होम्योपैथी दिवस पर जानिए स्वास्थ्य के समग्र दृष्टिकोण और महर्षि हैनिमैन के सिद्धांत। विशेषज्ञों के अनुसार शरीर, मन और चेतना के संतुलन को समझना आज के दौर में बेहद जरूरी है।
सलिल दाते
वैश्विक स्तर पर बढ़ती जीवनशैली-जनित बीमारियों, मानसिक तनाव और दीर्घकालिक रोगों के इस दौर में स्वास्थ्य की पारंपरिक परिभाषाएं पुनः प्रश्नों के घेरे में हैं। ऐसे समय में 10 अप्रैल को मनाया जाने वाला होम्योपैथी दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की मूल अवधारणा को समझने और उसे पुनर्परिभाषित करने का अवसर बनकर सामने आता है।
होम्योपैथी के जनक डॉ. सैमुअल हैनिमैन की जयंती पर यह विचार करना अत्यंत प्रासंगिक है कि क्या स्वास्थ्य केवल रोगों के अभाव का नाम है, या वह चेतना, मन और शरीर के संतुलन की एक गहन अवस्था है।विशेषज्ञों के अनुसार आधुनिक चिकित्सा पद्धति में स्वास्थ्य को प्रायः लक्षणों की अनुपस्थिति के रूप में देखा जाता है, जबकि भारतीय दर्शन, विशेषतः उपनिषद और आयुर्वेद, इसे एक समग्र संतुलन के रूप में परिभाषित करते हैं। आयुर्वेद का सिद्धांत ‘स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनम’ स्पष्ट करता है कि स्वास्थ्य केवल उपचार का विषय नहीं, बल्कि संतुलन के संरक्षण की सतत प्रक्रिया है।
भगवद्गीता में कहा गया ‘समत्वं योग उच्यते’ भी इसी सत्य की पुष्टि करता है कि जहां मन, बुद्धि और इंद्रियां संतुलित हों, वहीं वास्तविक स्वास्थ्य विद्यमान होता है।उपनिषदों के अनुसार रोग शरीर की मात्र विकृति नहीं, बल्कि प्राण, मन और चेतना के मध्य उत्पन्न असंतुलन का परिणाम है। इसी विचारधारा को आधुनिक चिकित्सा में वैज्ञानिक रूप देने का कार्य महर्षि हैनिमैन ने किया। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘ऑर्गनॉन ऑफ मेडिसिन’ में रोग को ‘जीवनी शक्ति के विक्षोभ’ के रूप में वर्णित किया गया है।उनके अनुसार स्वास्थ्य वह स्थिति है, जिसमें यह जीवनी शक्ति संतुलित एवं सामंजस्यपूर्ण रूप से कार्य करती है। यह अवधारणा उपनिषदों में वर्णित ‘प्राण’ सिद्धांत के अत्यंत समीप है, जहां ‘प्राणो हि भूतानामायुः’ के माध्यम से जीवन की मूल शक्ति को प्राण कहा गया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि होम्योपैथी और उपनिषद दोनों ही रोग को शत्रु नहीं, बल्कि संकेत के रूप में देखते हैं। शरीर में उत्पन्न लक्षण जैसे ज्वर, खांसी, त्वचा विकार या अन्य असामान्यताएं दरअसल शरीर के आंतरिक असंतुलन की भाषा हैं। इन्हें दबाने के बजाय समझना और उनके मूल कारण तक पहुंचना ही वास्तविक चिकित्सा है।हैनिमैन का यह सिद्धांत कि ‘रोग कोई भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म अव्यवस्था है’, आज के चिकित्सा विमर्श में अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है।वर्तमान समय में त्वरित राहत को ही चिकित्सा की सफलता मान लिया गया है, किन्तु इससे रोगों का स्थायी समाधान नहीं हो पाता। होम्योपैथी इसके विपरीत ‘सौम्य, शीघ्र और स्थायी उपचार’ पर बल देती है। इस पद्धति में शरीर की स्वाभाविक उपचार क्षमता को सक्रिय करने पर जोर दिया जाता है, न कि उसे बाहरी हस्तक्षेप से नियंत्रित करने पर।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि कई स्थितियों में अनावश्यक औषधि देने के बजाय शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया को सहयोग देना अधिक प्रभावी सिद्ध होता है।आज के समय में बढ़ती जीर्ण बीमारियां, मानसिक असंतुलन और बार-बार उभरने वाले रोग इस बात के संकेत हैं कि स्वास्थ्य के मूल सिद्धांतों की उपेक्षा हो रही है। उपनिषद इसे प्रकृति से विच्छेद मानते हैं, जबकि होम्योपैथी इसे गहन स्तर पर रोग के स्थानांतरण का परिणाम मानती है।