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मोदी की इंडोनेशिया यात्रा

मोदी की इंडोनेशिया यात्रा में दिखी हजार वर्ष पुरानी सांस्कृतिक डोर

प्रधानमंत्री मोदी की इंडोनेशिया यात्रा में प्रम्बानन मंदिर का दौरा प्रमुख आकर्षण रहा। भारत-इंडोनेशिया ने सांस्कृतिक संरक्षण में सहयोग की पहल की।


मोदी की इंडोनेशिया यात्रा में दिखी हजार वर्ष पुरानी सांस्कृतिक डोर

(अनुराग तागड़े )

प्रम्बानन मंदिर भारत-इंडोनेशिया की साझा सभ्यतागत विरासत का प्रतीक, संरक्षण में सहयोग करेगा भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा ने भारत और इंडोनेशिया के बीच आधुनिक रणनीतिक साझेदारी के साथ-साथ हजार वर्ष से भी अधिक पुराने सभ्यतागत संबंधों को एक बार फिर दुनिया के सामने रखा है। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पड़ाव इंडोनेशिया के योग्यकार्ता स्थित ऐतिहासिक प्रम्बानन मंदिर परिसर है। नौवीं शताब्दी का यह विशाल हिंदू मंदिर समूह भगवान शिव को समर्पित है और भारत तथा इंडोनेशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण माना जाता है।

प्रधानमंत्री मोदी 6 से 8 जुलाई तक इंडोनेशिया की आधिकारिक यात्रा पर हैं। यह उनकी इंडोनेशिया की चौथी यात्रा और 2018 में दोनों देशों के संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिए जाने के बाद उनकी पहली द्विपक्षीय यात्रा है। यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई और दोनों देशों ने आर्थिक, रणनीतिक तथा सांस्कृतिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की।

इस यात्रा का विशेष आकर्षण प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो की प्रम्बानन मंदिर यात्रा है। भारत और इंडोनेशिया ने इस ऐतिहासिक मंदिर परिसर के संरक्षण और पुनरुद्धार में सहयोग के लिए पहल आगे बढ़ाई है। दोनों देशों के बीच प्रम्बानन मंदिर के भारत समर्थित संरक्षण एवं पुनरुद्धार के लिए आशय पत्र का आदान-प्रदान भी हुआ है। यह पहल सांस्कृतिक कूटनीति के साथ भारत की उस व्यापक सोच को भी रेखांकित करती है, जिसमें दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ संबंधों को केवल व्यापार और रणनीति तक सीमित न रखकर साझा सभ्यतागत विरासत से जोड़ा जा रहा है।

मुस्लिम बहुल देश में खड़ा सनातन संस्कृति का भव्य प्रतीक

इंडोनेशिया आज दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम आबादी वाला देश है, लेकिन उसकी सांस्कृतिक चेतना में हिंदू और बौद्ध सभ्यता की गहरी छाप आज भी दिखाई देती है। योग्यकार्ता के निकट स्थित प्रम्बानन इसका सबसे भव्य उदाहरण है। नौवीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर समूह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर है।प्रम्बानन मंदिर समूह हिंदू त्रिमूर्ति की अवधारणा पर आधारित है। यहां भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव को समर्पित प्रमुख मंदिर हैं। इनमें भगवान शिव का मंदिर सबसे विशाल है। इसकी ऊंचाई लगभग 47 मीटर है और यह पूरे परिसर का केंद्रीय आकर्षण है। मंदिर की स्थापत्य शैली, शिखर संरचना, देव प्रतिमाएं और दीवारों पर की गई शिल्पकारी प्राचीन काल में भारतीय संस्कृति के दक्षिण-पूर्व एशिया तक व्यापक प्रभाव की कहानी कहती हैं।

पत्थरों पर लिखी है रामायण

प्रम्बानन मंदिर की दीवारों पर रामायण की कथा पत्थरों में उकेरी गई है। भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान से जुड़े प्रसंगों को यहां अद्भुत शिल्पकला के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। यह इस बात का प्रमाण है कि रामायण केवल भारतीय भूभाग तक सीमित नहीं रही, बल्कि समुद्री मार्गों से दक्षिण-पूर्व एशिया पहुंचकर स्थानीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गई।आज भी प्रम्बानन मंदिर की भव्य पृष्ठभूमि में रामायण पर आधारित नृत्य-नाट्य प्रस्तुतियां आयोजित होती हैं। जावा की सांस्कृतिक परंपराओं में रामायण और महाभारत के पात्रों ने स्थानीय स्वरूप ग्रहण किया, लेकिन कथाओं का मूल भाव आज भी सुरक्षित है। प्रम्बानन में रामायण का जीवंत मंचन भारत और इंडोनेशिया के बीच सांस्कृतिक संबंधों की निरंतरता का अनूठा उदाहरण है।

समुद्री मार्गों से इंडोनेशिया पहुंची भारतीय संस्कृति

भारत और इंडोनेशिया के संबंध आधुनिक कूटनीति की देन नहीं हैं। इनका इतिहास हजारों वर्ष पुराने समुद्री संपर्कों से जुड़ा है। प्राचीन भारत के पूर्वी और दक्षिणी समुद्री तटों से व्यापारी, नाविक, विद्वान और धर्माचार्य दक्षिण-पूर्व एशिया की यात्रा करते थे। व्यापार के साथ संस्कृत भाषा, हिंदू और बौद्ध दर्शन, रामायण-महाभारत, मंदिर स्थापत्य, राजव्यवस्था और साहित्यिक परंपराएं भी वहां पहुंचीं।विशेष बात यह है कि भारतीय संस्कृति का यह विस्तार सैन्य विजय के बजाय सांस्कृतिक संवाद, व्यापार और विचारों के आदान-प्रदान से हुआ। जावा, सुमात्रा और बाली में शक्तिशाली हिंदू-बौद्ध राजवंशों का उदय हुआ। इन राज्यों ने भारतीय दर्शन और धार्मिक अवधारणाओं को स्थानीय परंपराओं के साथ जोड़कर एक विशिष्ट सांस्कृतिक स्वरूप विकसित किया।प्रम्बानन इसी ऐतिहासिक सांस्कृतिक प्रक्रिया का भव्य स्थापत्य प्रमाण है। यहां भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा की उपासना से लेकर रामायण की कथाओं तक भारतीय संस्कृति के अनेक तत्व दिखाई देते हैं।

भारत करेगा साझा विरासत के संरक्षण में सहयोग

प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान प्रम्बानन मंदिर के संरक्षण और पुनरुद्धार में भारत के सहयोग की पहल को विशेष महत्व दिया जा रहा है। यह केवल किसी ऐतिहासिक इमारत की मरम्मत का विषय नहीं है, बल्कि साझा सभ्यतागत स्मृतियों को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।भारत ने दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण में विशेषज्ञता और सहयोग दिया है। प्रम्बानन के मामले में सहयोग भारत और इंडोनेशिया के बीच सांस्कृतिक साझेदारी को और मजबूत करेगा। दोनों देशों ने इस दिशा में औपचारिक पहल आगे बढ़ाई है।प्रधानमंत्री मोदी की प्रम्बानन यात्रा का प्रतीकात्मक महत्व भी है। एक ओर भारत और इंडोनेशिया हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार हैं, वहीं दूसरी ओर दोनों देश अपनी साझा सांस्कृतिक जड़ों को आधुनिक संबंधों की शक्ति बना रहे हैं।

यूनेस्को की विश्व धरोहर

प्रम्बानन मंदिर परिसर को वर्ष 1991 में विश्व धरोहर का दर्जा दिया गया था। यह मंदिर अपनी असाधारण स्थापत्य कला, धार्मिक महत्व और ऐतिहासिक मूल्य के कारण विश्व की प्रमुख सांस्कृतिक धरोहरों में शामिल है।समय के साथ भूकंप और अन्य प्राकृतिक कारणों से मंदिर परिसर को काफी नुकसान पहुंचा। इसके बावजूद पुनरुद्धार और संरक्षण के निरंतर प्रयासों के कारण इसकी भव्यता आज भी कायम है। अब भारत की भागीदारी इस संरक्षण अभियान को नई दिशा दे सकती है।

इंडोनेशिया में हिंदू विरासत की लंबी परंपरा

प्रम्बानन अकेला ऐसा स्थान नहीं है, जो इंडोनेशिया और भारतीय संस्कृति के रिश्ते की कहानी कहता हो। बाली में हिंदू धर्म आज भी जीवंत सामाजिक और धार्मिक परंपरा के रूप में मौजूद है। वहां हजारों मंदिर, धार्मिक अनुष्ठान, पर्व और रामायण-महाभारत आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुतियां स्थानीय जीवन का हिस्सा हैं।जावा में प्रम्बानन की शिव उपासना, बाली की जीवंत हिंदू परंपराएं और इंडोनेशियाई संस्कृति में रामायण-महाभारत की लोकप्रियता यह बताती है कि भारतीय संस्कृति का प्रभाव सदियों के राजनीतिक परिवर्तन के बाद भी समाप्त नहीं हुआ।

आधुनिक कूटनीति से आगे सभ्यताओं का मिलन

प्रधानमंत्री मोदी की इंडोनेशिया यात्रा ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि भारत और इंडोनेशिया के संबंध केवल आर्थिक समझौतों, रक्षा सहयोग या समुद्री सुरक्षा तक सीमित नहीं हैं। इन संबंधों के पीछे हजारों वर्षों का सांस्कृतिक इतिहास मौजूद है।प्रम्बानन के ऊंचे शिखर, मंदिर की दीवारों पर अंकित रामायण, भगवान शिव का विशाल मंदिर और इंडोनेशिया की सांस्कृतिक परंपराओं में जीवित भारतीय प्रभाव दोनों देशों के बीच उस प्राचीन संबंध की कहानी कहते हैं, जिसे आधुनिक राजनीति ने नहीं बनाया, बल्कि इतिहास और सभ्यता ने गढ़ा है।प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा और भारत द्वारा प्रम्बानन मंदिर के संरक्षण में सहयोग की पहल इसी ऐतिहासिक संबंध को वर्तमान और भविष्य से जोड़ने का प्रयास है। प्रम्बानन आज केवल इंडोनेशिया की राष्ट्रीय धरोहर नहीं, बल्कि भारत और इंडोनेशिया के बीच साझा सभ्यतागत स्मृति का ऐसा जीवंत प्रतीक है, जो यह बताता है कि समुद्र देशों को अलग नहीं करते, बल्कि कई बार सभ्यताओं को जोड़ने वाले सबसे प्राचीन मार्ग बनते हैं।

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