नर्मदापुरम में 1937 में डॉ. हेडगेवार ने संघ कार्य का पहला दीप जलाया था। कसेरा मोहल्ले में पहली शाखा से शुरू हुआ अभियान आज विशाल संगठनात्मक विरासत बन चुका है।
संघ कार्य के 100 वर्ष: नर्मदापुरम के कसेरा मोहल्ले में 1937 में लगी थी संघ की पहली शाखा
सतपुड़ा की हरित तराइयों और माँ नर्मदा के शांत दक्षिण तट पर बसे होशंगाबाद, आज के नर्मदापुरम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य सन् 1937 में प्रारंभ हुआ। वह समय राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का था। देश पराधीन था और समाज विघटनकारी प्रवृत्तियों से जूझ रहा था। ऐसे समय संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार स्वयं यहाँ आये। उनके साथ संघ के प्रारंभिक कर्मयोगी बाबासाहब आप्टे तथा त्यैबक शिलेदार भी थे। उनका प्रवास नगर के प्रतिष्ठित अधिवक्ता दंडवते वकील के यहाँ हुआ। उसी प्रवास में नगर के प्रमुख नागरिकों की बैठक आयोजित हुई, जहाँ राष्ट्र और संगठन की आवश्यकता पर गंभीर चर्चा हुई। डॉ. हेडगेवार ने अधिवक्ता नारायण प्रसाद दुबे को नगर का प्रथम संघचालक नियुक्त किया और यहीं से नर्मदापुरम में संघकार्य का औपचारिक शुभारंभ हुआ।
पहली शाखा और प्रारंभिक स्वयंसेवकः नगर के कसेरा मोहल्ले में पहली शाखा प्रारंभ हुई। साधारण वातावरण में लगने वाली इस शाखा में राष्ट्रसेवा का उत्साह असाधारण था। श्रीराम लोहिया प्रथम मुख्य शिक्षक बने। प्रारंभिक टोली में वामन पंड्या, विजय कावरे, अण्णा बड़कस और श्रीराम लोहिया जैसे समर्पित स्वयंसेवक थे। त्यंबक शिलेदार को डॉ. हेडगेवार ने विशेष रूप से होशंगाबाद में ही रुकने के लिए छोड़ा ताकि कार्य स्थायी रूप से विकसित हो सके। घर-घर संपर्क, युवाओं में जागरण और संगठन के संस्कारों ने शीघ्र ही शाखा को नगर के आकर्षण का केंद्र बना दिया। कुछ समय बाद पुनः प्रवास पर आये डॉ. हेडगेवार ने शाखा में साठ स्वयंसेवकों को दण्ड सहित उपस्थित देखा। 16 अगस्त 1937 के अपने पत्र में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया।
विस्तार और सरसंघचालकों का प्रवासः इसके बाद संघ कार्य का विस्तार इटारसी, पिपरिया, बाबई, सोहागपुर और बनखेड़ी तक हुआ। रेल जंक्शन होने के कारण इटारसी शीघ्र ही संगठनात्मक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया। डॉ. हेडगेवार के अतिरिक्त पूजनीय गुरुजी माधवराव गोलवलकर का भी यहाँ महत्वपूर्ण प्रवास हुआ। सन् 1946 में इटारसी के ढोर बाजार में आयोजित विराट कार्यक्रम में लगभग दो हजार स्वयंसेवकों ने गणवेश में शारीरिक प्रदर्शन किया। मूसलाधार वर्षा के बीच भी स्वयंसेवकों का अनुशासन और अडिगता देखकर नागरिक भावविभोर हो उठे। होशंगाबाद के एस.एन.जी. विद्यालय मैदान में हुए विजयादशमी उत्सव में सात सौ स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित रहे और हजारों नागरिकों ने कार्यक्रम देखा।
प्रतिबंध और आपातकाल का संघर्ष-संघ कार्य के इतिहास में संघर्ष के क्षण भी आये। प्रथम प्रतिबंध के दौरान 10 दिसंबर 1948 को रामलाल शर्मा और अण्णासाहेब हरणे के नेतृत्व में स्वयंसेवकों ने होशंगाबाद में सत्याग्रह कर गिरफ्तारियां दीं। उन्हें पहले रायपुर और बाद में जबलपुर जेल भेजा गया। आपातकाल के समय भी जिले के दस स्थानों पर सत्याग्रह हुए। केवल होशंगाबाद नगर में ही 32 स्वयंसेवक बंदी बनाए गये। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्वयंसेवकों का मनोबल और संगठन निष्ठा अक्षुण्ण बनी रही।
नर्मदापुरम से निकले प्रचारक
इस भूमि ने अनेक समर्पित प्रचारक भी दिए। यादवराव काळकर, नर्मदा प्रसाद सोनी, प्रतुलचंद्र द्विवेदी, दिवाकर प्रसाद तिवारी, राधेश्याम लोहिया, दुर्गा प्रसाद तिवारी, दिनेश चौरे और संतोष सराठे जैसे कार्यकर्ताओं ने संघ कार्य को व्यापक आयाम दिए। वामन पंड्या जिले के प्रथम स्वयंसेवक थे जिन्होंने सन् 1938 में संघ शिक्षा वर्ग किया। इसके बाद बड़ी संख्या में स्वयंसेवक शिक्षा वर्गों में जाने लगे और संगठन का आधार निरंतर सुदृढ़ होता गया।
कार्यालय और संगठनात्मक आधार
संघ का पहला कार्यालय सराफा चौक स्थित त्रिपाठी के मकान में था। बाद में यह बजरिया स्थित नर्मदा प्रसाद शुक्ला वकील के मकान में स्थानांतरित हुआ। प्रतिबंध काल में पुलिस ने वहीं रखा गणवेश और घोष सामग्री जब्त कर ली थी। इसके पश्चात अण्णासाहेब हर्णे और डॉ. राधामोहन सेठा के घरों से भी कार्यालय संचालित हुआ। बाद में जिला केंद्र इटारसी बनने पर वहाँ स्वयं का कार्यालय भवन निर्मित किया गया। इसे स्वर्गीय श्री भैयाजी चैने स्मृति न्यास का नाम दिया गया। यह कार्यालय आज भी है। इधर नर्मदापुरम के कोठी बाजार में नया कार्यालय बन गया है, जिसे भारत भवन के नाम से संचालित है।
समर्पण का प्रेरक प्रसंग
डॉ. राधामोहन सेटा का जीवन संघनिष्ठा का प्रेरक उदाहरण है। जब गुरुजी ने उन्हें जिले का दायित्व संभालने को कहा तो उन्होंने समयाभाव का उल्लेख किया। इस पर गुरुजी ने कहा-'समय उसी के पास होता है, जो समय का मूल्य समझता है।' यही वाक्य उनके जीवन का सूत्र बन गया। बाद में इटारसी कार्यालय निर्माण हेतु उन्होंने पहले पचास हजार और वर्षों बाद भूमि का मूल्य बढ़ने पर एक लाख रुपये का सहयोग दिया। उनका कहना था 'जब समाज कार्य के लिए संपत्ति का मूल्य बढ़ा है तो मेरा संकल्प भी बढ़ना चाहिए।' माँ नर्मदा की साक्षी में प्रज्वलित हुआ यह प्रथम दीप आज विराट वटवृक्ष बन चुका है। नर्मदापुरम में संघ कार्य की वर्तमान व्यापकता उसी तप, त्याग और राष्ट्रनिष्ठा की जीवंत विरासत है।