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पंजाब में कांग्रेस की आत्मघाती रणनीति

पंजाब में भी आत्मघात पर आमादा कांग्रेस

पंजाब में कांग्रेस की गलत रणनीतियों के कारण पार्टी संकट में फंसी हुई है। नेतृत्व की गलतियों से पार्टी के भीतर विभाजन और हार का सामना करना पड़ा है।


पंजाब में भी आत्मघात पर आमादा कांग्रेस

AI |

राजकुमार सिंह

ऐसा दावा नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस सरकार जनता की आकांक्षाओं पर खरी उतरी, पर सत्ता से विदाई की पटकथा खुद कांग्रेस आलाकमान ने लिखी। भाजपा से अलग होने के बाद नवजोत सिंह सिद्धू के कांग्रेस में शामिल होते ही आलाकमान उन पर इस कदर मेहरबान हुआ कि पहले सुनील जाखड़ को हटाकर उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बना दिया और फिर उनकी जिद के आगे झुकते हुए अपने सबसे वरिष्ठ नेता अमरेंद्र सिंह को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया।

'कांग्रेसी ही कांग्रेस को हराते हैं' यह कहावत जिन्हें मजाक लगती हो, उन्हें पंजाब का हाल देख लेना चाहिए। सीमावर्ती पंजाब उन चंद राज्यों में है, जहां कांग्रेस सत्ता में नहीं है, पर सत्ता की दावेदार अवश्य है। 2022 में अपनी गलतियों से पंजाब की सत्ता गंवाने के बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने वहां अच्छा प्रदर्शन किया। विधानसभा चुनाव में 117 में से 92 सीटें जीतकर इतिहास रचने वाली आम आदमी पार्टी (आप) को कांग्रेस ने कड़ी टक्कर दी। इसलिए अगले वर्ष फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता की प्रमुख दावेदार है। 18 सीटों के साथ ही सही, कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है।

1966 में पंजाब के विभाजन के बाद हुए 13 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने पांच बार जीत हासिल की है। ऑपरेशन ब्लू स्टार और सिख विरोधी दंगों के बावजूद पंजाब में कांग्रेस अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने में सफल रही है। एक दल के रूप में पंजाब को सबसे अधिक मुख्यमंत्री कांग्रेस ने ही दिए हैं। कांग्रेस को शिरोमणि अकाली दल ही चुनौती देता रहा है, जिसकी सबसे बड़ी ताकत पंथक राजनीति मानी जाती है। लेकिन पिछली बार तीन-चौथाई बहुमत से सत्ता हासिल कर आम आदमी पार्टी ने सभी परंपरागत राजनीतिक समीकरण ध्वस्त कर दिए।

लंबी छलांग लगाते हुए आप 20 से 92 सीटों पर पहुंच गई, जबकि कांग्रेस 77 से फिसलकर 18 सीटों पर सिमट गई। मात्र तीन सीटों के साथ अकाली दल पहली बार पंजाब की राजनीति में अप्रासंगिक होता नजर आया। अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद अकेले चुनाव लड़ने वाली भाजपा भी दो सीटों पर सिमट गई। अकाली दल और भाजपा का यह हश्र इसलिए भी चौंकाने वाला रहा, क्योंकि 2007 और 2012 में लगातार सत्ता का जनादेश देकर पंजाब के मतदाताओं ने हर चुनाव में सरकार बदलने की अपनी परंपरा भी तोड़ दी थी।

दरअसल, सत्ता का नशा उतारने के लिए मतदाता इसी तरह जोर का झटका धीरे से देते हैं। बेअदबी के मामलों से लेकर बेलगाम नशा तस्करी और उसकी बिक्री तक के तमाम आरोपों के चक्रव्यूह से अकाली दल निकल ही नहीं पाया। 2017 के चुनावों में भी अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की काफी चर्चा थी, लेकिन कुछ संदिग्ध संपर्कों के आरोपों तथा मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित न करने से पैदा हुई अटकलों ने उसे 20 सीटों पर रोक दिया और 77 सीटों के साथ कैप्टन अमरेंद्र सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बन गई।

ऐसा दावा नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस सरकार जनता की आकांक्षाओं पर खरी उतरी, पर सत्ता से विदाई की पटकथा खुद कांग्रेस आलाकमान ने लिखी। भाजपा से अलग होने के बाद नवजोत सिंह सिद्धू के कांग्रेस में शामिल होते ही आलाकमान उन पर इस कदर मेहरबान हुआ कि पहले सुनील जाखड़ को हटाकर उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बना दिया और फिर उनकी जिद के आगे झुकते हुए अपने सबसे वरिष्ठ नेता अमरेंद्र सिंह को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया।

सिद्धू ने बिसात तो खुद मुख्यमंत्री बनने के लिए बिछाई थी, लेकिन लॉटरी चरणजीत सिंह चन्नी की निकल गई। अमरेंद्र-जाखड़ की दिग्गज जोड़ी की कांग्रेस से बेआबरू विदाई के बावजूद सिद्धू नाराज ही रहे। टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार तक सिद्धू और चन्नी के बीच साफ दिखाई दी तनातनी ने रही-सही कसर पूरी कर दी। कांग्रेस 18 सीटों पर सिमट गई और 'ट्रंप कार्ड' बताए जा रहे दलित मुख्यमंत्री चन्नी दोनों सीटों से चुनाव हार गए।

चुनावी हार-जीत होती रहती है, लेकिन कांग्रेस की समस्या यह है कि वह सबक नहीं सीखती। मुख्यमंत्री पद के महत्वाकांक्षी सिद्धू ने चुनाव के बाद ही कांग्रेस से दूरियां बढ़ा ली थीं, लेकिन आलाकमान ने राज्य में नया नेतृत्व और मजबूत संगठन तैयार करने की दिशा में कुछ नहीं किया। आप के अलावा जमीन पर कांग्रेस ही दूसरा बड़ा दल रही, इसलिए लोकसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन अच्छा रहना ही था, पर आलाकमान उसी पर आत्ममुग्ध हो गया।

आप, अकाली दल और भाजपा की सक्रियता बढ़ती देख कांग्रेस ने भी संगठनात्मक बदलाव का संकेत तो दिया, लेकिन दरबारी संस्कृति के वशीभूत आलाकमान साहस नहीं जुटा पाया। अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बरकरार रखते हुए चन्नी को प्रचार समिति प्रमुख और सुखजिंदर सिंह रंधावा को कोर कमेटी प्रमुख बनाने जैसे प्रयोगों से अन्य दिग्गजों को साधने की कोशिश की गई, लेकिन अंतर्कलह सतह पर आ गई।

प्रदेश अध्यक्ष या मुख्यमंत्री चेहरा बनने पर आमादा चन्नी ने बागी तेवर दिखाते हुए समर्थकों की बैठक बुला ली, तो रंधावा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिल आए। सांसद मनीष तिवारी ने भी अपना दर्द सोशल मीडिया पर जाहिर किया। राजनीतिक विरोधी इसे चुनाव से पहले टूट की संभावना के रूप में देख रहे हैं, जबकि कांग्रेस को उम्मीद है कि राहुल गांधी के विदेश दौरे से लौटने पर सब कुछ ठीक हो जाएगा।

क्या होगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन पंजाब के कांग्रेसी आत्मघात पर आमादा नजर आ रहे हैं। ज्यादा अतीत में न भी झांकें तो दो तरह के उदाहरण सामने हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और हरियाणा जैसे राज्यों में नेताओं का सत्ता संघर्ष ही कांग्रेस को ले डूबा, जबकि हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में एकजुटता के दम पर उसने भाजपा से सत्ता छीन ली।

जाहिर है, मुख्यमंत्री तो एक ही नेता बनेगा। हां, उपमुख्यमंत्री बनाकर एक-दो और नेताओं का अहं संतुष्ट किया जा सकता है, लेकिन उससे पहले चुनाव जीतकर बहुमत हासिल करना होगा। इसके लिए पहली अनिवार्यता यही है कि कांग्रेस एकजुट होकर चुनाव लड़े और अच्छे उम्मीदवार उतारे।माना कि अनेक कारणों से आम आदमी पार्टी का ग्राफ गिर रहा है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछली बार उसने बहुमत के आंकड़े से भी 33 सीटें अधिक जीती थीं। दूसरी ओर शिरोमणि अकाली दल और भाजपा भी लगातार अपनी ताकत बढ़ाने में लगे हैं।

हर चुनाव के मुद्दे और उनके आधार पर मतदाताओं का फैसला अलग होता है, लेकिन हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में आप 1,977 में से केवल 945 सीटें ही जीत पाई। पिछले 11 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ कि सत्तारूढ़ दल 1,000 सीटों का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाया। दूसरी ओर कांग्रेस 380, अकाली दल 191 और भाजपा 169 सीटें जीतने में सफल रहे।

जाहिर है, 2021 में मात्र 59 सीटें जीतने वाली भाजपा अपने इस प्रदर्शन से बेहद उत्साहित है। आप के जो सात राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हुए हैं, उनमें से छह पंजाब से ही हैं। केवल सिंह ढिल्लों को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाने वाली भाजपा अन्य दलों से प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ लाने में भी जुटी है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की पंजाब में लगातार सक्रियता भी अकारण नहीं है।

पंजाब का राजनीतिक इतिहास और सामाजिक समीकरण भाजपा की चुनावी संभावनाओं को बहुत अधिक बल नहीं देते, लेकिन अकाली दल से दोबारा गठबंधन की संभावनाओं को भी नकारा नहीं जा सकता। अलग-अलग चुनाव लड़कर दोनों दल अपनी वास्तविक ताकत का आकलन कर चुके हैं। कहना न होगा कि यदि अकाली दल और भाजपा का गठबंधन होता है, तो पंजाब का चुनावी परिदृश्य पूरी तरह बदल सकता है।

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