बड़वानी जिले के मोतिपुरा में 1942 में बाबूलाल सेन द्वारा संघ की पहली शाखा शुरू होने का ऐतिहासिक विवरण सामने आया है। निमाड़ क्षेत्र में संघ विस्तार और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी।
बड़वानी। प्रदेश के निमाड़ अंचल में बड़वानी जिले में रा.स्व.संघ की पहली शाखा सन् 1942 में ग्राम मोहिपुरा के प्राथमिक विद्यालय मैदान में प्रारंभ हुई थी। हालांकि वर्तमान में यह स्थान सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र में आ गया है और गांव अन्य जगह बस गया है। अब यहां का प्राथमिक विद्यालय भी खंडहर में तब्दील हो चुका है। 1942 में ही अंजड़ के निकट मंडवाड़ा ग्राम में बाबूलाल सेन द्वारा संघ शाखा प्रारंभ की गई थी। मंडवाड़ा के बाद आसपास के क्षेत्रों में संघकार्य का विस्तार हुआ। सेंधवा की शाखा सन् 1945 तथा बड़वानी की शाखा सन् 1946 में शुरू हुई। इस क्षेत्र में शाखा के विस्तार का श्रेय बाबूलाल सेन व नारायण सुल्तानेकर को दिया जा सकता है। इनके अथक प्रयासों के कारण ही इस क्षेत्र में संघकार्य को गति मिली।
प्रेरक प्रसंग : बड़वानी में सिख समाज के अनेक परिवार हैं। उनमें से केवल एक नानकसिंह गांधी ही संघ के स्वयंसेवक थे। बाकी का झुकाव सामान्यतः कांग्रेस की ओर ही था। संघ के कार्यक्रमों में तो वे निमंत्रण देने के बाद भी नहीं आते थे। 1984 के दंगों में बड़वानी में भी सिखों पर अनेक जुल्म ढाए गए। संघ के स्वयंसेवक सिख बंधुओं की रक्षा के लिए आगे आए और उन्हें लूटपाट व आगजनी से बचाया, तभी से सिख परिवार संघ के साथ जुड़ गए हैं। कुक्षी में जब सरसंघचालक मा. बालासाहब देवरस का कार्यक्रम हुआ, तब वहां सिख समाज ने बिना संकोच स्वीकार किया कि यदि संघ नहीं होता तो हम बर्बाद हो गए होते।
101 की जगह मिले 1100 : अंजड़ के गल्लू महात्मा बड़े धनी व्यक्ति थे। समाज कार्य के लिए सदैव आगे रहते थे। उनकी गोद ली बिटिया का विवाह था। वनवासी कल्याण परिषद शुभ प्रसंगों पर अपने कार्य के लिये सहयोग राशि के लिए लोगों से आग्रह किया करती है। मिश्रीलालजी तिवारी और मधुकरराव चितले महात्माजी की बिटिया के विवाह में सम्मिलित होने के लिए अंजड़ आये थे। विवाह संपन्न होने के बाद इन लोगों ने बड़े ही संकोच के साथ 101 रुपए की मांग रखी। इस पर महात्माजी जोर से हंसे और बोले कि भाई अच्छा काम कर रहे हो, उसके लिए मांगने में इतना संकोच क्यों? मैं तो 1100 रुपए देने वाला हूं, चलेगा क्या? अब आश्चर्यचकित और गद्गद् होने की बारी इन दोनों की थी।
ऐसा लगता है जैसे मैं अपने मायके आया हूं: एक बार तहसील का प्राथमिक वर्ग मोहिपुरा में हुआ था। वर्ग में प्रशिक्षार्थी स्वयंसेवकों की संख्या थी 100, लेकिन वर्ग में भोजन विभाग नाम की चीज नहीं थी, क्योंकि शिक्षक, व्यवस्थापक और प्रशिक्षार्थी, सबका भोजन होता था मोहिपुरा के घरों में। दोनों समय भोजन के वक्त ग्रामवासी आते और तय किए अनुसार सबको ले जाते अपने-अपने घरों में। एक प्रकार से यह वर्ग पूरे गांव का वर्ग ही था। गांव के अप्रतिम स्नेह व संघ निष्ठा ने ही जिला प्रचारक जुगलकिशोर परमारजी का मन मोह लिया था। वे अपने प्रवास के दौरान वे अपने प्रवास के दौरान मोहिपुरा आते तो कहते कि यहां आकर ऐसा लगता है, जैसे में अपने मायके में आ गया हूं। जब स्वामी की खोज हुई तो परमारली ने स्वामीजी को मेहिपुरा में रहने के लिए कहा। ग्रामवासियों ने भी कनिष्ठ से अंत तक स्वामीजी की सेवा कर परमारजी के विश्वास को पूर्ण किया।
बड़वानी जिले के दायित्ववान कार्यकर्ता
जिला संघचालक :- दत्तात्रय ओक, ओमप्रकाश पाटील, राजेन्द्र जगताप जिला कार्यवाह : नानकसिंह गांधी, आनंदप्रकाश तिवारी, रमेश पंवार, कमलेश शर्मा, लक्ष्मण परिहार जिला प्रचारक दामोदर नामदेव, शशिकांत पाठक, रेवाराम कुमरावत, मुकेश जाधव, बलिराम पटेल यहां से निकले प्रचारक :- शशिकांत पाठक,लक्ष्मीनारायण इंगले, बाबूलाल सेन, विजय सिंह, हीरालाल परमार, लालकुंवर कनोजे, सामेश्वर भार्गव, भागवत साहूकार, मुकेश जाधव, श्रीराम नंदराले अमृत वर्मा, प्रमोद पंडित
सभी केन्द्रीय पदाधिकारियों का हुआ आगमन
स्वामीजी का अप्रतिम स्नेह मा. गुरुजी व संघ के प्रति सदैव रहा। स्वामीजी के प्रति श्रद्धा होने के कारण संघ के लगभग सभी केन्द्रीय पदाधिकारियों जिनमें सरसंघचालक मा. बालासाहेब देवरस, मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंतजी ठेंगड़ी, अभा बौद्धिक प्रमुख रंगाहरिजी, अभा सेवा प्रमुख सूर्यनारायणरावजी शामिल हैं, का आगमन मोहिपुरा में हुआ है। मा. गुरुजी स्वामीजी को प्रतिवर्ष कुछ राशि दिया करते थे। वैसे ही अन्य स्थानों से प्राप्त धनराशि भी स्वामीजी ने सहेजकर रखी थी। स्वामीजी ने उस राशि से 1962 में अंजड़ के शासकीय चिकित्सालय में एक कक्ष मा. गुरुजी के नाम से बनवाया था। मा. सुदर्शनजी व मध्यप्रदेश के तब के मुख्यमंत्री सुंदरलालजी पटवा लोकार्पण करने अंजड़ पधारे थे।
संघ के कारण गांव सचेत और जाग्रत है
संघ के कारण गांव सचेत और जाग्रत है। उन्होंने आकस्मिक संकट के लिए व्यवस्था कर रखी है। इस काम के लिए उन्होंने संघ के घोष का शंख रखा हुआ है। किसी विपत्ति के आने पर उसे बजाया जाता है और उसकी आवाज सुन पूरा गांव एकत्र हो जाता है। एक बार डाकू आने पर इसका प्रयोग किया गया। गांव वालों को सचेत देख बिना नुकसान पहुंचाये ही उनको लौट जाना पड़ा। ही आग लगने पर इसका नाद किया गया था। सबने एकत्र होकर आग को बुझाया और कोई विशेष हानि न हो सकी।
संघ शिक्षा वर्ग
मंडवाड़ा के बाबूलाल सेन और अंजड़ के सोमेश्वर भार्गव इस जिले से संघ शिक्षा वर्ग करने वाले प्रथम स्वयंसेवक हैं। उन्होंने सन 1962 में खंडवा से प्रथम वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। आज इस जिले में 182 प्रथम वर्ष शिक्षित, 53 द्वितीय वर्ष शिक्षित व 20 तृतीय वर्ष शिक्षित स्वयंसेवक हैं।
वाह... स्वामीजी ने अच्छा पथ प्रदर्शक दिया है, जो स्वयं ही फिसल रहा है
मा. गुरुजी मोहिपुरा पधारे थे। उस समय का अपना अनुभव सुनाते हुए लक्ष्मण धनगर आज भी भाव विह्वल हो जाते हैं। मा. गुरुजी का निवास स्वामीजी के आश्रम में ही था। प्रातः उन्होंने नर्मदा स्रान करने की इच्छा प्रकट की। मोहिपुरा में नर्मदाजी काफी नीचे उतरकर हैं और उतार भी अनगढ़ है। मा. गुरुजी की इच्छा देखकर स्वामीजी ने अपनी स्वीकृति तो दी, पर साथ ही मुझे आवाज देकर कहा कि अरे लक्ष्मण गुरुजी के कपड़े उठाओ और उन्हें ठीक मार्ग से नर्मदाजी ले जाओ। देखना वे कहीं फिसल न जाएं। लक्ष्मण कहते हैं कि उनके कपड़े उठाकर मैं आगे-आगे चल दिया। हाथ में उनके कपड़े और उनके साथ नर्मदा जाना मेरे लिए तो अकल्पनीय ही था। न तो मुझे होश था, न मेरे पैर जमीन पर पड़ रहे थे। ऐसी अवस्था में यंत्रचालित-सा चला जा रहा था। मा. गुरुजी पीछे आ रहे थे। इस अवस्था के कारण मेरा ही पैर फिसल गया। मैं गिरता इसके पहले ही गुरुजी ने मुझे थाम लिया और बोले कि वाह... स्वामीजी ने अच्छा पथ प्रदर्शक दिया है, जो स्वयं ही फिसल रहा है।