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उमाशंकर गुप्ता का आपातकाल संघर्ष

आपातकाल की आपबीती:आपातकाल का वह युवा प्रहरी, जब जेलें भरवाना ही बन गया लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प

1975 के आपातकाल में उमाशंकर गुप्ता ने जेल भरो आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने भूमिगत रहकर लोकतंत्र की रक्षा के लिए सत्याग्रह को प्रेरित किया।


आपातकाल की आपबीतीआपातकाल का वह युवा प्रहरी जब जेलें भरवाना ही बन गया लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प

वर्ष 1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह अध्याय है, जिसने असंख्य परिवारों के जीवन की दिशा बदल दी। अभिव्यक्ति पर पहरा था, असहमति अपराध बन चुकी थी और जेलें लोकतंत्र की आवाज़ उठाने वालों से भर रही थीं। ऐसे कठिन समय में एक 23 वर्षीय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यकर्ता स्वयं गिरफ्तारी देने के बजाय भूमिगत रहकर आंदोलन की पूरी व्यवस्था संभाल रहा था। यह युवा थे उमाशंकर गुप्ता, जो आगे चलकर भोपाल के महापौर, मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता बने।

रेहटी से पढ़ाई के लिए भोपाल आए उमाशंकर गुप्ता ने बी.कॉम. की शिक्षा पूरी कर ली थी और चार्टर्ड अकाउंटेंसी की तैयारी कर रहे थे। तभी 25 जून 1975 की रात आपातकाल लागू हो गया। उनका सपना सीए बनने का था, किंतु परिस्थितियों ने जीवन की दिशा बदल दी। संगठन ने उन्हें गिरफ्तारी देने के बजाय भोपाल संभाग में 'जेल भरो आंदोलन' के संचालन का दायित्व सौंपा। इसके बाद उन्होंने भूमिगत रहकर दिन-रात कार्यकर्ताओं से संपर्क साधा, उन्हें सत्याग्रह के लिए प्रेरित किया और आंदोलन को गति दी।वे बताते हैं कि आपातकाल घोषित होने की रात वे संघ कार्यालय में ही थे। आधी रात पुलिस ने छापा मारा, लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ता उत्तमचंद इसराणी ने स्थिति की गंभीरता समझते हुए सभी कार्यकर्ताओं को सुरक्षित निकल जाने का निर्देश दिया। शुरुआती दिनों में किसी को अनुमान नहीं था कि लोकतंत्र पर इतना कठोर प्रहार होने वाला है। तीन-चार दिनों के भीतर पुलिस की व्यापक धरपकड़ और दमनात्मक कार्रवाइयों ने पूरे वातावरण को भयाक्रांत कर दिया।

उस समय उमाशंकर गुप्ता संघ के नगर सायं प्रमुख थे। उन्हें स्पष्ट निर्देश मिला था कि स्वयं गिरफ्तारी नहीं देनी है, बल्कि अधिकाधिक कार्यकर्ताओं को सत्याग्रह और जेल भरो आंदोलन के लिए तैयार करना है। वे लगातार स्थान बदलते रहे, गुप्त बैठकों का आयोजन करते रहे और अनेक युवाओं को लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आने का साहस देते रहे। उनके प्रयासों से भोपाल संभाग में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी।आपातकाल की सबसे मार्मिक स्मृतियाँ उन्हें उन परिवारों की याद दिलाती हैं, जिनके घरों के कमाने वाले सदस्य जेलों में बंद कर दिए गए थे। अनेक परिवारों के सामने भोजन तक का संकट खड़ा हो गया। बच्चों की पढ़ाई छूट गई। जो महिलाएँ कभी घर की चौखट से बाहर नहीं निकली थीं, उन्हें मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करना पड़ा। कई घरों में सूखी रोटी भी कठिनाई से उपलब्ध होती थी। उमाशंकर गुप्ता कहते हैं कि लोकतंत्र पर लगे इस ग्रहण ने न केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं को, बल्कि उनके पूरे परिवारों को भी गहरी पीड़ा दी।

इसी पीड़ा को कम करने के लिए संगठन ने कार्यकर्ताओं के बीच जिम्मेदारियाँ बाँट दी थीं। किसी को सत्याग्रह की योजना बनानी थी, किसी को जेल जाने वालों के परिवारों की सूची लेकर सहायता पहुँचानी थी, तो किसी को आर्थिक सहयोग जुटाने का कार्य सौंपा गया था। स्वयं उमाशंकर गुप्ता भी ऐसे परिवारों तक सहायता पहुँचाने के अभियान में सक्रिय रहे। उस समय आर्थिक सहयोग भेजने का सबसे भरोसेमंद माध्यम मनीऑर्डर था, किंतु लगातार निगरानी के कारण एक ही व्यक्ति या डाकघर से बार-बार धन भेजना जोखिम भरा था। इसलिए अलग-अलग कार्यकर्ताओं और विभिन्न डाकघरों के माध्यम से सहायता पहुँचाई जाती थी। स्वर्गीय कैलाश जोशी की धर्मपत्नी तारा जोशी भी इस सेवा कार्य में सक्रिय सहयोग करती थीं।

उमाशंकर गुप्ता एक रोचक संस्मरण भी सुनाते हैं। गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के प्रचार से आहत जनसंघ कार्यकर्ता मेघराज जैन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पाँच रुपये का मनीऑर्डर भेजकर व्यंग्यात्मक संदेश लिखा था। बाद में वह मनीऑर्डर वापस लौट आया। आपातकाल लगने के बाद मेघराज जैन भूमिगत हो गए। पुलिस की निगरानी के कारण कार्यालय का कोई व्यक्ति वह मनीऑर्डर लेने का साहस नहीं कर रहा था। तब उमाशंकर गुप्ता ने स्वयं मेघराज जैन बनकर डाकिए से वह मनीऑर्डर प्राप्त किया। वे मुस्कराते हुए कहते हैं कि उस समय पाँच रुपये भी बड़ी राशि थे और उससे किसी जरूरतमंद परिवार की सहायता की जा सकती थी।

वे बताते हैं कि भोपाल में आपातकाल के विरोध का पहला सार्वजनिक आंदोलन समाजवादी नेता सविता वाजपेयी के नेतृत्व में हुआ। प्रारंभिक योजना पीरगेट पर प्रदर्शन की थी, लेकिन पुलिस को भनक लगने के बाद स्थान बदलकर चौक बाजार किया गया, जहाँ 17 सत्याग्रहियों ने गिरफ्तारी दी।उमाशंकर गुप्ता का मानना है कि आपातकाल केवल राजनीतिक संघर्ष का नहीं, बल्कि सेवा, साहस और संगठन की परीक्षा का काल था। उस दौर ने उन्हें सिखाया कि लोकतंत्र केवल संविधान की पंक्तियों से नहीं, बल्कि उसे बचाने का साहस रखने वाले सामान्य नागरिकों के संकल्प से जीवित रहता है। उनके लिए वह समय आज भी एक ऐसी स्मृति है, जो याद दिलाती है कि स्वतंत्रता का मूल्य तभी समझ आता है, जब उस पर पहरा बैठा दिया जाए।

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