राजनारायण अग्निहोत्री ने 19 वर्ष की आयु में लोकतंत्र की रक्षा के लिए आपातकाल के दौरान अनेक कठिनाइयों का सामना किया और जेल में 19 महीने बिताए।
भोपाल। वर्तमान में भोपाल निवासी तथा मत्स्य विभाग से उप संचालक पद से सेवानिवृत्त राजनारायण अग्निहोत्री बताते हैं कि वर्ष 1975 में वे शहडोल महाविद्यालय में एम.एससी. प्रथम वर्ष के विद्यार्थी थे। साथ ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता और महाविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष भी थे। 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू हुआ तो पूरे देश में भय और दमन का वातावरण फैल गया। विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राष्ट्रवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गई। ऐसे समय में विद्यार्थी परिषद ने भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए आंदोलन का आह्वान किया।
वे बताते हैं कि 30 जून 1975 को, आपातकाल लागू होने के केवल पांच दिन बाद, उन्होंने लगभग 20 से 25 विद्यार्थियों के साथ शहडोल महाविद्यालय में परीक्षा का बहिष्कार करते हुए शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया। प्रशासन ने इसे चुनौती के रूप में लिया। महाविद्यालय के प्राचार्य ने तत्काल पुलिस बुला ली और सभी आंदोलनकारी विद्यार्थियों को गिरफ्तार करा दिया। पहले पूरी रात थाने में रखा गया, फिर शहडोल जेल भेजा गया और अगले ही दिन उन्हें केंद्रीय जेल रीवा पहुंचा दिया गया। वहां शहडोल, सीधी, सतना और रीवा संभाग के अनेक स्वयंसेवक, विद्यार्थी और राजनीतिक बंदी पहले से निरुद्ध थे।
राजनारायण अग्निहोत्री बताते हैं कि जेल के भीतर भी लोकतंत्र की लड़ाई समाप्त नहीं हुई थी। एक दिन केंद्रीय जेल रीवा के निरीक्षण के लिए तत्कालीन कलेक्टर पहुंचे। राजनीतिक बंदियों ने यह मांग रखी कि अन्य जेलों की तरह उन्हें भी 'ए' श्रेणी की सुविधाएं मिलनी चाहिए, जबकि रीवा जेल में उन्हें सामान्य अपराधियों की तरह 'सी' श्रेणी में रखा जा रहा था। इसी दौरान किसी बंदी की कलेक्टर से तीखी बहस हो गई। इससे नाराज होकर कलेक्टर उसी रात भारी पुलिस बल के साथ फिर जेल पहुंचे। बैरकों से कई स्वयंसेवकों और मीसा बंदियों को बाहर निकलवाकर निर्ममता से पिटवाया गया।
वे बताते हैं कि अनेक बंदियों के गले, हाथ और पैरों में भारी जंजीरें डाल दी गई। उन्हें लगभग छह वर्गफुट की संकरी कोठरियों में बंद रखा जाता था, जहां भोजन करना, विश्राम करना और शौच जैसी आवश्यकताएं भी उसी सीमित स्थान पर पूरी करनी पड़ती थीं। लगातार दस-बारह दिनों तक राजनीतिक बंदियों के साथ मारपीट और प्रताड़ना का सिलसिला चलता रहा। बाद में कुछ बंदियों को जबलपुर और टीकमगढ़ जेल भी भेज दिया गया। सौभाग्य से वे स्वयं इस विशेष यातना से बच गए, लेकिन अपने साथियों पर हुए अत्याचार उनकी स्मृतियों में आज भी उतने ही ताजा है।
जेल में रहते हुए अनेक अधिकारी और तत्कालीन सत्ताधारी दल के लोग उन्हें समझाते थे कि अभी उम्र केवल उन्नीस वर्ष है, क्यों अपना जीवन और भविष्य नष्ट कर रहे हो। उनसे कहा जाता कि यदि वे तत्कालीन प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों का समर्थन करते हुए माफीनामा लिख दें तो तुरंत रिहाई मिल सकती है। इसी बीच उनकी मां उनसे मिलने जेल पहुंचीं। उन्हें भी लगा कि शायद मां घर लौटने की सलाह देंगी, लेकिन मां ने केवल इतना कहा 'निर्णय तुम्हें स्वयं लेना है, जो तुम्हें उचित लगे वही करना।' मां के इन शब्दों ने उनके मनोबल को और दृढ़ कर दिया। उन्होंने माफी मांगने से स्पष्ट इनकार कर दिया और पूरे उन्नीस महीने जेल में रहकर संघर्ष किया।
वे स्वीकार करते हैं कि इस निर्णय की कीमत उन्हें अपनी पढ़ाई से चुकानी पड़ी। जेल से मुक्त होने के बाद उन्होंने विधि की पढ़ाई पूरी की। अंतिम वर्ष में पूरक परीक्षा आने के बावजूद उन्होंने मत्स्य विभाग की अधिकारी भर्ती परीक्षा दी और सफल भी हुए। लेकिन तब तक सरकार बदल चुकी थी। नियुक्ति प्रक्रिया रोक दी गई। उन्हें अपनी वैध नियुक्ति प्राप्त करने के लिए पहले सचिवालय और बाद में उच्च न्यायालय तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। अंततः न्याय मिला और वे सरकारी सेवा में नियुक्त हुए। उनका कहना है कि बाद के वर्षों में जब-जब कांग्रेस की सरकार बनी, तब-तब उन्हें विभिन्न प्रशासनिक कठिनाइयों और दूरस्थ स्थानांतरणों का सामना करना पड़ा, किंतु वे हर चुनौती का धैर्यपूर्वक सामना करते रहे।
राजनारायण अग्निहोत्री कहते हैं कि जेल में लंबे समय तक रहते-रहते एक समय ऐसा भी आया जब यह विश्वास डगमगाने लगा था कि शायद अब कभी रिहाई नहीं होगी। उन्हें लगता था कि यदि आम चुनाव में तत्कालीन सरकार फिर सत्ता में लौट आई तो जीवन का शेष समय भी जेल में ही बीत जाएगा। यहां तक कि मन में यह विचार भी आने लगा था कि शायद उनकी अर्थी भी जेल से ही निकलेगी। लेकिन लोकतंत्र की शक्ति अंततः विजयी हुई। चुनाव हुए, सत्ता परिवर्तन हुआ और सभी राजनीतिक बंदियों के लिए जेल के द्वार खुल गए।
वर्ष 2014 में शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका सामाजिक जीवन नहीं रुका। 2015 में वे सेवाभारती से जुड़े। संगठन में पहले मंडल, फिर जिला अध्यक्ष का दायित्व निभाया और पिछले सात वर्षों से सेवाभारती मध्यभारत प्रांत के कोषाध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे हैं। वे लोकतंत्र सेनानी संघ में भी प्रांतीय कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उनका जीवन इस सत्य का सशक्त प्रमाण है कि लोकतंत्र केवल संविधान की धाराओं से सुरक्षित नहीं रहता, बल्कि उन साहसी नागरिकों के त्याग, तप और अडिग संकल्प से जीवित रहता है, जो व्यक्तिगत भविष्य से ऊपर राष्ट्र और लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थान देते हैं।
इतिहास में कुछ ऐसे अध्याय होते हैं, जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि उन्हें जीने वाले लोग अपने जीवन से लिखते हैं। देश में लागू आपातकाल का दौर भी ऐसा ही एक अध्याय है। उस समय हजारों युवाओं ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपने सपनों, शिक्षा, करियर और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं तक का त्याग किया। ऐसे ही लोकतंत्र सेनानी हैं राजनारायण अग्निहोत्री, जिन्होंने मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में अपने उज्ज्वल भविष्य को दांव पर लगाकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प लिया। परीक्षा का बहिष्कार किया, गिरफ्तारी दी, उन्नीस महीने जेल में बिताए और इसके परिणामस्वरूप अपनी पढ़ाई के दो महत्वपूर्ण वर्ष गंवा दिए। लेकिन परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न रहीं, उन्होंने न तो माफीनामा लिखा और न ही अपने सिद्धांतों से समझौता किया।