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Stalin Hindi Row Tamil Nadu Politics Debate

हिंदी की आड़ में राजनीतिक स्वार्थ साधते स्टालिन...

तमिलनाडु में हिंदी और तीन भाषा फॉर्मूला को लेकर सियासत तेज। एमके स्टालिन के रुख और चुनावी रणनीति पर उठे सवाल।


हिंदी की आड़ में राजनीतिक स्वार्थ साधते स्टालिन

जव मध्य पूर्व की जंग से वैश्विक स्तर पर समूची दुनिया संघर्ष और तनाव के साथ ही आर्थिक रूप से अव्यवस्था के दौर से गुजर रही है... ऐसे अवसर में भारत में पांच सीमावर्ती राज्यों तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव के चलते राजनीतिक संघर्ष सिद्धांतों. चुनावी हथकंडों, लोकलुभावन नीतियों के रूप में तेजी से हर किसी का ध्यान आकर्षित कर रहा है... वामपंथ, दक्षिण पंथ और मध्यमार्गी विचारों के बीच यह सीधा और खुला संघर्ष का रूप भी ले रहा है... इन राज्यों के चुनावी नतीजों से जो भी जनादेश निकलेगा.. उसका राष्ट्रीय फलक पर महत्वपूर्ण असर दिखना स्वाभाविक है... इसलिए पश्चिम बंगाल में जहां ममता बनर्जी के लिए विधानसभा चुनाव राजनीतिक जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है.. वहीं तमिलनाडु में सत्तासीन द्रमुक के लिए इस बार का मुकाबला आसान नहीं है, इसीलिए मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने चुनावी समर में तीन भाषा फार्मूले पर साजिश के तहत सवाल उठाना शुरू कर दिया है... 

वे तमिलनाडु में अपनी सत्ता विरोधी लहर को भावनाओं के जाल में उलझाने की हर स्तर की तिकड़म भिड़ा रहे हैं. द्रमुक मुख्यमंत्री एमके स्टालिन का यह आरोप कि गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी के विस्तार का गुप्त तंत्र विकसित किया जा रहा है... इसमें तीन भाषा फार्मूला महत्वपूर्ण है... यह सही मायने में दक्षिण के लोगों की भावनाओं को भाषा के नाम पर भयभीत करने का ही प्रपंच है.... आखिर कोई सत्तासीन सरकार अपनी नीतियों, विकास कार्यों को चुनावी मैदान में गिनाने के बजाय हिंदी को चुनावी मुद्दा बनाकर भाषा के नाम पर असंख्य लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ कैसे कर सकता है..? स्टालिन का आरोप यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भाषागत सुधार कोई साधारण शैक्षणिक सुधार नहीं है, बल्कि भाषा थोपने की एक सोची-समझी और चिंताजनक कोशिश है जो उनकी लंबे समय से चली आ रही आशंकाओं को सही साबित करती है... आखिर स्टालिन तमिलनाडु में अपने कार्यक्रम में किए गए विकास निर्माण और रोजगार से जुड़ी उपलब्धियों पर चर्चा से बचने का ही भाषाई प्रपंच नहीं रच रहे हैं? तमिलनाडु के आर्थिक हालात डांवाडोल है... 

इस पर भी स्टालिन कोई सकारात्मक जवाब देने की स्थिति में नहीं है... राज्य में राजस्व घाटा, बढ़ते ब्याज भुगतान और ऑफ बजट उधारी ने वित्तीय स्थिति को बहुत कमजोर बना दिया है... तमिलनाडु का कर्ज मार्च 2024 तक बढ़कर 8.34 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच चुका है... 2027 तक इसके 10.71 लाख करोड़ रुपए पहुंचने का अनुमान है... मजे की बात यह है कि स्टालिन इन सभी मु‌द्दों पर चुनावी सभा में मौन साध जाते है... भाजपा ने चुनावी मैदान में राज्य के विकास निर्माण और आर्थिक हालात पर श्वेत पत्र जारी किया है क्योंकि तमिलनाडु को केन्द्र से 80 हजार करोड़ रुपए से अधिक जीएसटी राशि मिलने के बावजूद अगर राज्य का खजाना खाली है तो राज्य के आर्थिक हालात समझे जा सकते है... ऐसे में स्टालिन का एकतरफा कार्यक्रम यही है कि वे एक तो लगातार झूठी अफवाहें फैला रहे हैं... जनसंख्या नियंत्रण के कारण दक्षिण भारतीय राज्यों में लोकसभा की सीटें कम हो जाएंगी... 

ऐसे भ्रम के साथ ही स्टालिन भाषाई प्रपंच का भी राजनीतिक खेल खेल रहे हैं... त्रिभाषा फार्मूला सही मायने में मातृभाषा या स्थानीय भाषा को बढ़ावा देने की ही एक प्रक्रिया का हिस्सा है... ऐसे में व्यक्ति हिंदी-अंग्रेजी के साथ ही स्थानीय भाषा पर भी अपना अध्ययन, अध्यापन करने के लिए स्वतंत्र है... हिंदी कहीं भी थोपी नहीं जा रही है.. लेकिन गैर हिंदी राज्य में भी हिंदी के कारण ही अनेक गैर हिंदी व्यापारियों-कारोबारियों के रोजगार, उद्योग और उत्पादन प्रक्रिया द्रुतगित से आगे बढ़ती है.. लेकिन वे राजनीतिक स्वार्थ के चलते हिंदी विरोध का झंडा उठाते है... यही तमिलनाडु में स्टालिन कर रहे है जो राज्य के हितों के विपरीत है....

 

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