मणिपुर में उग्रवाद की समस्या के समाधान के लिए केंद्र सरकार ने 'ऑपरेशन क्लीन' शुरू किया है। कोबरा बटालियन की विशेष इकाइयाँ उग्रवादी ठिकानों पर कार्रवाई कर रही हैं।
प्रमोद भार्गव
मणिपुर में उग्रवाद की वर्तमान समस्या केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं रह गई है, बल्कि यह जातीय संघर्ष, क्षेत्रीय विभाजन और असुरक्षा-बोध का जटिल रूप ले चुकी है। बड़े पैमाने पर हिंसा भले थम गई हो, किंतु मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच बना अविश्वास आज भी कायम है। 2023 की हिंसा के बाद केंद्र सरकार ने दोनों समुदायों के बीच बफर जोन बनाया था, लेकिन अर्धसैनिक बलों की तैनाती के बावजूद यह विभाजन व्यावहारिक रूप से स्थायी सीमा जैसा दिखाई देता है। घाटी में रहने वाले मैतेई और पहाड़ी क्षेत्रों में बसे कुकी-जो समुदाय आज भी एक-दूसरे के इलाकों में सुरक्षित आवाजाही नहीं कर पा रहे हैं। ऐसी किसी भी कोशिश के साथ गोलीबारी, बम विस्फोट या रॉकेट हमलों की घटनाएं सामने आ जाती हैं।
लगभग तीन वर्षों से जारी इस हिंसा और अराजकता को समाप्त करने के लिए केंद्र सरकार ने अब निर्णायक अभियान छेड़ दिया है। छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा में नक्सलवाद के विरुद्ध सफल अभियान चला चुकी कोबरा की विशेष जंगल-युद्ध इकाइयों को मणिपुर में तैनात किया गया है। कोबरा की 207 और 201 बटालियन के लगभग दो हजार प्रशिक्षित कमांडो ‘ऑपरेशन क्लीन’ के तहत सीमावर्ती जंगलों में सक्रिय उग्रवादी ठिकानों को ध्वस्त करने में जुटे हैं। इनका लक्ष्य उन 20 से अधिक उग्रवादी संगठनों को या तो आत्मसमर्पण के लिए विवश करना है, जो सरकार से बातचीत के लिए तैयार नहीं हैं, अथवा उनके सशस्त्र नेटवर्क को पूरी तरह निष्क्रिय करना है।
इस अभियान के प्रारंभिक परिणाम सामने आने लगे हैं। कोबरा, असम राइफल्स, सेना और मणिपुर पुलिस के संयुक्त अभियानों में कांगपोकपी तथा इंफाल घाटी के कई क्षेत्रों में उग्रवादियों के नेटवर्क ध्वस्त किए गए हैं। अनेक उग्रवादियों को गिरफ्तार किया गया है और उनके अवैध ठिकानों को नष्ट किया गया है। अब अभियान का फोकस जंगलों में बने हथियारबंद शिविरों का पता लगाकर उन्हें समाप्त करना है।फरवरी 2026 में मुख्यमंत्री यमनाम खेमचंद्र सिंह के नेतृत्व में त्रि-जातीय संतुलन वाली नई सरकार बनी, जिसमें मैतेई मुख्यमंत्री के साथ कुकी और नागा समुदायों के उपमुख्यमंत्री भी शामिल हैं। इससे राजनीतिक संवाद की शुरुआत अवश्य हुई है, किंतु जमीनी स्तर पर विश्वास बहाली अब भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसके पीछे कारण यह है कि 2023 की हिंसा के मूल कारण आज भी जस के तस मौजूद हैं।
मैतेई समुदाय लंबे समय से अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मांग कर रहा है। उनका तर्क है कि म्यांमार से हो रही अवैध घुसपैठ और भूमि संबंधी कानूनी प्रतिबंधों के कारण वे अपनी ही मातृभूमि में अल्पसंख्यक बनने की स्थिति में पहुंच रहे हैं। दूसरी ओर, कुकी-जो और नागा समुदाय इस मांग का कड़ा विरोध करते हैं। उनका कहना है कि मैतेई पहले से ही राजनीतिक, आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से सबसे सशक्त समुदाय हैं। यदि उन्हें भी जनजातीय दर्जा मिल गया, तो वे आदिवासी आरक्षण, नौकरियों और पहाड़ी भूमि पर अधिकार स्थापित कर लेंगे। इसी कारण कुकी संगठनों और विधायकों ने अलग प्रशासनिक व्यवस्था, केंद्र शासित प्रदेश अथवा व्यापक स्वायत्तता की मांग तेज कर दी है।
विवाद की पृष्ठभूमि फरवरी 2023 में और गहरी हुई, जब राज्य सरकार ने पहाड़ी एवं वन क्षेत्रों से कथित अवैध प्रवासियों को हटाने का अभियान प्रारंभ किया। इन क्षेत्रों में नागा और कुकी समुदाय की 34 अधिसूचित जनजातियां निवास करती हैं, जिनकी भूमि पर गैर-जनजातीय लोगों के स्वामित्व की अनुमति नहीं है। जिन लोगों को प्रशासन प्रवासी मानकर हटाना चाहता था, उन्हें कुकी समुदाय अपना मूल निवासी बता रहा था। इससे सरकार और आदिवासी समुदायों के बीच टकराव और बढ़ गया। दूसरी ओर, मैतेई समुदाय को जनजातीय दर्जा देने की मांग पर विचार शुरू होने से आदिवासी समाज की आशंकाएं और गहरी हो गईं। यही विरोधाभास बाद में हिंसा का प्रमुख कारण बना।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी इस तनाव को बढ़ाने वाला कारक है। मैतेई समुदाय संख्या में अधिक होने के साथ-साथ विधानसभा की 60 में से लगभग 40 सीटों पर प्रभाव रखता है, जबकि राज्य के लगभग 90 प्रतिशत पर्वतीय भूभाग में रहने वाली 34 जनजातियों का प्रतिनिधित्व केवल 20 विधायकों तक सीमित है। परिणामस्वरूप आदिवासी समुदायों में यह धारणा मजबूत हुई कि उनके हितों की पर्याप्त राजनीतिक रक्षा नहीं हो पा रही है।इस संघर्ष में धार्मिक आयाम भी जुड़ गया है। अधिकांश मैतेई हिंदू, विशेषकर वैष्णव परंपरा से जुड़े हैं, जबकि नागा और कुकी समुदायों में बड़ी संख्या ईसाई धर्मावलंबियों की है। इसलिए जातीय तनाव कई बार धार्मिक रंग ग्रहण कर लेता है। इस स्थिति का लाभ मादक पदार्थों के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क भी उठाते रहे हैं। म्यांमार सीमा से लगे क्षेत्रों में अफीम की खेती और ड्रग्स तस्करी लंबे समय से सक्रिय है।
पूर्व मुख्यमंत्री नोंगथोंबम बीरेन सिंह ने अफीम की खेती और ड्रग माफिया के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया था। इसी दौरान उच्च न्यायालय ने मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के प्रश्न पर विचार करने का निर्देश दिया और इसके बाद हिंसा ने व्यापक रूप ले लिया। हालांकि, इस संकट की जड़ें इससे भी पहले की हैं।वर्ष 2015 में मणिपुर विधानसभा ने तीन महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए थे, जिनमें सबसे अधिक विवाद मणिपुर यात्री, किराएदार एवं प्रवासी नियमन विधेयक को लेकर हुआ। इसके अलावा मणिपुर भू-राजस्व एवं भूमि सुधार (सातवां संशोधन) विधेयक तथा मणिपुर दुकान एवं प्रतिष्ठान (दूसरा संशोधन) विधेयक भी पारित किए गए। आदिवासी समुदायों को आशंका थी कि इन कानूनों के माध्यम से बाहरी लोगों के लिए पर्वतीय क्षेत्रों में स्थायी बसावट का मार्ग खुल जाएगा और उनके पारंपरिक अधिकार कमजोर पड़ जाएंगे।
यात्री, किराएदार एवं प्रवासी नियमन विधेयक के माध्यम से इनर लाइन परमिट व्यवस्था को और कठोर बनाया गया। यह कदम जीसीआरएलपीएस संगठन की लंबे समय से चली आ रही मांग के अनुरूप था, जिसका कहना था कि मणिपुर में बाहरी लोगों की बढ़ती संख्या स्थानीय संसाधनों, रोजगार और प्राकृतिक संपदा पर दबाव बना रही है। सरकारी नौकरियों और रोजगार के अवसरों में भी स्थानीय निवासियों और प्रवासियों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही थी। इन्हीं परिस्थितियों में तत्कालीन मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह की सरकार ने इनर लाइन परमिट व्यवस्था को सख्त बनाने का प्रयास किया।
यद्यपि यह मांग मुख्यतः मैतेई समुदाय की थी, लेकिन आदिवासी समुदायों ने इसका प्रारंभ से विरोध किया। उन्हें आशंका थी कि इससे मणिपुर घाटी जन-प्रशासन नियमन अधिनियम, 1947 के तहत उन्हें प्राप्त विशेष संरक्षण कमजोर हो जाएगा। इस कानून का उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों में निवास करने वाली जनजातियों की भूमि और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा करना था। नए प्रावधानों में 1951 को आधार वर्ष मानते हुए उसके बाद आए लोगों की नागरिक सुविधाओं और अधिकारों को सीमित करने की व्यवस्था की गई। किंतु इस व्यवस्था को लेकर भी अनेक विरोधाभास सामने आए, जिससे बाहरी बनाम मूल निवासी का प्रश्न और अधिक संवेदनशील बन गया।
स्पष्ट है कि मणिपुर का संकट केवल उग्रवाद का नहीं, बल्कि पहचान, भूमि, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, अवैध प्रवासन, संसाधनों पर अधिकार और सामाजिक विश्वास के संकट का भी है। केवल सैन्य कार्रवाई से उग्रवादी संगठनों को कमजोर किया जा सकता है, लेकिन स्थायी शांति तभी संभव होगी, जब विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास बहाली, संवैधानिक अधिकारों का संतुलित संरक्षण और राजनीतिक संवाद समानांतर रूप से आगे बढ़े। केंद्र सरकार का ‘ऑपरेशन क्लीन’ सुरक्षा के मोर्चे पर निर्णायक पहल है, किंतु इसकी वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब मणिपुर फिर से सामाजिक समरसता, पारस्परिक विश्वास और स्थायी शांति की राह पर लौट सके।