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संघ के 100 वर्ष: रक्त से लिखी श्रद्धा और समर्पण की अमरगाथा

संघ के 100 वर्ष पर दिगंबर राव तिजारे की प्रेरक कहानी। रक्त बेचकर स्मृति मंदिर के लिए दान, उज्जैन में पहली शाखा और समर्पण की अनोखी मिसाल।


संघ के 100 वर्ष रक्त से लिखी श्रद्धा और समर्पण की अमरगाथा

बात कोई 1960 के आसपास की है। नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की स्मृति में स्मृति मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ ही हुआ था, उस समय माधव सदाशिव गोलवलकर 'गुरुजी' ने देशभर के स्वयंसेवकों से आह्वान किया। 'डॉक्टर साहब की स्मृति में बनने वाली यह पवित्र धरोहर हम सबकी श्रद्धा से ही पूर्ण होगी। अपनी-अपनी भावना और सामर्थ्य के अनुसार सहयोग कीजिए।' यह आह्वान मानो राष्ट्रभक्ति की वीणा पर छेड़ा गया एक भावपूर्ण स्वर था। गांवों की चौपालों से लेकर नगरों की गलियों तक श्रद्धानिधि एकत्र होने लगी। उसी समय उज्जैन में बैठे एक साधनहीन, किंतु संकल्पवान स्वयंसेवक - दिगंबर राव तिजारे, यह समाचार सुनकर भीतर से विचलित हो उठे। जेब में एक पैसा नहीं। जीवन संघ-कार्य में समर्पित। अपना कुछ भी नहीं, सिवाय उस देह के और उसकी नसों में बहते रक्त के। पूरी रात वे करवटें बदलते रहे। अंततः अंतर्मन से एक आवाज उठी-'जब सब अपनी क्षमता के अनुसार दे रहे हैं, तो तुम क्यों वंचित रहो?'

सुबह होते ही उन्होंने निर्णय ले लिया। दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर वे अस्पतालों की ओर निकल पड़े - अपना रक्त बेचने। संयोग से एक मरीज के लिए रक्त की आवश्यकता थी। तिजारे जो शांत भाव से पलंग पर लेट गए। सुई नस में चुभी और रक्त की लाल धारा शौशी में उतरने लगी। चेहरे पर न पीड़ा थी, न संकोच, केवल संतोष की उजली रेखा। जैसे मन ही मन कह रहे हों 'यह भी आपका ही है डॉक्टर साहब। 'कुछ देर बाद उनके हाथ पर कुछ मुड़े तुड़े नोट रख दिए गए। वे सीधे डाकघर पहुँचे। मनीऑर्डर फॉर्म भरा और अंत में लिखा 'स्मृति मंदिर निर्माणार्थ।'

जब यह मनीऑर्डर नागपुर पहुंचा और नाम पर गुरुजी की दृष्टि पड़ी 'दिगंबर राव तिजारे' तो वे चकित रह गए। जानकारी मिली कि उन्होंने रक्त बेचकर निधि भेजी है।गुरुजी की आँखें नम हो उठीं। बाद में मिलने पर उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा 'प्रचारक का शरीर भी संघ का होता है, तुमने जो रक्त बेचा, वह भी संघ का था।' तिजारे जी बस मुस्कुरा दिए। उनके लिए यह कोई त्याग नहीं, बल्कि सहज कर्तव्य था।

उज्जैन की पहली शाखाः सन् 1937 में तिजारे जी स्वयंसेवक बने। दो वर्ष बाद, 1939 में संघ शिक्षा वर्ग के समापन पर डॉक्टर हेडगेवार ने पूछा 'संघ कार्य के विस्तार के लिए कौन बाहर जाने को तैयार है?' तिजारे जी तुरंत खड़े हो गए 'मैं जाऊँगा, पर मुझे उज्जैन भेजिए।' जब कारण पूछा गया तो उनका सहज उत्तर था 'वहाँ विक्रमादित्य का वह टीला है, जहाँ एक अनपढ़ चरवाहा भी न्याय कर सका था। मैं तो दूसरी कक्षा तक पढ़ा हूँ, वहाँ काम कर लूँगा।' उज्जैन पहुँचकर उन्होंने महाकाल के दर्शन किए और शाखा प्रारंभ करने का उपाय खोजने लगे। मंदिर के सामने कुछ बच्चे फुटबॉल खेल रहे थे। भाषा की समस्या थी। तभी गेंद उनके पास आ गई। उन्होंने गेंद पकड़ ली और कहा 'पहले मेरी बात सुनो, फिर गेंद मिलेगी।' बच्चों ने उन्हें पीटा, पर वे शांत रहे। अंततः बोले 'भारत माता पराधीन है और तुम केवल खेल में लगे हो। क्या माँ को मुक्त कराने दिगंबर राव तिजारे का प्रयास नहीं करोगे?' उनकी वाणी में ऐसी भावाग्नि थी कि बच्चों ने शाखा लगाने की सहमति दे दी। यही उज्जैन की पहली शाखा थी। उसी शाखा का पहला स्वयंसेवक बना राजाभाऊ महाकाल, जो आगे चलकर गोवा मुक्ति आंदोलन में शहीद हुआ।

संगठन निर्माणः सेवा और संस्कार-उज्जैन में ही तिजारे जी के संपर्क में कस्तूरे बंधु आए दत्तात्रय गंगाधर कस्तूरे और उनके बड़े भाई दिगंबर कस्तूरे। दोनों अनाथ थे। स्वयं अल्पशिक्षित होने के बावजूद तिजारे जी ने कहा कि 'मैं पढ़ नहीं पाया, पर तुम लोग पढ़ो। खर्च मैं उठाऊंगा।' दोनों ने पढ़ाई पूरी की और संघ के प्रचारक बने। बाद में दिगंबर कस्तूरे संन्यास लेकर अखंडानंद सरस्वती बने।

मृत्यु के बाद मिला प्रमाणपत्र- 1973 में दिगंबर राव तिजारे का निधन हुआ। वे कहा करते थे स्वयंसेवक को उसके कार्य का प्रमाणपत्र उसकी मृत्यु के बाद ही मिलता है। वास्तव में उनके निधन के बाद संघ के वरिष्ठ नेतृत्व ने जिस भावपूर्ण श्रद्धांजलि से उन्हें याद किया, उससे यह सिद्ध हो गया कि उनका जीवन राष्ट्रसेवा के इतिहास में एक उज्ज्वल प्रेरणा बन चुका है- एक ऐसी कथा, जिसमें रक्त की एक शीशी भी श्रद्धा का महाकाव्य बन जाती है।

ये कैसी गुरु दक्षिणा

भोपाल आकर भी उनके तेवर यथावत रहे ! गुरु पूर्णिमा उत्सव पर स्वयं आने के स्थान पर तत्कालीन मुख्यमंत्री ने गुरु दक्षिणा का लिफाफा भेज दिया! बस फिर क्या था तिजारे जी आग बबूला हो गए। जैसे ही समय मिला वे मुख्यमंत्री के पास पहुंचे और वह लिफाफा उनकी टेबल पर फेंक दिया (जनश्रुति के अनुसार उनके मुंह पर फेंका) और बोले गुरू दक्षिणा भावना प्रधान है अर्थ प्रधान नहीं। परम पूज्य भगवा ध्वज को प्रणाम किये बिना गुरु दक्षिणा कैसी ?

निर्भीकता और विनोद 

देवास और सीहोर की घटनाएं देवास में शाखा प्रारंभ करते समय वहां के राजा ने चुनौती दी 'यदि हमारे पहलवान को हरा दो तो काम कर सकते हो।' तिजारे जी ने एक फुर्तीले स्वयंसेवक को उतारा। मुकाबले में पहलवान धराशायी हो गया और जनता ने आनंद से तिजारे जी को कंधों पर उठा लिया। सीहोर के प्रथम पथ संचलन की घटना भी रोचक है। स्वयंसेवकों के पास जूते नहीं थे, इसलिए उन्होंने पुलिस सिपाहियों से उधार ले लिए। संचलन निकला तो सिपाही भी साथ-साथ अपने जूते माँगते चलते रहे। दृश्य ऐसा था मानो दो जुलूस साथ चल रहे हों।




 

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