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Uddhavdas Mehta: A True Example of Leadership

संघ कार्य के 100 वर्ष:  निःस्वार्थ समर्पण की ज्योति

उद्धवदास मेहता का जीवन संघ कार्य में निस्वार्थ सेवा, अनुशासन और नेतृत्व का उदाहरण है। भोपाल में संगठन निर्माण में उनका योगदान प्रेरणादायक रहा।


संघ कार्य के 100 वर्ष  निःस्वार्थ समर्पण की ज्योति

चन्द्रवेश पांडे

भो पाल की धरती पर संगठन और संस्कार की जो धारा आज सशक्त रूप में प्रवाहित हो रही है, उसके मूल में कुछ ऐसे मौन तपस्वियों का योगदान है, जिन्होंने बिना किसी प्रसिद्धि की आकांक्षा के अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उद्धवदास मेहता ऐसे ही कर्मयोगी थे संघ के प्रारंभिक काल के वे स्तंभ, जिन्होंने सीमित संसाधनों में भी संगठन की नींव को अडिग बनाया।

संघ कार्य का प्रारंभः कठिनाइयों में बीजरोपणः वह समय था जब भोपाल में संघ कार्य अपने आरंभिक चरण में था। न संसाधन, न बड़ी संख्या में स्वयंसेवक, केवल एक संकल्प और राष्ट्रभाव से ओतप्रोत कुछ व्यक्तित्व। ऐसे समय में मेहता जी घर-घर जाकर युवाओं को शाखा से जोड़ने का कार्य करते थे। वे केवल प्रेरित ही नहीं करते, बल्कि स्वयं मैदान की सफाई से लेकर शाखा के संचालन तक हर कार्य में अग्रणी रहते। समय पर शाखा लगे, यह सुनिश्चित करने के लिए वे सबसे पहले पहुँचते। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि उनके लिए नेतृत्व कोई पद नहीं, बल्कि एक साधना थी जिसमें पहले स्वयं करना और फिर दूसरों को प्रेरित करना ही मूल मंत्र था।

विरोध के बीच संवाद का मार्गः प्रारंभिक दौर में संघ के प्रति समाज में अनेक भ्रांतियाँ और शंकाएँ भी थीं। एक बार शाखा के विरोध का प्रसंग सामने आया। सामान्यतः ऐसे अवसर टकराव को जन्म देते हैं, परंतु मेहता जी ने धैर्य और संवाद का मार्ग चुना। उन्होंने शांतिपूर्वक लोगों से बात की, संघ के उद्देश्यों को समझाया और समय के साथ वही विरोधी सहयोगी बन गए। यह घटना उनके व्यक्तित्व की उस विशेषता को उजागर करती है, जिसमें दृढ़ता के साथ विनम्रता और संघर्ष के स्थान पर संवाद को प्राथमिकता दी गई।

अनुशासनः जीवन का मूलाधारः मेहता जी का मानना था कि संगठन की आत्मा उसकी नियमितता और अनुशासन में निहित होती है। एक प्रसंग में उल्लेख मिलता है कि व्यक्तिगत या पारिवारिक व्यस्तताओं के बावजूद उन्होंने कभी शाखा का समय नहीं छोड़ा। वे कहा करते थे 'यदि हम ही ढीले पड़ेंगे, तो संगठन कैसे टिकेगा?' उनका यह दृष्टिकोण केवल कथन नहीं, बल्कि जीवन का व्यवहार था। उन्होंने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि अनुशासन ही किसी भी महान कार्य की आधारशिला है।

गुमनाम सेवा का उज्ज्वल आदर्शः उनके जीवन की सबसे विशेष बात थी - गुमनाम सेवा का भाव। उन्होंने कभी अपने कार्य का प्रचार नहीं किया। वे मानते थे 'कार्य बड़ा है, व्यक्ति नहीं।' यह विचार न केवल उनकी विनम्रता को दर्शाता है, बल्कि संघ की उस परंपरा को भी जीवंत करता है, जिसमें अहंकार से दूर रहकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा जाता है। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि सच्चे कर्मयोगी अपनी पहचान कार्य से बनाते हैं, न कि प्रशंसा से।

प्रेरणा की अक्षय धारा

उद्धवदास मेहता का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व सेवा से प्रारंभहोता है और अनुशासन, धैर्य तथा निरंतरता से परिपक्व होता है। उन्होंने जो बीज बोया, वह आज एक विशाल वृक्ष के रूप में विकसित हो चुका है। उनकी जीवन-यात्रा यह संदेश देती है कि यदि व्यक्ति निस्वार्थ भाव से कार्य करे, तो वह बिना किसी प्रसिद्धि के भी इतिहास के पन्नों में अमिट छाप छोड़ सकता है।

नेतृत्व का जीवंत उदाहरण

मेहता जी केवल निर्देश देने वाले नेता नहीं थे, बल्कि स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करने वाले मार्गदर्शक थे। वे खेलों में स्वयं भाग लेते, प्रार्थना में पूर्ण अनुशासन रखते और प्रत्येक स्वयंसेवक से आत्मीय संबंध बनाते। उनकी यह सहजता और आत्मीयता ही थी कि स्वयंसेवक उन्हें केवल एक पदाधिकारी नहीं, बल्कि एक प्रेरक और पथप्रदर्शक के रूप में देखते थे। उनका नेतृत्व आदेश पर नहीं, बल्कि आदर्श पर आधारित था, और यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी।

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