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Parliament Runs on Rules Not Stubbornness

नियमों-परंपरा से चलती है संसद, जिद से नहीं

संसद की कार्यप्रणाली नियमों और परंपराओं पर आधारित है, जिद पर नहीं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कार्यकाल और संसदीय मर्यादाओं पर विशेष लेख।


नियमों-परंपरा से चलती है संसद जिद से नहीं

नरेंद्र सिंह तोमर

भारतीय संसदीय प्रक्रिया उन मानक प्रक्रियाओं में सम्मिलित है जिसका अनुकरण पूरी दुनिया के लोकतंत्र करते हैं। राजशाही और तानाशाहों जैसी शासन प्रणाली को छोड़कर लोकतंत्र को अपनाने के उत्सुक देश भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली की ओर श्रद्धा से देखते हैं। वे जानते हैं कि राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विविधताओं वाले इस देश को यहां की लोकतांत्रिक प्रणालियों ने ही एकसूत्र में बांधा हुआ है। भारतीय संविधान ने शासन तंत्र को संचालित करने का कार्य विधायिका और कार्यपालिका को दिया है। न्याय दृष्टि के साथ न्यायपालिका नियंत्रक और निगरानीकर्ता की भूमिका में है। विधायिका यानी संसद और विधानसभाओं में होने वाली कार्यवाहियों में लोकतंत्र स्पादित होता है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में विपक्ष ने जिस व्यवहार का प्रदर्शन किया है, वह इन कार्यवाहियों में बाधा ही नहीं है अपितु लोकतंत्र को ठेस पहुंचाने वाला कार्य है। 

अभी अभी लोकसभा में लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला के विरुद्ध लाया गया विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव सदन में खारिज हो गया। यह प्रस्ताव संख्या बल के कारण तो खारिज हुआ ही। इसे तो विपक्ष के मंतव्य के कारण भी खारिज हो जाना था। संसदीय कार्यव्यवस्था नियमों और मान्यत परंपराओं से संचालित होती है। वह विपक्ष या सत्तापक्ष की मन-मर्जियों से संचालित नहीं हो सकती है। लोकसभा अध्यक्ष एक व्यक्ति नहीं होता बल्कि यह नियमों का पालन, संरक्षण और संवर्धन करने वाला दायित्व है। विपक्ष अपनी अनुशासहीनता के चलते नियमों के पर्याग लोकसभा अध्यक्ष पर ही निर्मूल आरोप लगाता है तो उसको परिणति ऐसी ही होती है।

लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन है। जनता का बहुमत पाकर सत्तापक्ष शासन के सूत्र संभालता है और विपक्ष निगरानीकर्ता की भूमिका में सरकार से सवाल करता है। संविधान को आत्मार्पित करने के उपरांत अब तक भारतीय लोकतांत्रिक परंपराएं 76 वर्ष की यात्रा पूर्ण कर चुकी हैं। इस अवधि में संसद कई तरह की घटनाओं की साक्षी रही है। हमारी आस्था के केंद्र वरिष्ठ नेताओं की तीखी बहसें, आरोप-प्रत्यारोप, विरोध और असहमतियों के लंबे विमर्श लोकसभा और राज्यसभा के गौरवशाली अतीत में दर्ज हैं। कुछ अप्रिय घटनाक्रम भी हुए लेकिन नियमों और मान्य परंपराओं की मर्यादाओं को कभी जानबूझ कर ओझल नहीं होने दिया गया। सत्तापक्ष और विपक्ष ने एक-दूसरे की सहमति और असहमति का सदैव सम्मान और आदर किया है। फिर अब ऐसा क्या हुआ कि विपक्ष आक्रामकता के चरम पर पहुंच कर मर्यादाओं ध्यान नहीं रख रहा है? यह प्रश्न सामयिक है और इस पर चिंतन होना चाहिए।

चिंतन होना चाहिए। लोकतंत्र की जब भी बात होती है तो यह याद दिलाया जाता है कि सदन में कोई भी नियमों से ऊपर नहीं है। मतभेद होना अलग बात है। मतभेद को व्यक्त करना लोकतांत्रिक अधिकार है मगर जिद में, आक्रामकता से, केवल हमारी ही सुनी जाए जैसे जटिल व्यवहार से लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठेस पहुंचती है। जब कोई एक पक्ष ऐसा आचरण कर रहा होता है तो आसंदी पर बैठा व्यक्ति सिर्फ एक प्रतिनिधि नहीं रहता। वह अपने समूचे कार्य व्यावहार में लोकतंत्र का संरक्षक, पोषक और संवर्धक होता है। लोकसभा अध्यक्ष माननीय श्री ओम बिरला के अध्यक्षीय कार्यकाल को देखें तो पाएंगे कि विपक्ष के जिद्दी और आक्रामक रवैये के क्षणों में भी

वे उन्होंने अकल्पनीय संयम, संतुलन और निष्पक्षता का परिचय दिया है। नियमों के पालन के प्रति सजग थे और यही सजगता विपक्ष को खटकती रही। एक तरफ, जहां विपक्ष का अमयादित व्यवहार है, वहीं, लोकसभा अध्यक्ष माननीय ओम बिरला के कार्यकाल और नवाचार पर भी दृष्टि डाल लेनी चाहिए। सदन की कार्यवाहियां साक्षी है कि अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में श्री ओम बिरला ने निरंतर यह प्रयत्न किया है कि अधिक से अधिक सांसदों को सदन में बोलने का अवसर मिले। युवा सांसदों, पहली बार निर्वाचित होकर आए जनप्रतिनिधि को, महिला सांसदों और संख्या में कम सांसदों को भी पर्याप्त समय देना सुनिश्चित किया गया। ऐसा होने पर ही 17वीं लोकसभा ने लगभग 97 प्रतिशत की कार्य उत्पादकता हासिल की है। यह पिछले दो दशकों की उल्लेखनीय उपलब्धि है। 2019 से अब तक आयोजित 21 सत्रों में से 10 सत्र ऐसे रहे, जिनमें सदन की उत्पादकता 100 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई। वर्ष 2025 के शीतकालीन सत्र में तो लोकसभा ने निर्धारित समय से भी अधिक काम करते हुए 103 प्रतिशत कार्य निष्पादन किया है। यही कारण है कि 17वीं लोकसभा में सत्तापक्ष के भारी बहुमत के बावजूद विपक्ष और गैर-एनडीए दलों को कुल चर्चा समय का लगभग 61.05 प्रतिशत अर्थात 807 घंटे प्रदान किए गए। अपने कार्यकाल में नियमों और प्रक्रियाओं को समृद्ध करने की लोकसभा अध्यक्षों की परंपरा को अग्रसर करते हुए श्री ओम बिरला द्वारा नवनिर्वाचित और अपेक्षाकृत कम चर्चित सांसदों को अपनी बात रखने के लिए प्राथमिकता दी गई। 

नवनिर्वाचित सांसदों के लिए प्रबोधन कार्यक्रम आयोजित कर उन्हेर संसदीय प्रक्रिया, नियमों और संसदीय परंपराओं से परिचित करवाना लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करने का ही तो प्रयत्न था। लोकसभा के संसदीय शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान 'प्राइड' के माध्यम से विभिन्न विधानसभाओं तथा संसद के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए भी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। समिति प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से पीठासीन अधिकारियों की एक समिति का गठन भी किया गया, जिसका उद्देश्य संसद तथा राज्य विधानसभाओं को समिति व्यवस्था की समीक्षा करना है। संसदीय प्रक्रियाओं में एकरूपता लाने के उद्देश्य से देश की विभिन्न विधानसभाओं के कार्य संचालन नियमों की समीक्षा के लिए भी एक समिति का गठन किया गया, जिसकी अध्यक्षता उत्तरप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष श्री सतीश महाना को सौंपी गई है। इसे भारतीय संसदीय संघीय ढांचे में समन्वय को सशक्त बनाने का स्तुतत्यक प्रयत कहा जाना चाहिए।

श्री ओम बिरला के नेतृत्व में लोकसभा को 'पेपरलेस' बनाने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य हुआ है। भारतीय लोकतंत्र का आदर्श होना किसी एक व्यक्ति का कार्य नहीं है बल्कि यह समवेत प्रयासों का सुफल है। यह हम सभी चुने हुए जनप्रतिनिधियों का सौभाग्य और दायित्व है कि हम लोकतांत्रिक प्रक्रिया को समृद्ध करें, इसका संरक्षण करें, इसे संवर्धित करें लेकिन इसे पंगु, निरंकुश और अशक्त बनाने का कार्य न करें। कष्ट यही है कि विपक्ष इस राह पर चल रहा है। विपक्ष के अमयादित व्यावहार के समक्ष लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला का कार्यकाल प्रेरणा, उम्मीद और आश्वस्ति का पर्याय बन गया है। उन्हें इस अनुकरणीय कार्य के लिए बधाई और शुभेच्छाएं।