकिस्तान के अपने घर को भी जला रही है। किंतु इस संकट का समाधान पड़ोसी देशों की सीमाओं पर बम बरसाकर नहीं निकाला जा सकता।
पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी इस पूरे परिदृश्य को और अधिक चिंताजनक बनाती है। देश वर्षों से गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। महंगाई, बेरोजगारी, विदेशी ऋण और मुद्रा अवमूल्यन ने आम नागरिकों का जीवन कठिन बना दिया है। कई बार आटा, चीनी और ईंधन जैसी बुनियादी वस्तुओं की कीमतों में भारी वृद्धि ने जनता को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया है। विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं पर निर्भरता ने पाकिस्तान की आर्थिक संप्रभुता को भी प्रभावित किया है। ऐसे समय में अपेक्षा यह थी कि पाकिस्तान अपनी ऊर्जा आर्थिक सुधार, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन पर केंद्रित करता। किंतु इसके विपरीत सीमा पार सैन्य तनाव और संघर्षों पर संसाधन खर्च किए जा रहे हैं।
इतिहास यह भी बताता है कि बाहरी संघर्षों का उपयोग कई बार आंतरिक समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए किया जाता है। जब किसी देश की अर्थव्यवस्था संकट में होती है, राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है और जनता का असंतोष उभरने लगता है, तब राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा विवादों को प्रमुखता देकर जनमत को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। पाकिस्तान के संदर्भ में भी ऐसे प्रश्न समय-समय पर उठते रहे हैं। हालांकि इसका अंतिम निर्णय इतिहास और तथ्य करेंगे, लेकिन यह स्पष्ट है कि सीमा पार सैन्य कार्रवाइयों से न तो आर्थिक संकट दूर होगा और न ही आतंकवाद की समस्या समाप्त होगी।
सबसे अधिक पीड़ादायक तथ्य यह है कि इस पूरे संघर्ष का सबसे बड़ा मूल्य बच्चे चुका रहे हैं। जिन बच्चों को विद्यालयों में होना चाहिए, वे युद्ध और हिंसा के बीच अपना बचपन खो रहे हैं। जिन परिवारों को भविष्य के सपने देखने चाहिए, वे अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार करने को विवश हैं। किसी भी समाज के लिए इससे बड़ी त्रासदी नहीं हो सकती।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें भी संकेत देती हैं कि सीमा पार संघर्षों का मानवीय प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। सैकड़ों नागरिकों की मृत्यु और घायल होने की घटनाएं बताती हैं कि स्थिति केवल सैन्य नहीं, बल्कि मानवीय संकट का रूप ले चुकी है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह संकट पूरे क्षेत्र की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
दक्षिण एशिया पहले ही गरीबी, अशिक्षा, जलवायु परिवर्तन और विकास संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में क्षेत्र को शांति, सहयोग और आर्थिक साझेदारी की आवश्यकता है, न कि नए संघर्षों की। पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों को यह समझना होगा कि युद्ध का कोई स्थायी विजेता नहीं होता। युद्ध केवल घाव देता है, पीढ़ियों को आघात देता है और विकास की संभावनाओं को नष्ट कर देता है।
विश्व समुदाय को भी इस घटना को केवल एक सीमावर्ती झड़प के रूप में नहीं देखना चाहिए। यदि वास्तव में नागरिकों, विशेषकर बच्चों की मृत्यु हुई है, तो इसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच होनी चाहिए। जवाबदेही तय होना आवश्यक है, क्योंकि दण्डहीनता भविष्य की त्रासदियों को जन्म देती है।
पाकिस्तान को यह स्वीकार करना होगा कि आधुनिक विश्व में सैन्य शक्ति से अधिक महत्व नैतिक शक्ति का है। किसी भी राष्ट्र की प्रतिष्ठा उसके हथियारों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से निर्धारित होती है कि वह सबसे कमजोर और सबसे असुरक्षित लोगों की रक्षा कितनी ईमानदारी से करता है। यदि सुरक्षा के नाम पर बच्चों का रक्त बहता है, तो वह सुरक्षा नहीं बल्कि नैतिक विफलता है।
आज आवश्यकता बमों की नहीं, विश्वास की है। आवश्यकता गोलियों की नहीं, संवाद की है। आवश्यकता सीमा पार हमलों की नहीं, साझा समाधान की है। क्योंकि अंततः युद्ध के मैदान में मरने वाले केवल सैनिक नहीं होते; वहां मानवता भी घायल होती है। और जब किसी संघर्ष में बच्चों के शव दिखाई देने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि कहीं न कहीं सभ्यता हार रही है। दक्षिण एशिया को इस हार से बचाना होगा। क्योंकि बच्चों के रक्त से न कभी युद्ध जीते गए हैं, न भविष्य का निर्माण हुआ है।