महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के नए ड्राफ्ट को कैबिनेट की मंजूरी मिली। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीट आरक्षित करने की योजना, 2029 चुनाव तक लागू करने की तैयारी।
केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के संशोधित ड्राफ्ट को मंजूरी देना वास्तव में भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक साहसिक और ऐतिहासिक कदम है। इस निर्णय का उद्देश्य संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करना है, जिससे नीति-निर्माण में उनकी समान भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
नए प्रस्ताव के तहत लोकसभा की कुल सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रावधान है, जिसमें से लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। सरकार ने जनगणना और परिसीमन की लंबी प्रक्रिया की प्रतीक्षा करने के बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर जल्द से जल्द इसे लागू करने पर विचार किया है, ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव तक इसका असर दिख सके।इस संशोधन को पारित कराने के लिए सरकार अप्रैल के मध्य में संसद का विशेष सत्र बुलाने की योजना बना रही है। आरक्षित सीटों के भीतर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए भी आरक्षण सुनिश्चित किया गया है।
यह कदम केवल सीटों का आरक्षण नहीं है, बल्कि यह निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्थाओं में आधी आबादी की आवाज को मुखर करने का प्रयास है। यह पितृसत्तात्मक ढांचे को तोड़कर राजनीति में महिला नेतृत्व को मुख्यधारा में लाएगा। दशकों से लंबित इस विधेयक को मंजूरी देकर सरकार ने राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया है।2029 के चुनावों से पहले इसे लागू करने की योजना ‘नारी शक्ति’ के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। हालांकि, सीटों का पुनर्निधारण (परिसीमन) एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें राजनीतिक सहमति बनाना बड़ी चुनौती होगी। विपक्ष द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए उप-कोटा की मांग पर बहस अभी भी जारी है, जो इस विधेयक के सर्वसम्मति से पारित होने में बाधा डाल सकती है।
महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को कैबिनेट की मंजूरी भारतीय नारी के सशक्तिकरण का एक नया अध्याय है। यह क्षण इसलिए भी विशेष है, क्योंकि यह तब आ रहा है जब देश का वातावरण उत्सव, नवीनता और सकारात्मकता से भरा हुआ है।ऐसे में यह और भी जरूरी हो जाता है कि हमारी संस्थाएं सभी नागरिकों, विशेष रूप से आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाओं की आकांक्षाओं का सम्मान करें। इससे न केवल दशकों पुराना संकल्प पूरा होगा, बल्कि विकास की गति बनाए रखने में भी मदद मिलेगी।
यह हमारे लोकतंत्र को अधिक उत्तरदायी बनाने और भविष्य के अनुरूप तैयार करने की दिशा में एक अहम कदम होगा। यह किसी एक सरकार, दल या व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का विषय है। इसके लिए सभी दलों को मिलकर इसके सभी पहलुओं पर विचार करते हुए इसे आम सहमति से पारित करना चाहिए।यदि यह विधेयक अपने प्रस्तावित रूप में लागू होता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी और न्यायसंगत बना देगा। अब सबकी नजरें आगामी विशेष सत्र पर हैं, जहां इस ऐतिहासिक कानून को अंतिम रूप दिया जाएगा।