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Why Lord Ram Is Relevant Today: Ram Navami Special

श्रीराम आज भी प्रासंगिक क्यों हैं ?

राम नवमी पर जानिए क्यों भगवान श्रीराम आज भी प्रासंगिक हैं। उनके जीवन से मर्यादा, न्याय, समरसता और आदर्श शासन की सीख मिलती है।


श्रीराम आज भी प्रासंगिक क्यों हैं

बलबीर पुज

सभी पाठकों को पावन रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएं। हिंदू परंपरा में श्रीराम भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं, जिनका अवतरण त्रेतायुग में हुआ। महर्षि वाल्मीकि प्रणीत रामायण और गोस्वामी तुलसीदासकृत रामचरितमानस में श्रीराम को जिस रूप में चित्रित किया गया है. यह आज भी कितना प्रासंगिक है- यह एक स्वाभाविक विचार है। इसी संदर्भ में भगवान विष्णु के हो आठवें अवतार श्रीकृष्ण का भी स्मरण होता है। दोनों ही करोड़ों हिंदुओं के लिए केवल ईश्वर नहीं, बल्कि आस्था, मर्यादा, जीवन दर्शन और पथ प्रदर्शक के शाश्वत प्रतीक हैं। 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम धर्म, त्याग और आदर्श शासन की प्रेरणा देते हैं. जबकि 'योगेश्वर' श्रीकृष्ण कर्म, नीति, प्रेम और जीवन के गूढ़ रहस्यों का बोध कराते हैं। दोनों के बिना भारतीय जीवन-दृष्टि अपूर्ण है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आज के युग में मानव जीवन के लिए इन दोनों अवतारी की शिक्षाओं को किस रूप में आत्मसात किया जाए।

श्रीराम और श्रीकृष्ण भिन्न भिन्न परिस्थितियों में अवतरित हुए। श्रीराम का जन्म ऐसे चातावरण में हुआ, जहां परिवार और समाज का पूर्ण सहयोग उन्हें प्रास रहा। माता-पित्ता, भरत और लक्ष्मण जैसे त्यागमयी भाई सभी ने जीवन के प्रत्येक मोड़ पर उनका साथ दिया। यहां तक कि कैकेयी, जिनके कारण उन्हें कष्टकारी वनवास मिला- वे भी उनके 'अपनी' है। अयोध्यावासी भी उनके प्रति गहन प्रेम और निष्ठा रखते थे। इस प्रकार श्रीराम का संघर्ष मुख्यतः बाहरी है। इसके विपरीत, श्रीकृष्ण का जीवन प्रारंभसे है अंतर्युद्ध का प्रतीक रहा। जन्म लेते ही उन्हें अपने ही मामा कंस के भय से गोकुल भेजना पड़ा। वहां भी उनके वध हेतु कालिया, पूतना, शकटासुर, त्रिणावर्त, वत्मासुर, अधासुर, बकासुर व्योमासुर और अरिष्ठासुर जैसे अनेक असुरों को भेजा गया। फिर भी कान्हा ने अपने सभी शत्रुओं का परास्त किया। आगे महाभारत के रूप में उन्हें अपने ही कुल-परिवार के भीतर भीषण छल और युद्ध का सामना करना पड़ा।

श्रीराम, पिता के निधन का समाचार पाकर वन में विलाप करते हैं और सीता-हरण के पश्चात व्याकुल होकर वन-वन भटकते हैं। इसके प्रतिकूल, श्रीकृष्ण बाल्यकाल से ही अद्वितीय धैर्य और संतुलन के प्रतीक बने रहते हैं। जन्म से लेकर प्रभास क्षेत्र तक उनके जीवन में असंख्य चुनौतियां आई, किंतु श्रीकृष्ण ने कभी उन्हें अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और सुदर्शन चक्रधारी के रूप में हर बार भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में अपनी दिव्यता का परिचय कराया। नहीं श्रीराम हरि अवतार होते हुए भी अपनी प्रत्येक पीड़ा का सामना सामान्य मानव की तरह करते हैं। चूंकि सामान्य मनुष्य को श्रीकृष्ण की भांति आलौकिक शक्तियां प्राप्त नहीं होती, इसलिए श्रीराम का जीवन हर युग में मानव के लिए अधिक अनुकरणीय प्रतीत होता है। श्रीराम उन जीवन मूल्यों के संग्रह है, जो व्यक्ति, समाज और विश्व को संतुलित, सुखी और मर्यादित जीवन जीने की दिशा दिखाते हैं। उनके जीवन का विश्लेषण अनेक मिथकों को खंडित करता है और यह चताता है कि प्रत्येक परिस्थिति में मनुष्य को कैसा आचरण करना चाहिए। उदाहरणास्वरूप, पिनाक (शिवधनुष) भंग होने के पश्चात जब भगवान परशुराम और लक्ष्मण के बीच जाक्य-विवाद होता है और बातावरण अत्यंत तनावपूर्ण हो जाता है, तब श्रीराम अपनी विनम्रता और मधुर वाणी से स्थिति को संभालते हैं। फिर परसुरामजी, श्रीराम की महिमा स्वीकार करते हुए उनकी स्तुति करते हैं और फिर तपस्या हेतु बन चले जाते हैं 'कहि जय जय रघुकुल केतु भृगुपति गए बनहि तप हेतु।

यह प्रसंग सिखाता है कि सफलता के शिखर पर पहुंचकर भी व्यक्ति को संयम और विनय नहीं छोड़ना चाहिए। श्रीराम सामाजिक समरसता के जीवंत प्रतीक हैं। बनवास के कठिन समय में उन्होंने अपने सहयोगी वन से चुने। केवट, निषाद, कोल, भील, किरात और वानर-भालू सभी उनके साथी बने। यदि वे चाहते, तो अयोध्या या जनकपुर से सहायता ले सकते थे, किंतु उन्होंने समाज के उन वर्षों को अपनाया, जिन्हें आज दलित, जनजातीय या पिछड़ा कहा जाता है। उन्होंने इन सभी को 'सखा' कहकर संबोधित किया और हनुमानजी को लक्ष्मण से भी अधिक प्रिय बताया सुनु कपि जिय मानसि जनि ऊना, हैं मम प्रिय लछिमन ते दूना। इस संदर्भमें शशबरी प्रसंग अत्यंत मार्मिक है। शबरी स्वयं को अत्यंत निम्न मानते हुए कहती है 'अधम ते अधम अधम अति नारी बीराम उत्तर देते हैं कि वे केवल भक्ति का संबंध मानते हैं 'जाति-पाति कुल धर्म बहाई...'। इस प्रकार के स्पष्ट करते है कि मनुष्य का मूल्य उसकी जाति या सामाजिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसके भाव और कर्म से निर्धारित होता है। इसी प्रकार, गिद्धरान जटायु जो सामान्य दृष्टि में तुच्छ पक्षी है सीता की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर करते है। तब श्रीराम उन्हें पितातुल्य सम्मान देते हुए उनका अंतिम संस्कार करते हैं। यह दर्शाता है कि उनके लिए कर्म ती सर्वोपरि है। रावण, जो पुलस्त्य कुल में जन्मा विद्वान ब्राह्मण, महान शिवभक्त और स्वर्ण लंका का सम्राट था अपने दुराचरण के कारण अधर्म का प्रतीक बन गया। परिणामस्वरूप, हनुमानजी द्वारा लंका दहन और औराम द्वारा उसका वध यहा सदिश देता है कि सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्यों की रक्षा हेतु किसी भी व्यक्ति को उसके पद, वंश या सामर्थ्य से नहीं, बल्कि उसके आचरण के आधार पर आंका जाना चाहिए। 

बाली-वध के पश्चात श्रीराम सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य सौंपते है और अंगद को उत्तराधिकारी चोषित करते हैं। इसी प्रकार, लंका विजय के बाद वे विभीषण का राजतिलक कराते हैं और उनसे परिवार की स्वियों को सांत्वना देने का आग्रह करते हैं। यह दर्शाता है कि वे केवल विजेता नहीं, बल्कि न्यायप्रिय और करुणाशील शासक भी थे, जिन्हें राज्य और संपत्ति का लोभ नहीं था। शत्रु के प्रति भी मर्यादित व्यवहार का आदर्श श्रीराम प्रस्तुत करते हैं। जब विभीषण रावण के अंतिम संस्कार को लेकर संकोच करते हैं, तब श्रीराम कहते हैं 'मरणान्तानि वैरागि... अर्थात् शत्रुता केवल जीवनकाल तक सीमित होती है, मृत्यु के पश्चात उस्सका अंत हो जाना चाहिए। यह विचार आधुनिक 'हेग कन्वेंशन (1899, 1907 और 1954) जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों से भी कहीं अधिक प्राचीन है। दुर्भाग्यवश, भारतीय बाङ्मय की व्याख्या माक्से-मैकौले मानसपुत्रों ने अपने पूर्वाग्रहों और भारत-विरोधी एजेंडे के अनुरूप किया। उनकर उद्देश्य सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि असंतोष को सतत हवा देना रहा है। रामायण और महाभारत रूपों ऐतियमिक ग्रंथों को भी इसी दृष्टि से तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया। 

जबकि सत्य यह है कि श्रीराम का अवतरण किसी दलित की हत्या करने हेतु नहीं हुआ, बल्कि रावण रूपी अन्याय, अहंकार और अधर्म के उन्मूलन के लिए था। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व सर्वांगीण है। वे सफल राजनीतिज्ञ, कुशल कूटनीतिज्ञ, गहन विचारक और दार्शनिक के रूप में सदैव प्रतिष्ठित रहेंगे। इस बहुआयामी स्वरूप के पीछे उनकी दिव्य चेतना और शक्तियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। श्रीराम का संपूर्ण जीवन मानवीय मर्यादाओं से संचालित है। वे हर परिस्थिति का सामना एक सामान्य मनुष्य की तख करते हैं और उसी सीमाओं के भीतर उसका समाधान भी ढूंढते हैं। यही कारण है कि श्रीराम का जीवन मानव के लिए अधिक सहज, व्यावहारिक और अनुकरणीय हैं।