पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले TMC और BJP के बीच सीधी टक्कर, टिकट कटौती और रणनीति को लेकर सियासी हलचल तेज, जानें पूरा राजनीतिक विश्लेषण।
पश्चिम बंगाल में विधानसभा प चुनाव से पहले जिस तरह का माहौल बन रहा है, वह संकेत दे रहा है कि इस बार मुकाबला सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा, सत्ता और भविष्य की दिशा का संघर्ष है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर ने चुनाव को द्विध्रुवीय बना दिया है। जहां एक और ममता बनर्जी अपनी सता बचाने की घबराहट में तुष्टिकरण की अपनी नीति अपना रही हैं। वहीं भाजपा पूरी ताकत से 'परिवर्तन' के नारे के साथ मैदान में उतर चुकी है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि पश्चिम बंगाल इस बार बदलाव का फैसला जरूर लेगा।
कांग्रेस और वाम दलों की स्थिति यहां कमजोर है, लेकिन अलग-अलग लड़ने से मुकाबले को भाजपा के पक्ष में झुका दिया है। क्योंकि यह दोनों दल टीएमसी के वोट बैंक में ही सेंध लगाएंगे। भाजपा विकास, सुशासन की उसकी पहचान और एंटी इन्करेंसी के चलते इस बार वह जीत हासिल कर सकती है। यही कारण है कि चुनावी रणनीतियां पहले से कहीं अधिक आक्रामक और केंद्रित हो गई हैं। इस चुनाव में तीन वर्ग निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, युवा वोटर, महिला मतदाता और ग्रामीण आबादी।
भाजपा तेजी से इनमें अपनी पैठ बना रही है। भाजपा के यहां बढ़ते कदम का भय टीएमसी में साफ-साफ दिखाई दे रहा है। टीएमसी द्वारा 74 विधायकों के टिकट काटना एक बड़ा और असाधारण फैसला है। यह पार्टी के इतिहास में सिटिंग एमएलए की सबसे बड़ी टिकट कटौती मानी जा रही है। इस कदम को दो नजरियों से देखा जा रहा है। पहला, ममता बनर्जी एंटी-इन्कंबेसी को कम करने, जनता के सता और उसके विधायकों के खिलाफ असंतोष को दबाने का दांव खेल रही हैं। दूसरा, यह संकेत भी माना जा रहा है कि पार्टी को भीतर ही भीतर हार का डर सता रहा है।
इतनी बड़ी संख्या में टिकट बदलना यह भी दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर असंतोष को गंभीरता से लिया जा रहा है। यह हाल के चुनावों में टीएमसी का सबसे बड़ा फेरबदल है। 74 विधायकों के टिकट काटने के अलावा संभावित हार के डर से 15 विधायकों की सीट बदल दी है। इतना ही नहीं पार्टी ने 2021 में 25 हजार से कम वोटों के अंतर से जीती 102 सीटों में से करीब आधी पर उम्मीदवार भी बदले हैं। यहां तक कि पार्टी को कई सीटों पर अपने स्टार चेहरों पर भी भरोसा नहीं रहा और लोकल नेटवर्क के नेताओं पर भरोसा करना पड़ा है।
तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की नीति बार-बार उजागर हुई है। हालाकि हुमायूं कबीर की निर्माणाधीन बाबरी मस्जिद विवाद ने ममता बनर्जी को बीच मझधार में फंसा दिया है। लेकिन ममता बनर्जी ने हिंदुओं की खिलाफत और मुस्लिमों की मिजाजपुर्ती की नीति पर चलते हुए 47 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को टिकट का तोहफा दिया है। इतनी बड़ी संख्या में अल्पसंख्यकों को टिकट देना भी बड़ा राजनीतिक संदेश देता है। आलोचकों का मानना है कि यह साफ तौर पर 'तुष्टिकरण की नीति' का जीवंत उदाहरण है. जिसे टीएमसी सामाजिक संतुलन के नाम पर ढकने की असफल कोशिश करती रही है। लेकिन यह रणनीति उलटी भी पड़ सकती है, क्योंकि इससे बहुसंख्यक वोटर में असंतोष बढ़ने की संभावना बलवती हो रही है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि अल्पसंख्यकों को इतनी संख्या में टिकट देना कहीं ममता बनर्जी के लिए 'खट्टे अंगूर' ना बन जाए। भाजपा इस बार पूरी तैयारी के साथ मैदान में है। उसकी रणनीति स्पष्ट है कि एंटी इन्कबेसी की अधिकतम करना।
भ्रष्टाचार के अनगिनत मामले और कानून-व्यवस्था के मुद्दे उठाना, जिनसे वास्तविकता में पश्चिम बंगाल की जनता आजिज आ चुकी है। इसके साथ ही उन केंद्रीय योजनाओं के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करना, जिन्हें कितने ही फायदों को बावजूद ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में लागू नहीं कर रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि यदि राज्य में भी डबल इंजन की सरकार बनती है तो यहां की गरीबों, वंचितों, जनतातियों और मध्यम वर्ग को इनका फायदा मिलेगा।