ऑपरेशन कगार को अब तक मुख्यतः एक सुरक्षा अभियान के रूप में देखा गया है। यह आकलन सही तो है, पर अधूरा है। भारत में वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ दशकों से चल रहे संघर्ष को समझने के लिए यह स्वीकार करना होगा कि यह लड़ाई हमेशा दो मोर्चों पर लड़ी गई है। पहला, ज़मीन पर जंगलों, पहाड़ियों, ठिकानों और आपूर्ति तंत्र को ध्वस्त करने की प्रत्यक्ष कार्रवाई। दूसरा, विचारों के स्तर पर—जहाँ यह तय होता है कि हिंसा की व्याख्या कौन करेगा, “अधिकारों” की भाषा किसके पक्ष में जाएगी, और वैश्विक धारणा किसके प्रभाव में बनेगी।
इसी संदर्भ में ऑपरेशन कगार को देखना होगा। यह सिर्फ सशस्त्र माओवादी संरचना के खिलाफ अभियान नहीं है, बल्कि उस विचारधारात्मक ढांचे के खिलाफ भी है, जो हर आतंकवाद-रोधी कार्रवाई को “दमन” और हर माओवादी हिंसा को “प्रतिरोध” के रूप में पेश करने की कोशिश करता है।
तथ्य स्पष्ट हैं। अप्रैल–मई 2025 के बीच कर्रेगुट्टालु पहाड़ी क्षेत्र में चलाए गए अभियान में 31 माओवादी मारे गए, जिनमें 16 महिलाएं शामिल थीं, और सुरक्षा बलों को कोई क्षति नहीं हुई। इसके तुरंत बाद नारायणपुर में 27 माओवादी मारे गए, जिनमें भाकपा (माओवादी) के शीर्ष नेता बसवराजू भी थे। ये घटनाएं केवल सामरिक सफलता नहीं हैं; ये इस बात का संकेत हैं कि सुरक्षा तंत्र अब उन इलाकों में भी प्रभावी ढंग से काम कर रहा है, जो लंबे समय तक माओवादियों के सुरक्षित गढ़ रहे हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि माओवादी नेतृत्व की संरचनात्मक सुरक्षा अब पहले जैसी नहीं रही।
लेकिन इन सफलताओं के साथ ही एक समानांतर अभियान भी तेज हुआ है—सूचना के क्षेत्र में। कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठनों और वैचारिक समूहों ने ऑपरेशन कगार को “नरसंहार”, “फासीवादी युद्ध” और “अंधाधुंध हिंसा” के रूप में चित्रित करना शुरू कर दिया। इस विमर्श में एक सोची-समझी रणनीति दिखाई देती है—माओवादी कैडर और आदिवासी समुदाय के बीच की रेखा को धुंधला करना, और राज्य की हर कार्रवाई को एकतरफा हिंसा के रूप में प्रस्तुत करना।
यहाँ “नरसंहार” जैसे शब्दों का प्रयोग किसी कानूनी सटीकता के साथ नहीं, बल्कि प्रभाव पैदा करने के लिए किया जा रहा है। यह प्रोपेगेंडा का एक पारंपरिक तरीका है—जटिल वास्तविकताओं को एक सरल, भावनात्मक और नैतिक रूप से निर्णायक कथा में बदल देना।
माओवादी समर्थक कथन इसी रणनीति पर काम करते हैं। वे आदिवासी समाज और सशस्त्र संगठन के बीच के अंतर को मिटा देते हैं; सुरक्षा अभियानों की जटिलता को नजरअंदाज कर राज्य को एकमात्र हिंसक पक्ष के रूप में प्रस्तुत करते हैं; और प्रमाण का पूरा बोझ सरकार पर डाल देते हैं, जबकि माओवादियों के अपने हिंसक इतिहास को गौण बना देते हैं। जबकि भाकपा (माओवादी) का रिकॉर्ड—हत्या, बारूदी सुरंग हमले, जबरन वसूली, भर्ती और बुनियादी ढांचे को नष्ट करना—किसी भी निष्पक्ष विश्लेषण में केंद्रीय होना चाहिए।
इस चुनौती का जवाब केवल खंडन से नहीं दिया जा सकता। इसके लिए एक स्पष्ट और सुविचारित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। पहला, जहाँ तक संभव हो, अभियानों से संबंधित तथ्यों को पारदर्शिता के साथ सामने लाना होगा। दूसरा, यह स्पष्ट करना होगा कि आदिवासी अधिकारों की रक्षा और माओवादी हिंसा का उन्मूलन परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। तीसरा, हर उस आरोप का उत्तर ठोस तथ्यों और राज्य के कार्यों के रिकॉर्ड के साथ देना होगा, जो इन अभियानों को “आदिवासी विरोधी” बताता है।
इस संदर्भ में विकास और प्रशासन का पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। संसद में प्रस्तुत आँकड़े बताते हैं कि वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सड़कों, संचार, शिक्षा और बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार तेजी से हुआ है। हजारों किलोमीटर सड़कों का निर्माण, मोबाइल टावरों की स्थापना, एकलव्य विद्यालयों का संचालन, और बैंकिंग सेवाओं का विस्तार—ये सभी इस बात के संकेत हैं कि राज्य का उद्देश्य इन क्षेत्रों को अलग-थलग छोड़ना नहीं, बल्कि उन्हें मुख्यधारा से जोड़ना है।
“नरसंहार” जैसे आरोपों का सबसे प्रभावी उत्तर इसी व्यापक दृष्टिकोण में निहित है। यह पूरी तरह उचित है कि सुरक्षा अभियान कानून के दायरे में हों, नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हो, और किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच हो। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि सशस्त्र हिंसा को वैचारिक वैधता न दी जाए, चाहे वह किसी भी सामाजिक या भौगोलिक संदर्भ में क्यों न हो।
डिजिटल युग में यह चुनौती और जटिल हो गई है। अब कोई भी अभियान स्थानीय नहीं रहता; हर घटना को वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाया जा सकता है। ऐसे में यदि राज्य केवल ज़मीन पर सफलता हासिल करता है, लेकिन विचारों के स्तर पर पीछे रह जाता है, तो स्थिति असंतुलित हो सकती है—जहाँ सामरिक सफलता के बावजूद नैतिक अस्पष्टता बनी रहती है।
इसलिए आगे की रणनीति स्पष्ट होनी चाहिए—अधिक प्रमाणित जानकारी का सार्वजनिक प्रसार, कानूनी प्रक्रियाओं की दृढ़ता, सरल और स्पष्ट संवाद, और नागरिकों तथा सशस्त्र तत्वों के बीच स्पष्ट भेद। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आदिवासी प्रश्न को माओवादी दृष्टिकोण के हवाले न किया जाए।
आदिवासी अधिकारों की रक्षा किसी बाहरी वैचारिक संरचना पर निर्भर नहीं है। और यदि राज्य इस दिशा में गंभीर है, तो उसे उस सशस्त्र ढांचे को समाप्त करने में भी उतना ही गंभीर होना होगा, जिसने लंबे समय तक इन मुद्दों का राजनीतिक उपयोग किया है।
अंततः, ऑपरेशन कगार की सफलता का मूल्यांकन केवल सैन्य उपलब्धियों से नहीं किया जाना चाहिए। असली कसौटी यह होगी कि क्या भारत उस पुरानी प्रवृत्ति को बदल पाता है, जिसमें हिंसक संगठन स्वयं को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करते हैं और राज्य को एकमात्र दोषी ठहराया जाता है। इस प्रवृत्ति को समाप्त करना केवल एक पूरक लक्ष्य नहीं, बल्कि इस पूरे अभियान का अभिन्न हिस्सा है।