मध्यप्रदेश में निवेश, राज्यसभा चुनाव और सियासी बयानबाजी के बीच राजनीतिक हलचल तेज। मोहन यादव के निवेश प्रयास और कांग्रेस की अंदरूनी चुनौतियां चर्चा में।
अनुराग उपाध्याय
मोहन भैया का नया कारनामा
इधर कांग्रेस पुराने कागजात खंगालती रहती है और मोहन भैया नया काण्ड कर देते हैं। कांग्रेस पुराने हिसाब किताब पूरे कर भी नहीं पाई थी कि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने जयपुर में झंडे गाड़ दिए। डाक साहब सीधे निवेशकों से मिले और उनसे बिना लाग लपेट के सीधी बात की। मुख्यमंत्री के लहजे और साफगोई से उद्योगपति निवेशक भी बड़े प्रभावित नजर आये। एआई सेक्टर के लिए नई पॉलिसी क्या हो इस पर भी उन्होंने निवेशकों से राय शुमारी की। नतीजा 5055 करोड़ के निवेश प्रस्ताव डाक साहब की टोकरी में आ गिरे। डाक साहब की टीम ने हिसाब किताब किया तो पता चला इससे प्रदेश के 3530 युवाओं को रोजगार मिल जाएगा। डाक साहब ने साफ कहा निवेश प्रदेश की तस्वीर और तकदीर बदलने में सहायक होगा और युवाओं को रोजगार देने के हमारे सपने को पूरा करेगा।
राज्यसभा को न कहने की असली वजह
पहले दिग्विजय सिंह और उसके बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी राज्यसभा जाने से इंकार कर दिया। दिग्विजय सिंह का राज्यसभा का कार्यकाल अगले महीने पूरा हो रहा है। इससे पहले ही उन्होंने राज्यसभा न जाने का ऐलान कर दिया उसके बाद जीतू पटवारी ने भी ऐसा ही किया। राजनीति के चतुर सुजान दिग्विजय सिंह ऐसा करके एक तीर से दो निशाने लगा रहे हैं। एक तो ऐसा करने से वे वापस मध्यप्रदेश में सक्रिय होने के प्रयास कर रहे हैं और दूसरा वे वे जानते हैं कि मध्यप्रदेश से राज्यसभा की तीसरी दूसरा सीट इस बार कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकती है। क़ानूनी पचड़ों में उलझे विधायकों को छोड़ भी दें तो दोहरी मानसिकता के साथ कांग्रेस के आठ विधायक क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं। ये वही विधायक हैं जो शरीर से कांग्रेसी हैं लेकिन जिनकी आत्मा भाजपा के साथ है। बताते हैं हालांकि दिग्गी राजा लगातार इन विधायकों से संपर्क कर चुके हैं। लेकिन कांग्रेस विधायकों के ढुलमुल रवैये ने भोपाल से दिल्ली तक बड़े कांग्रेसियों की नींद उड़ा रखी है। ऐसे में जीतू पटवारी भी एक और हार का ठीकरा अपने सिर पर फुड़वाने नहीं चाहते और उन्होंने राज्यसभा की दावेदारी से खुद दूरी बना ली है।
मीनाक्षी जाएंगी राज्यसभा ?
एमपी में राज्यसभा की दो सीटें भाजपा और एक कांग्रेस के पास जाना चाहिए। लेकिन कांग्रेस के भीतर के हालात से कांग्रेस उहापोह की स्थिति में है। कांग्रेस के आला नेताओं की रिपोर्ट कहती है कि कुछ कांग्रेस विधायक क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं। अब तक सभी कांग्रेस विधायक आलाकमान को कहते रहे हैं कि कहीं कोई गड़बड़ नहीं है। लेकिन जो पार्टी को भरोसा दिला रहे हैं वे ही सबसे ज्यादा गड़बड़ करने वाले हैं। इन विधायकों ने राज्यसभा के लिए संभावित उम्मीदवार को लेकर भी दिल्ली बात कि तो मीनाक्षी नटराजन का नाम सबके सामने आया है। कांग्रेस में सब कुछ ठीक रहता नहीं है, लेकिन अगर रहा तो मीनाक्षी नटराजन राज्यसभा के लिए उम्मीदवार हो सकती हैं। उनके नाम की पैरवी स्वयं राहुल गाँधी कर रहे हैं।
पवैया को मिला रामजी का प्रसाद
ग्वालियर की राजनीति में बर्फ पिघल रही है। जयभान सिंह पवैया को राज्य वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाये जाने पर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लिखा आपके समृद्ध अनुभव और दूरदर्शी नेतृत्व से राज्य के वित्तीय सुदृढ़ीकरण को नई दिशा मिलेगी। आप नए मानक स्थापित करें। सिंधिया की शुभकामनाएं नई भाजपा के चेहरे को दर्शाती हैं। इधर पवैया भी नियुक्ति से खासे प्रसन्न हैं। पवैया भाजपा के उन नेताओं में शुमार हैं जिन्हें जो काम मिला उसे उन्होंने शिद्दत से पूरा किया। इस बार भी पवैया इसे रामजी का प्रसाद बता रहे हैं। देश में एक राष्ट्रीय विचार के नेता के रूप में पवैया ने अपनी एक अलग ही छाप लोगों पर छोड़ी है। हालांकि सच ये भी है कि जयभान सिंह पवैया जिस कद के नेता हैं उनके सामने यह पद थोड़ा छोटा है।
नदी सुधर रही है या एक्सेल शीट
गुना में गुनिया नदी का सौंदर्याकरण अब पानी से ज्यादा आंकड़ों में बह रहा है। पहले एडीएम बोले 4.50 लाख खर्च, 8 लाख शेष। अगले दिन कलेक्टर साहब की बैठक में खर्च पतला होकर 2.90 लाख रह गया और बचत मोटी होकर 9.77 लाख। नदी साफ हो या न हो, हिसाब-किताब जरूर 'री-डेवलप' हो गया। जनता, जिसने जेब ढीली कर चंदा दिया, अब माथा पकड़कर पूछ रही है कि नदी सुधर रही है या एक्सेल शीट ? उधर, विधायक पन्नालाल शाक्य मंच से गरजे 'कागजी घोड़े नहीं, असली काम दिखाइए नाकारा अफसर आते-जाते रहते हैं।' उनका इशारा कलेक्टर साब की तरफ था। सलाह भी दे डाली कि एसडीएम 'दुर्गा' बनें और कार्रवाई की तलवार चलाएं। मजेदार बात ये है कि कुछ दिन पहले ही कलेक्टर की तारीफ के फूल बरसाए गए थे। गुना की जनता अब बस ये समझने की कोशिश में है- नदी में पानी बहेगा या बयानबाजी ?