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स्वदेशी 'मॉडल' ही समर्थ भारत का आधार

स्वदेशी मॉडल को आत्मनिर्भर भारत का आधार बताया जा रहा है। वैश्विक संकट और बाजारवाद के बीच स्थानीय उत्पादन, जैविक खेती और पारंपरिक अर्थव्यवस्था पर जोर।


स्वदेशी मॉडल ही समर्थ भारत का आधार

जयराम शुक्ल

यह समय बाजारू गुलामी के सत्य को समझने का है। संकट और एकांत में मनुष्य के ज्ञानचक्षु खुल जाते हैं, उन्हें आज खोलने की जरूरत है। बाजार आज हमें हांक रहा है। हम क्या खाएं, क्या देखें, सुनें, सोचें कैसे रहें इन सब बातों का नियामक आज बाजार और उपभोगवाद बन गया है। खाड़ी युद्ध और उसके संभावित दुष्प्रभाव के बीच जिस तरह हमसब जी रहे हैं उससे यह सोचने का अवसर तो मिलता ही है कि हम क्यों बाजार की कठपुतली के तौरपर खुद को बदले दे रहे हैं। इस ओढ़ी हुई गुलामी को उतार फेंकें और उतने में ही गुजारा करने की सोचें जो हमारा अपना है, स्वदेशी है, स्वनिर्मित है।

भारतीय समाज के समक्ष पंच परिवर्तन का विचार रखते हुए अपने बौद्धिक में डॉ. भागवत ने स्वदेशी की उसी बात को आगे बढ़ाने की बात की जिसकी अवधारणा गांधीजी ने 'हिंद स्वराज' और 'मेरे सपनों के भारत' में रखी, डाक्टर राममनोहर लोहिया, पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने समय-समय पर अपने लेखन व प्रबोधनों में व्यक्त की थी। स्वदेशी का विचार ही हमारे स्वाभिमानी भविष्य का आधार बन सकता है यह सोचना चाहिए। आज यदि स्वदेशी का प्रादर्श/प्रकल्प हमारे पास होता तो हम इस संकट को भी पहले की भाँति चीटी-मटे के दंश की तरह झेल जाते। हम ज्यादा नहीं साठ के दशक की ओर ही लौटें। देश में आधुनिक संसाधन कुछ भी नहीं थे। सिंचाई, सड़क, बिजली, संचार, परिवहन बहुत ही कम, सिर्फ शहरों, कस्बों तक सीमित। वैश्विक पैमाने पर दरिद्रता भले ही रही हो पर ग्राम्यसमाज में स्वदेशी का स्वाभिमान था।

 हर छोटे से बड़ा गांव अपने आप में आर्थिक इकाई था। इस ग्राम्यसमाज में हर वृत्ति कर्ताओं का बराबरी का योगदान था। गांव का उत्पादन और पूँजी गाँव को तृप्त करने के बाद ही बाहर निकलती थी। पक्के मकान, मोटर गाड़ी, मोबाइल, कुछ नहीं थे लेकिन आदमी खुश था। समाज सन् सरसठ का अकाल झेल गया। शायद ही किसी ने किसानों या मजदूरों के आत्महत्या की खबर सुनी हो। देसी अन्न, देसी मन, देसी पद्धति सब कुछ देसी। भले ही उत्पादन कम रहा हो लेकिन सबकुछ तृप्तिदायक था। अब इस नई खेती ने हमारे पांच हजार वर्ष पुराने सहकार को एक झटके में नष्ट कर दिया। जिस सहकार ने गोधन, गोबरधन, गोपाल, कृषि, कृष्ण, किसन, किसान, हलधर जैसे शब्द दिए और समाज ने इनकी दैवीय प्राण प्रतिष्ठा की। बाजार ने हमारी उत्सव धर्मिता को विद्रूप कर दिया, उसके मायने बदल दिए।

आज खेत अन्न उगल रहे हैं लेकिन हर अन्न अपने भीतर एक बीमारी लिए हुए है। बीज डंकल पेटेन्ट और उसके साथ खरपतवार बोनस में फ्री। उस खरपतवार को मारने वाली दवा बीज से भी महंगी। कीटपतंगों को मारने वाला पेस्टीसाइड नई भयंकर बीमारियों के साथ हमारे जीवन में घुस गया। अन्न उपजाने वाले पंजाब हरियाणा से दिल्ली-मुंबई जाने वाली रेलगाड़ियां भाँगड़े का उल्लास नहीं अपितु कैंसर की कराह ढोती हैं। अन्न के उत्पादन का ड्योढ़ा बीमारियों का इलाज खा जाता है। इलाज के उपकरण और दवाई भी वहीं से आयातित जहां से अन्न का बीज, खरपतवार नाशक विष। खेती गुलाम बना दी गई। हमारे बीज छिन गए। मैकाले ने हमारी विद्यापद्धति छीनी थी, डंकल ने हमारे पारंपरिक बीज और खेती की पुरातन पद्धति छीन ली। खेतों से गोवंश का निर्वसन हो गया। अमानवीय, निर्दयी और हृदयहीन खेती से उपजा अन्न शरीर में नहीं लगेगा, ऐसी ही व्याधियां जन्मेगा। ऐसे समय में 'पंच परिवर्तन' के विचार ने जगाने का काम किया है। स्वदेशी, पारंपरिक और जैविक खेती, गोवंशीय सहकारिता के साथ।