भारत में नक्सलवाद कमजोर पड़ रहा है। रेड कॉरिडोर अब ग्रीन कॉरिडोर में बदल रहा है। सुरक्षा और विकास के मॉडल से बड़े बदलाव का दावा।
सतीश कुमार
स्वतंत्रता भारत के इतिहास में अगर जंबू कश्मीर से आलेख 370 के समाप्त होने के बाद अगर कोई परिवर्तन हुआ है तो वह नक्सलवाद का अंत के रूप में देखा जा सकता है। नक्सलवाद भारत के 12 राज्यों के लिए नासूर बन गया था, स्थिति इतनी भयानक और दर्दनाक बन गई थी कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आतंकवाद और अलगाववाद से भी इसे ज्यादा घातक माना था। पहली बार 2006 में मुख्यमंत्री सम्मलेन में मनमोहन से यह बात कही उसके बाद वह निरंतर 2011 तक इसे दोहराते रहे। गृहमंत्री अमित शाह ने सही कहा कि मनमोहन सिंह रोग को तो पहचान लिया लेकिन उसका सुनयोजित उपचार नहीं कर पाए। इसका कारण था कि कांग्रेस शासन काल खंड में माओवादी सत्ता के साथ चिपकी हुई थी, बुद्धिजीवी का बड़ा तबका नक्सलवाद के साथ खड़ा था। इसलिए बात बन नहीं पाई। जब सुकमा में सैकड़ों की अर्द्धसैनिक बल बलिदान हुए ती वह तबका हमेशा चुप रहा, और एक भी नक्सली अगर पुलिस के हाथों मारा गया तो पूरे देश में बवाल खड़ा किया जाता रहा। यही नियति 4 दशकों तक बनी रही। सामाजिक न्याय और मानवाधिकार के नाम पर नक्सलवाद को खूब हवा दी गई। आग इतनी तीखी थी कि कई जिलों में नक्सली सामानांतर सरकार भी चलाने लगे। राज्य के पहुंच से नक्सली बहार थे। पुलिस थाने से गोली बन्दूक लूट कर आतंक का वातावरण बनाया गया। विकास बनाम गरीबी का गलत व्याख्या की गई। यह कहा गया कि गरीबी की वजह से नक्सलवाद फैल रहा है जबकि सच्चाई थी कि नक्सलवाद के कारण विकास ठप पड़ा हुआ था। विचारधारा के नाम पर फिरौती और गुंडागर्दी का माहौल बनाया गया। बड़े-बड़े पुलिस अधिकारी अपनी सुरक्षा के लिए नक्सल को पैसा देते थे जिससे उनके और उनके परिवार की सुरक्षा बनी रहे।
भारत वर्तमान में अपने आंतरिक सरक्षा परिदृश्य में एक ऐतिहासिक मोडका गवाह बन रहा है। जिसे कभी देश का 'सबसे बड़ा आंतरिक खतरा' बताया गया था, उसे अब व्यवस्थित रूप से समाप्त किया जा रहा है, जिससे कानून के शासन की बहाली का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। यह संक्रमण-जिसे 'रेड कॉरिडोर' (लाल गलियारे) का 'ग्रीन कॉरिडोर' (हरे गलियारे) में परिवर्तन के रूप में प्रतीकित किया गया है-भारत के परिवेश में एक गहरा बदलाव दर्शाता है। 'नक्सल मुक्त भारत' के अभियान को हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में रेखांकित किया। उनका मूल्यांकन स्पष्ट हैः नक्सलवाद 'विलुप्ति की कगार' पर है और बस्तर जैसे अपने पारंपरिक गढ़ों से उखड़ चुका है। महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने उग्रवाद से जुड़ी पुरानी सामाजिक-आर्थिक धारणा को चुनौती दी है। नक्सलवाद को गरीबी या सामाजिक अन्याय के उत्पाद के रूप में देखने के बजाय, वर्तमान प्रशासन इसे लोकतंत्र के विरुद्ध एक वैचारिक युद्ध के रूप में परिभाषित करता है। पारंपरिक तर्क को उलटते हुए यह तर्क दिया गया है कि इन क्षेत्रों में गरीबी नक्सलवाद के कारण बनी रही, क्योंकि विद्रोहियों ने स्कूलों, सड़कों और अस्पतालों को नष्ट करके जानबूझकर 'शासन शुन्यता' पैदा की ताकि उनकी विचारधारा अलग-थलग माहौल में फल-फूल सके।
इस बदलाव को समझने के लिए इस आंदोलन के पांच दशक के प्रक्षेपवक्र की समीक्षा करनी होगी। अप्रैल 2006 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने नक्सलवाद को 'हमारे देश द्वारा सामना की गई अब तक की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती' घोषित किया था। हालांकि सिंह ने 'बीमारी' का सही निदान किया था, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि उनका प्रशासन 'इलाज' प्रदान करने में विफल रहा। यूपीए काल के दौरान, रेड कॉरिडोर अपने चरम पर था और 126 जिलों तक फैला हुआ था। कुछ विश्लेषकों का सुझाव है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और नागरिक समाज के भीतर माओवादी सहानुभूति रखने वालों के कथित प्रभाव ने निर्णायक संघीय कार्रवाई में बाधा डाली।नक्सलवादी आंदोलन 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में 1967 के विद्रोह से शुरू हुआ था। 1970 के दशक तक, यह बिहार, ओडिशा और आंध्रप्रदेश (विशेष रूप से श्रीकाकुलम विद्रोह के माध्यम से) में फैल गया। यह यग शाहती केंद्रों के कुलीन छात्रों के कट्टरपंथ का गवाह बना, जिन्होंने 'वर्ग शत्रुओं के विनाश' के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। विद्रोहियों का रणनीतिक लक्ष्य 'पशुपति से तिरुपति' तक का संपर्क बनाना था-क्षेत्र का एक निरंतर विस्तार जिसका उद्देश्य नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) को मध्य और दक्षिण भारत में सीपीआई (माओवादी) से जोड़ना था। इस गलियारे ने राज्य पुलिस बलों के बीच समन्वय की कमी का फायदा उठाया, जिससे हथियारों, कर्मियों और चरमपंथी विचारधारा की निर्वाध आवाजाही संभव हो सकी।
'विलुप्ति' की वर्तमान स्थिति तक पहुंचने का मार्ग भारी रक्तपात से भरा था। राष्ट्रीय मानस को झकझोर देने वाली प्रमुख घटनाओं में शामिल हैं: दंतेवाड़ा (2010): एक बड़े घात लगाकर किए गए हमले में 76 सीआरपीएफ जवानों का नरसंहार। झीरम घाटी (2013): एक राजनीतिक हत्याकांड जिसने छत्तीसगढ़ कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को समाप्त कर दिया। जहानाबाद जेल तोड़ना (2005): एक साहसिक घेराबंदी जहां नक्सलवादियों ने लगभग 350 कैदियों को छुड़ा लिया था। रफीगंज ट्रेन तोड़फोड़ (2002): राजधानी एक्सप्रेस का पटरी से उतरना, जिसमें 130 मौतें हुई। इन घटनाओं ने कई जिलों को भय की स्थायी छाया में रहने को मजबूर कर दिया और मानव विकास के सभी रूपों को रोक दिया। 'श्री-फ्रंट' रणनीति अबूझमाड़ जैसे 'अनकनेक्टेड' या 'ग्रे' क्षेत्रों में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के कैंप स्थापित करने पर केंद्रित है। ये कैंप राज्य की उपस्थिति के आधार स्तंभ के रूप में कार्य करते हैं। एक बार क्षेत्र सुरक्षित हो जाने के बाद, सरकार यह सुनिश्चित करती है कि 'विकास ध्वज का अनुसरण करे' यानी उपेक्षा के कारण होने वाली भर्ती को रोकने के लिए तुरंत स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र जैसे बुनियादी ढांचे का निर्माण किया जाता है। सरकार ने समर्थन संरचनाओं के संबंध में 'बिना भ्रम के स्पष्ट नीति' अपनाई है। एनआईए और ईडी का उपयोग करते हुए, राज्य ने आंदोलन की वित्तीय और रसद पाइपलाइनों को बंद करने के लिए कदम उठाए है। यह न केवल जंगल में लड़ने वालों को निशाना बनाता है, बल्कि 'शहरी नक्सलियों' को भी निशाना बनाता है-ये व्यक्ति जो शहरों की सुरक्षा के बीच से वैचारिक, कानूनी और वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं। निष्कर्ष-नक्सलवाद की कमर तोड़ दी गई है। रेड कॉरिडोर ध्वस्त हो चुका है। अमित शाह की सुनयोजित सोच ने बदलाव की अद्भुत संयोग से देश के भविष्य को सुरक्षित कर दिया है।
पहले कश्मीर पुनः नक्सलवाद, भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में अलगाववाद की सनक भी कमजोर हुई है। यह सबकुछ एक विकसित भारत के लिए जरूरी भी था। इसके बिना विकास की रफ्तार कुंधित हो जाती। सड़कों पर हादसा का संशय हो तो व्यापार नहीं बढ़ेगा। नक्सल मुक्त भारत में अब कोई रुकावट नहीं होगी। लेकिन सबकुछ ठीक होने के बावजूद एक समस्या अभी भी है। वह विश्विद्यालय और मीडिया जगत में अर्बन नक्सल की जमात आज भी सक्रिय है। उनके ऊपर भी लगाम कसी गई है, लेकिन उनकी सोच यंग मांइड को आज भी तंग करते है। अपने देश और संस्कृति को लेकर अनाप सनाप तथ्य और बयान से गलत नैरेटिव रचते है। इसका हल राष्ट्र के राष्ट्रवादी समुदाय को बीड़ा उठाना होगा। संसद और सरकार ने जो काम करना था, कर दिया अब जरूरत है कुत्सित सोच को अपनी सोच से ढकने और समाप्त करने की। इस दुरूह काम में समय लगेगा, लेकिन करना होगा। यह 'विमशों का टकराव' है-एकता बनाम विभाजन। माओवादी कहावत कि 'सत्ता बंदूक की नली से निकलती है', भारतीय संवैधानिक सिद्धांत 'सत्यमेव जयते' के सीधे विपरीत है। अब जिम्मेदारी भारत के बुद्धिजीवियों और नागरिक समाज पर है कि वे इस लड़ाई की संस्थानों के भीतर ले जाएं। 'नक्सल प्रभावित मानसिकता', को साफ करना यह सुनिश्चित करने की दिशा में अंतिम कदम है कि ग्रीन कॉरिडोर एक समृद्ध, लोकतांत्रिक भारत का स्थायी हिस्सा बना रहे।