रायसेन में RSS के ऐतिहासिक विकास, सुदर्शन जी के प्रवास, शाखा विस्तार, सेवा कार्य और संगठन की वृद्धि पर विस्तृत रिपोर्ट। जानिए कैसे 1944 से संघ ने जिले में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाई।
रायसेन जिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य सन् 1944 में बेगमगंज से प्रारंभ हुआ। यहाँ पहली शाखा लगने के साथ ही संगठन के बीज इस क्षेत्र की भूमि में रोपे गए। प्रारंभिक स्वयंसेवकों में दुर्गाप्रसाद नामदेव और उमाशंकर खरे जैसे कार्यकर्ताओं की उल्लेखनीय भूमिका रही। उसी समय शासकोप सेवा में रहते हुए जुगलकिशोर भार्गव बेगमगंज में पदस्थ थे। उन्होंने प्रचारक के समान समर्पण के साथ संघ कार्य को आगे बढ़ाया और आसपास के क्षेत्रों में शाखाओं के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
इसके बाद सन् 1945 में रायसेन नगर में शाखा प्रारंभ हुई। इस कार्य का श्रेय कृष्णगोपाल चौबे को जाता है। पढ़ाई के दौरान भोपाल में उनका संपर्क संघ से हुआ और बाद में जब वे रायसेन आते, तो स्थानीय युवाओं को संगठित कर शाखा लगाते। रायसेन में पहली शाखा श्यामसुंदर के खंडहरों में लगी थी। प्रारंभिक दिनों में विश्वनाथ सिंह, कुंदनलाल, रामचरण, रघुनंदन अग्रवाल, बृजमोहन अग्रवाल और गफूलाल सक्सेना जैसे युवाओं ने इस कार्य में सक्रिय सहयोग दिया। सिलवानी तहसील में संघ कार्य का प्रारंभ लगभग सन् 1946 के आसपास हुआ। वनवासी बहुल क्षेत्र होने के बावजूद स्वयंसेवकों ने नियमित शाखाएं प्रारंभ की और धीरे-धीरे संगठन का विस्तार किया। इन प्रयासों से जिले में संघ कार्य की मजबूत नींव पड़ी।
संगठनात्मक विस्तार और नेतृत्वः समय के साथ रायसेन जिले में संघ कार्य निरंतर विकसित होता गया। विभिन्न कालखंडों में अनेक समर्पित कार्यकर्ताओं ने संगठन की जिम्मेदारियां निभाई। जिला संपचालक के रूप में ठाकुर धनराजसिंह ने दायित्व संभाला, जबकि जिला कार्यवाह के रूप में जुगलकिशोर भार्गव, हरिनारायण सक्सरेना, रमेश दीक्षित, तुलसीराम गुप्ता, रमेश रघुवंशी और देवकरण पटेल ने संगठन को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिला प्रचारकों के रूप में जयरामदास टहलियानी, शशिकांत पाठक, सौदानसिंह, विजय दुबे, राजेश चौधरी तथा वर्तमान में शशिकांत शर्मा ने जिले में संगठन विस्तार का कार्य किया। उनके सतत प्रयासों से अनेक कस्बों और गाँवों में शाखाएँ प्रारंभ हुई और स्वयंसेवकों की संख्या में निरंतर वृद्धि हुई.
कार्यालय और प्रशिक्षण व्यवस्थाः प्रारंभिक समय में रायसेन जिले का संघ कार्यालय बरेली में स्थित था। तिपट्टा बाजार में राजनारायण चतुर्वेदी के मकान से इसकी शुरुआत हुई। बाद में भूरा नाई और शिवगोपाल चौबे के मकानों में भी कार्यालय संचालित हुआ। जब रायसेन को जिला केंद्र बनाया गया, तब कार्यालय को रायसेन स्थानांतरित किया गया। कुछ समय तक यह बस स्टैंड स्थित देवकरण पटेल के मकान में रहा और वर्तमान में दशहरा मैदान स्थित सरस्थती शिशु मंदिर परिसर से संचालित हो रहा है। संघ शिक्षा वर्गों के माध्यम से संगठनात्मक प्रशिक्षण भी निरंतर चलता रहा। जिले में अब तक 258 प्रथम वर्ष, 52 द्वितीय वर्ष और 14 तृतीय वर्ष शिक्षित स्वयंसेवक तैयार हो चुके हैं, जो समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
प्रमुख कार्यक्रम और अभियानः रायसेन जिले में समय-समय पर अनेक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित हुए, जिन्होंने संगठन को नई ऊर्जा प्रदान की। सन् 1952 में रायसेन के चौपड़ा में आयोजित शीत शिविर विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। इसमें लगभग 250 स्वयंसेवक सहभागी बने और समापन कार्यक्रम में लगभग 2500 नागरिक उपस्थित रहे। इस शिविर में बाबासाहब नातू ने स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया
सेवा कार्य और जनजागरण
संघ के स्वयंसेवकों ने सेवा कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाई है। नर्मदा और बेतवा नदियों में आई बाढ़ के समय राहत कार्य किए गए। सन् 1965 की बाढ़ में स्वयंसेवकों ने कपड़े और भोजन एकत्र कर प्रभावित गाँवों तक पहुँचाया। इसी प्रकार 1987 में भारी वर्षा के कारण रायसेन नगर का संपर्क टूट जाने पर लगभग 1000 यात्रियों के लिए स्वयंसेवकों ने भोजन और सहायता की व्यवस्था की। सामाजिक जागरण की दिशा में भी उल्लेखनीय पहल हुई। सिलवानी तहसील के सियरमऊ गाँव में प्राचीन मूर्तियों और बादड़ी के अवशेष मिलने पर स्थानीय समाज ने मिलकर उस स्थल की रक्षा की और बाद में वहाँ मंदिर का निर्माण कराया। नकदुआ क्षेत्र में एकल विद्यालयों के माध्यम से शिक्षा और जागरूकता का कार्य भी प्रारंभ हुआ
हिन्दू सम्मेलन में सुदर्शन जी का प्रवास
सन् 1985 में माननीय सुदर्शनजी के प्रवास के अवसर पर रायसेन में विशाल हिन्दू सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें लगभग 4 हजार लोगों की सहभागिता रही। इसके पाश्थात 1988 में प्रांतीय कार्यकर्ता सम्मेलन, हिन्दू सम्मेलन, पथ संचलन और भजन मंडली प्रतियोगिता जैसे कार्यक्रम आयोजित हुए, जिनमें लगभग 15000 लोगों की उपस्थिति ने संगठन की व्यापकता को दर्शाया। सन् 1995 में नए स्वयंसेवकों को ओड़ने के लिए विशेष संपर्क अभियान चलाया गया। कार्यकर्ताओं की टोलियां प्रत्येक तहसील में जाकर पुराने स्वयंसेवकी से संपर्क करती और युवाओं को शाखा से जोड़ती। इस अभियान के परिणामस्वरूप जिले मैं गणवेशधारी स्वयंसेवकों के बड़े संवलन हुए और 3415 स्वयंसेवकों की उपस्थिति दर्ज की गई।
शक्ति न हो तो तुम्हारी पुकार पर कोई ध्यान नहीं देगा और न ही परवाह करेगा। कारण वे जानते हैं की यह दुबला जीव हमारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार