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रंगमंच की कालजयी साधिका विजया मेहता का निधन

स्मृतिशेष : विजया मेहता

विजया मेहता, जिन्होंने भारतीय रंगमंच की परिभाषा को नया आयाम दिया, उनके निधन से रंगमंच जगत में शून्यता उत्पन्न हुई है। उनके योगदान को सदैव याद किया जाएगा।


स्मृतिशेष  विजया मेहता

(अनुराग तागड़े )

प्रयोगधर्मी रंगमंच की वह कालजयी साधिका, जिसने भारतीय रंगकला को नया व्याकरण दिया

इंदौर। "कुछ कलाकार मंच पर अभिनय करते हैं, कुछ मंच का इतिहास बदल देते हैं। विजया मेहता उन्हीं विरल विभूतियों में थीं, जिन्होंने भारतीय रंगमंच को केवल नई प्रस्तुतियाँ ही नहीं दीं, बल्कि उसे सोचने, देखने और जीने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया।"भारतीय रंगमंच की यशस्वी परंपरा को आधुनिक चेतना, बौद्धिक गहराई और कलात्मक अनुशासन से समृद्ध करने वाली प्रख्यात रंगनिर्देशक, अभिनेत्री, नाट्यशिक्षिका और मराठी प्रायोगिक रंगमंच की सबसे प्रभावशाली हस्तियों में से एक विजया मेहता अब हमारे बीच नहीं रहीं। 92 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ भारतीय रंगमंच का एक स्वर्णिम अध्याय इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। उनका जाना केवल एक कलाकार का निधन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के एक जीवंत विश्वविद्यालय का मौन हो जाना है।

विजया मेहता ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण रंगमंच की साधना को समर्पित किया। उन्होंने अभिनय को मनोरंजन की सीमाओं से निकालकर उसे समाज, संस्कृति, मनुष्य और जीवन की गहन संवेदनाओं से जोड़ा। उनके लिए रंगमंच केवल संवाद बोलने का माध्यम नहीं था, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन को समझने और समाज से संवाद स्थापित करने का सशक्त साधन था।

मराठी रंगभूमि को दी आधुनिक दृष्टि

साठ के दशक का समय भारतीय रंगमंच के लिए परिवर्तन का दौर था। उस समय मराठी रंगभूमि परंपरागत प्रस्तुतियों तक सीमित थी। ऐसे समय में विजया मेहता ने विजय तेंदुलकर, डॉ. श्रीराम लागू, अरविंद देशपांडे जैसे विचारशील रंगकर्मियों के साथ मिलकर 'रंगायन' की स्थापना की और मराठी प्रायोगिक रंगमंच की ऐसी नींव रखी, जिसने पूरे भारतीय रंगमंच की दिशा बदल दी।उन्होंने पश्चिमी रंगपरंपरा और भारतीय नाट्यशास्त्र के बीच अद्भुत संतुलन स्थापित किया। बर्टोल्ट ब्रेख्त, इओनेस्को जैसे विश्वविख्यात नाटककारों के विचारों को भारतीय परिवेश में आत्मसात करते हुए उन्होंने मंचीय प्रस्तुति की एक नई शैली विकसित की। उनके निर्देशन में मंच पर केवल दृश्य नहीं बदलते थे, बल्कि दर्शकों की सोच भी बदलती थी।

कलाकार नहीं, कलाकारों की शिल्पकार थीं विजया मेहता

विजया मेहता की सबसे बड़ी पहचान उनके द्वारा गढ़े गए कलाकार हैं। नाना पाटेकर, अशोक सराफ, नीना कुलकर्णी, सुहास जोशी, प्रतिमा कुलकर्णी जैसे अनेक दिग्गज कलाकारों ने स्वीकार किया कि अभिनय की वास्तविक शिक्षा उन्हें विजया मेहता से मिली।नाना पाटेकर ने उनके निधन पर कहा है "मेरे जीवन में तीन महिलाओं को माँ का स्थान प्राप्त था मेरी जन्मदात्री माँ, सुलभा देशपांडे और विजया मेहता। अभिनय में जो कुछ भी हूँ, वह विजयाबाई की ही देन है। उन्होंने मिट्टी के एक साधारण से ढेले को कलाकार का आकार दिया। उनके जाने से ऐसा लग रहा है, जैसे एक बार फिर अनाथ हो गया हूँ।"यह श्रद्धांजलि केवल नाना की नहीं, बल्कि उन असंख्य कलाकारों की भावना है, जिनके व्यक्तित्व को विजयाबाई ने अपने ज्ञान, अनुशासन और स्नेह से संवारा।

अभिनय उनके लिए संवाद नहीं, जीवन था

विजया मेहता कहा करती थीं "मंच पर अभिनय करने से पहले जीवन को पढ़ना सीखिए। जो जीवन को नहीं समझता, वह चरित्र को कभी नहीं समझ सकता।"उनका मानना था कि एक अभिनेता को अपने संवाद से पहले मौन का अर्थ समझना चाहिए। आँखों की भाषा, शरीर की मुद्रा, चलने का ढंग और मंच पर उपस्थित प्रत्येक क्षण ये सब अभिनय के उतने ही महत्वपूर्ण अंग हैं, जितने शब्द।वे कलाकारों से कहा करती थीं कि हर व्यक्ति अपने जीवन में कोई न कोई भूमिका निभा रहा है। अभिनेता का काम केवल उन भूमिकाओं को ईमानदारी से पहचानना और मंच पर पुनर्जीवित करना है।

इंदौर से उनका आत्मीय रिश्ता

विजया मेहता का इंदौर से भी विशेष आत्मीय संबंध रहा। वर्ष 2017 में सांस्कृतिक संस्था 'सानंद' के आमंत्रण पर वे इंदौर आई थीं। उस अवसर पर उन्हें 'जीवन गौरव सम्मान' से अलंकृत किया गया। यह केवल सम्मान समारोह नहीं था, बल्कि इंदौर के रंगकर्मियों के लिए सीखने और प्रेरणा प्राप्त करने का दुर्लभ अवसर भी था।दो दिनों तक चली उनकी कार्यशाला आज भी इंदौर के रंगमंच से जुड़े कलाकारों की स्मृतियों में जीवंत है।उस कार्यशाला में उन्होंने कहा था "अनुभव ही मनुष्य का सबसे बड़ा शिक्षक है। अभिनेता को सबसे पहले स्वयं को जानना चाहिए। जितना अधिक वह अपने भीतर उतरेगा, उतनी ही गहराई उसके अभिनय में आएगी।" उन्होंने अभिनय को तकनीक नहीं, साधना बताया।

'सानंद' में सुनाए जीवन के अनुभव

इंदौर प्रवास के दौरान उन्होंने अपने जीवन के अनेक रोचक प्रसंग साझा किए।उन्होंने प्रसिद्ध मराठी नाटक 'जावई माझा भला' का उल्लेख करते हुए बताया कि एक समय ऐसा भी आया जब अभिनेता विक्रम गोखले ने एक भूमिका करने से इंकार कर दिया था। तब उन्होंने धैर्यपूर्वक पूरी परिस्थिति को समझाया और कलाकार को यह विश्वास दिलाया कि कोई भी भूमिका छोटी नहीं होती। उनका मानना था कि कलाकार की पहचान भूमिका की लंबाई से नहीं, उसके अभिनय की सच्चाई से होती है।उन्होंने कलाकारों को समझाया कि रंगमंच पर खड़े होने से पहले यह जानना आवश्यक है कि मंच पर केवल आप नहीं हैं आपके साथ प्रकाश, मौन, सहकलाकार, संगीत और दर्शकों की संवेदनाएँ भी अभिनय का हिस्सा हैं।उन्होंने कहा था "अभिनेता को मंच पर हर क्षण सजग रहना चाहिए। दर्शक केवल आपके संवाद नहीं सुनता, वह आपके मौन को भी पढ़ता है।"

'जीवन में हर व्यक्ति अभिनेता है'

इंदौर की कार्यशाला में उनका एक वाक्य सबसे अधिक चर्चित रहा "जीवन में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं, जो अभिनय नहीं करता। हर मनुष्य परिस्थितियों के अनुसार अनेक भूमिकाएँ निभाता है। अभिनेता केवल उन्हें सचेत रूप से जीता है।"उन्होंने बच्चों के व्यवहार का उदाहरण देते हुए बताया कि कल्पना ही अभिनय की पहली पाठशाला है। बच्चे बिना किसी प्रशिक्षण के अपनी कल्पना से पूरा संसार रच लेते हैं। वही स्वाभाविकता कलाकार को महान बनाती है।

सम्मानों से कहीं बड़ा था उनका योगदान

विजया मेहता को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, टैगोर रत्न, एशिया पैसिफिक फिल्म फेस्टिवल सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए।उन्होंने फिल्मों में भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। 'पार्टी', 'राव साहेब', 'पेस्टनजी' जैसी फिल्मों ने समानांतर सिनेमा को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। वर्ष 1986 में उन्हें फिल्म 'राव साहेब' के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।लेकिन यदि उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि पूछी जाए तो वह पुरस्कार नहीं, बल्कि उनके शिष्यों की वह पीढ़ी है, जिसने भारतीय रंगमंच को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

एक युग का अवसान

विजया मेहता ने सिद्ध कर दिया कि रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की आत्मा का दर्पण है। उन्होंने कलाकारों को अभिनय नहीं, संवेदनशील मनुष्य बनना सिखाया। उन्होंने मंच को विचारों की प्रयोगशाला बनाया, जहाँ हर प्रस्तुति समाज से एक नया संवाद करती थी।आज उनके जाने से मंच पर एक रिक्तता अवश्य उत्पन्न हुई है, किंतु उनकी विचारधारा, उनकी रंगदृष्टि और उनका सांस्कृतिक अवदान भारतीय रंगमंच की प्रत्येक पीढ़ी का मार्गदर्शन करता रहेगा।वे भले ही देह से विदा हो गई हों, परंतु भारतीय रंगमंच का हर मंच, हर प्रकाशपुंज, हर संवाद और हर गंभीर अभिनय उनके अमिट स्पर्श का साक्षी बना रहेगा।विजया मेहता जैसी विभूतियाँ समय की सीमाओं में नहीं बंधतीं। वे इतिहास नहीं बनतीं, वे परंपरा बन जाती हैं।

भावभीनी श्रद्धांजलि।

 

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