नए नियमों के तहत, विदेशी फंड प्राप्त संस्थाओं को अब हर खर्च का विस्तृत हिसाब देना होगा। धन के दुरुपयोग पर तुरंत कानूनी कार्रवाई होगी।
उमेश चतुर्वेदी
नए प्रावधानों के अनुसार, विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं को अब प्रत्येक रुपये का विस्तृत हिसाब देना होगा। यदि धन निर्धारित उद्देश्य से हटकर किसी अन्य मद में खर्च किया जाता है, तो उसका स्पष्ट उत्तर देना होगा। किसी भी प्रकार की संदिग्ध गतिविधि पाए जाने पर तत्काल कानूनी कार्रवाई की जाएगी। दिल्ली की एक नीतिगत शोध संस्था द्वारा विदेश से अध्ययन के लिए प्राप्त धन को झारखंड में सक्रिय नक्सली समूहों तक पहुंचाने का मामला भी समय-समय पर चर्चा में रहा है।
साल 2008 की गर्मियों की बात है। दिल्ली के अशोक होटल के कन्वेंशन हॉल में ग्रामीण विकास के लिए काम कर रहे देशभर के स्वयंसेवी संगठनों का सम्मेलन आयोजित था। दोपहर के भोजन की अलग-अलग व्यवस्था थी। एक ओर आयोजन से जुड़े प्रमुख लोग और कुछ पत्रकार मौजूद थे। भोजन से पहले सूप परोसा गया। सूप की चुस्कियों के बीच चल रही बातचीत कई पत्रकारों की समझ से बाहर थी, क्योंकि वह पूरी तरह कूट संकेतों में हो रही थी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ग्रामीण विकास और लड़कियों की शिक्षा पर काम करने वाले एक स्वयंसेवी संगठन के संचालक की मुलाकात मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्र में काम कर रहे दूसरे संगठन के प्रमुख से हुई। बातचीत के दौरान पता चला कि गृह मंत्रालय के विदेशी अंशदान नियंत्रित करने वाले विभाग से उनके संगठन को चार करोड़ रुपये तक विदेशी फंड लेने की मंजूरी मिली थी। उस वर्ष उन्हें तीन करोड़ रुपये मिले, जिनमें से करीब डेढ़ करोड़ रुपये खर्च हुए और शेष राशि से उन्होंने किसी बड़े शहर में मकान खरीद लिया।
यह कोई अपवाद नहीं था। मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले तक विदेशी चंदा और फंडिंग देश के एक खास वर्ग के लिए कमाई का बड़ा जरिया बन चुकी थी। विदेशी सहायता का बड़ा हिस्सा उन उद्देश्यों पर खर्च नहीं होता था, जिनके नाम पर वह प्राप्त की जाती थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकार, सामाजिक अध्ययन, आदिवासी विकास, महिला सशक्तीकरण और शांति स्थापना जैसे आकर्षक विषयों की आड़ में अनेक संगठन विदेशों से भारी धनराशि प्राप्त करते थे। इनमें 'पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट' यानी शांति और संघर्ष प्रबंधन जैसे विषय भी लंबे समय तक विदेशी दानदाताओं की प्राथमिकता बने रहे। लेकिन वास्तविकता यह रही कि इन पैसों का एक हिस्सा दूसरे एजेंडों पर खर्च होता रहा।
उस दौर में स्वयंसेवी संगठनों के दफ्तर केवल सामाजिक गतिविधियों के केंद्र नहीं रह गए थे। वहां मोटे वेतन, सुविधाजनक जीवनशैली और वैचारिक नेटवर्क का समानांतर संसार विकसित हो गया था। अनेक संस्थानों से जुड़े वामपंथी छात्र और कार्यकर्ता इन संगठनों से जुड़े दिखाई देते थे। विदेशी सहायता का उद्देश्य आदिवासियों, गरीबों और महिलाओं की स्थिति का अध्ययन तथा विकास कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना बताया जाता था, लेकिन कई मामलों में धन का उपयोग पूरी तरह अलग दिशा में होता रहा।भारत में विदेशी चंदे का सिलसिला पिछली सदी के साठ के दशक से तेज हुआ। यदि तब से लेकर वर्ष 2014 तक प्राप्त विदेशी सहायता का उपयोग वास्तव में उसी उद्देश्य के लिए किया गया होता, जिसके लिए वह मिली थी, तो देश के अनेक पिछड़े क्षेत्रों की तस्वीर काफी बदल चुकी होती।
आजादी से पहले से ही ईसाई मिशनरियों और इस्लामी संस्थाओं को विदेशों से पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलती रही है। ईसाई मिशनरियों ने दूर-दराज के आदिवासी क्षेत्रों में विद्यालय और अस्पताल स्थापित किए, लेकिन उनके कार्यों पर सेवा की आड़ में धर्मांतरण कराने के आरोप भी लगातार लगते रहे। इसी प्रकार, खाड़ी देशों से मिलने वाली सहायता ने अनेक इस्लामी संगठनों की गतिविधियों को विस्तार दिया। सरकार का मानना है कि इस तरह की फंडिंग का इस्तेमाल कई बार सामाजिक सद्भाव के विरुद्ध गतिविधियों को बढ़ावा देने में भी हुआ।संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के कार्यकाल में इन संस्थाओं पर अपेक्षित निगरानी नहीं रही। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर कश्मीर में स्वायत्तता की मांग उठाने वाले विभिन्न अभियानों तक अनेक ऐसे समूह सक्रिय दिखाई दिए, जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठनों से रहा।
दक्षिण दिल्ली स्थित एक स्वयंसेवी संस्था के कार्यालय में नेपाल के माओवादी आंदोलन के शीर्ष नेताओं की बैठकों की चर्चा भी लंबे समय तक होती रही। बाबूराम भट्टराई और पुष्पकमल दहल 'प्रचंड' जैसे नेताओं की रणनीतिक बैठकों का केंद्र भी यही स्थान बताया जाता रहा। कुछ संगठन यातायात, मौसम अथवा नीतिगत अध्ययन के नाम पर विदेशों से धन लेते रहे, लेकिन आरोप रहे कि उस धन का हिस्सा शहरी माओवाद के पक्ष में जनमत तैयार करने, धर्मांतरण और विदेशी वैचारिकी को बढ़ावा देने में लगाया गया।
इन्हीं अनुभवों और आरोपों की पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) के नियमों को और अधिक कठोर बनाने का निर्णय लिया है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि विदेशी धन का उपयोग केवल समाज कल्याण, विकास और घोषित उद्देश्यों के लिए ही होना चाहिए। किसी भी संस्था को विदेशी सहायता के माध्यम से धर्मांतरण, देश की जनसांख्यिकी बदलने या किसी गुप्त राजनीतिक अथवा वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
नए प्रावधानों के अनुसार, विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं को अब प्रत्येक रुपये का विस्तृत हिसाब देना होगा। यदि धन निर्धारित उद्देश्य से हटकर किसी अन्य मद में खर्च किया जाता है, तो उसका स्पष्ट उत्तर देना होगा। किसी भी प्रकार की संदिग्ध गतिविधि पाए जाने पर तत्काल कानूनी कार्रवाई की जाएगी। दिल्ली की एक नीतिगत शोध संस्था द्वारा विदेश से अध्ययन के लिए प्राप्त धन को झारखंड में सक्रिय नक्सली समूहों तक पहुंचाने का मामला भी समय-समय पर चर्चा में रहा है। ऐसे उदाहरणों ने यह स्पष्ट किया कि विदेशी सहायता का दुरुपयोग केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय भी बन सकता है।
इसी दृष्टि से केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 22 जून, 2026 को एफसीआरए नियमों में व्यापक संशोधन अधिसूचित किए। इनका उद्देश्य विदेशी फंडिंग में अधिक पारदर्शिता लाना, धन के वास्तविक स्रोत की पहचान सुनिश्चित करना और धर्मांतरण सहित किसी भी प्रकार की संदिग्ध गतिविधि पर प्रभावी रोक लगाना है। अब गैर-सरकारी संगठनों और धार्मिक संस्थाओं के लिए विदेशी चंदा प्राप्त करना पहले की तुलना में अधिक जवाबदेही और निगरानी के दायरे में होगा।
नए नियमों के तहत अब केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि धन किस विदेशी फाउंडेशन से मिला है। संबंधित संस्था को यह भी बताना होगा कि उस फाउंडेशन को धन देने वाला वास्तविक दानदाता कौन है और पूरी धन श्रृंखला क्या है। इसके साथ ही प्रत्येक संस्था को सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक अथवा धार्मिक—इन पांच निर्धारित श्रेणियों में से किसी एक का चयन करना होगा और उसी दायरे में कार्य करना होगा। सरकार का मानना है कि इससे उद्देश्य और व्यय के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित होगा।
इसके अलावा, संस्थाओं को यह भी स्पष्ट करना होगा कि वे किस राज्य, केंद्र शासित प्रदेश और जिले में विदेशी धन खर्च करेंगी। इससे धन के उपयोग की सटीक निगरानी संभव होगी। सभी संगठनों को अपने सोशल मीडिया मंचों, वेबसाइट और प्रकाशनों का पूरा विवरण भी गृह मंत्रालय को उपलब्ध कराना होगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विदेशी धन के सहारे देश-विरोधी दुष्प्रचार या वैचारिक अभियान तो नहीं चलाए जा रहे हैं।
एफसीआरए पंजीकरण व्यवस्था में भी बदलाव किया गया है। अब प्रत्येक श्रेणी और कार्यक्षेत्र के अनुसार अलग-अलग शुल्क निर्धारित किया गया है। साथ ही विदेशी नागरिकों की भूमिका सीमित करने का भी प्रावधान किया गया है। यदि किसी भारतीय संस्था के प्रमुख पदाधिकारियों में विदेशी नागरिक शामिल हैं, तो ऐसे संगठन को विदेशी चंदा लेने के लिए पंजीकरण या पूर्व स्वीकृति देने पर सामान्यतः विचार नहीं किया जाएगा। सरकार का तर्क है कि इससे विदेशी नागरिकों के माध्यम से भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की संभावनाएं कम होंगी।
इन संशोधनों से उन लोगों की चिंता बढ़ी है, जिनकी आर्थिक गतिविधियां विदेशी फंडिंग पर आधारित रही हैं। लेकिन सरकार का कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य किसी वैध सामाजिक कार्य में बाधा डालना नहीं, बल्कि विदेशी धन की प्रत्येक कड़ी को पारदर्शी बनाना है। सेवा की आड़ में छिपे एजेंडों, जनसांख्यिकीय बदलाव की कोशिशों और राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध होने वाली गतिविधियों पर रोक लगाना समय की आवश्यकता है। नियमों के उल्लंघन की स्थिति में कम से कम एक लाख रुपये के जुर्माने से लेकर एफसीआरए लाइसेंस निरस्त करने तक की कार्रवाई का प्रावधान रखा गया है।
दिलचस्प यह है कि नियमों को कठोर बनाने के साथ सरकार ने पात्र संस्थाओं के लिए रास्ते भी खुले रखे हैं। संशोधनों के बाद 72 नए संगठनों और संस्थाओं को विदेशी चंदा प्राप्त करने की मंजूरी दी गई है। इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी सेवा भारती, प्रोजेक्ट मुंबई और हरे कृष्ण मूवमेंट इंडिया जैसी संस्थाएं भी शामिल हैं। इससे सरकार ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि विदेशी सहायता पर रोक नहीं लगाई जा रही, बल्कि उसका उपयोग पूरी पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप सुनिश्चित किया जा रहा है।