अफगानिस्तान में महिलाओं को जिस प्रकार से घरों में कैद करके रख दिया है, वे नौकरी पर नहीं जा सकती, वे पढ़ नहीं सकती। और वे मर्द डॉक्टर से भी सहज इलाज नहीं करा सकती हैं। अब ऐसे में यह भी सवाल खड़ा होता है कि क्या होगा यदि कोई महिला बीमार पड़ती है या फिर अन्य कोई आवश्यकता के लिए पेशेवर महिला की आवश्यकता होती है?
अब यूनीसेफ़ ने भी इसे लेकर चिंता जताई है। यूएन के चिल्ड्रन फंड ने मंगलवार को यह चेतावनी दी कि अगर अफगानिस्तान में बच्चियों की तालीम पर इसी तरह से पाबंदी लगी रही और महिला रोजगार पर इसी तरह से रोक लगी रही तो अफगानिस्तान में 2030 तक 25,000 से ज्यादा शिक्षिकाओं और स्वास्थ्य कर्मियों की कमी हो जाएगी और यूएन ने तालिबान अधिकारियों से अनुरोध किया कि वे लड़कियों की उच्च शिक्षा पर लगी रोक को हटा दें।
“The Cost of Inaction on Girls’ Education and Women’s Labour Force Participation in Afghanistan,” शीर्षक से जारी की गई एक नई रिपोर्ट में यूनिसेफ ने यह पाया कि जब से तालिबान ने लड़कियों की तालीम पर पाबंदी लगाई है, तब से लगभग एक मिलियन से अधिक लड़कियां तालीम से वंचित हो चुकी हैं।
और अगर इसी तरह पाबंदी लगी रही तो यह संख्या 2030 तक डबल हो जाएगी। इस रिपोर्ट में यह बताया गया है कि कैसे लड़कियों और महिलाओं की तालीम और काम पर लगी पाबंदी से देश को सालाना 84 मिलियन डॉलर्स का नुकसान हो रहा है।
यूनिसेफ ने यह भी चिंता जताई कि देश अभी दो तरह के खतरों से जूझ रहा है, एक तो शिक्षिकाओं और महिला स्वास्थ्य कर्मियों का अभाव और दूसरा कि उनकी जगह लेने के लिए नई बच्चियाँ भी तैयार नहीं हो प रही हैं। और इसका असर स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में विशेष रूप से गंभीर है, जहाँ सामाजिक परिवेश अक्सर महिलाओं को पुरुषों से चिकित्सा सेवाएँ लेने से रोकता है; इसका अर्थ है कि महिला स्वास्थ्य कर्मियों की घटती संख्या सीधे तौर पर मातृ, नवजात और शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को सीमित कर देगी।
अफगानिस्तान बालिकाओं की शिक्षा की दर के मामले में सबसे निचले पायदानों पर खड़े देशों में से एक है, और इसके बाद भी यह और भी गंभीर है कि यहा पर लड़कियों को आगे पढ़ने भी नहन दिया जा रहा है। जो यूनिसेफ का विश्लेषण है उसके अनुसार “अगर यह बैन 2030 तक जारी रहता है, तो 20 लाख से ज़्यादा लड़कियाँ प्राइमरी स्कूल के बाद अपनी शिक्षा के अधिकार से वंचित रह जाएँगी। स्कूल पहले ही प्रभावित हो चुके हैं; बेसिक शिक्षा में महिला शिक्षकों की संख्या में 9 प्रतिशत से ज़्यादा की गिरावट आई है – जो 2022 में लगभग 73,000 थी, वह 2024 में घटकर लगभग 66,000 रह गई है।“
यह देखना और भी रोचक है कि जब तालिबान ने अमेरिका को भगाया था तो भारत का एक बहुत बड़ा वर्ग समर्थन और तारीफ में उतर आया था, मगर जिस तरीके से महिला शिक्षा पर और पेशे पर पाबंदी है, उसे लेकर अब उस वर्ग का मौन है। और यह सुविधाजनक चुप्पी ही सबसे अधिक घातक है!
सोनाली मिश्रा