डॉ. राहुल जैन
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में विश्व शांति हेतु अहिंसा की प्रासंगिकता पहिले से कई गुना बढ़ गई है।युद्ध और हिंसा वैश्विक विकास, समृद्धि के साथ राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था और संसाधनों को भी नष्ट कर देते हैं।आज जब दुनिया युद्ध, कट्टरता और पर्यावरणीय संकट से जूझ रही है,तब भगवान महावीर (वर्धमान) का "जियो और जीने दो" का शुभ संदेश विश्व शांति और अहिंसा का सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली सूत्र के रूप में हमारे सामने खड़ा है। यह महज एक नारा नहीं, अपितु मानवता के कल्याण और जीवन का एक संपूर्ण दर्शन है।जैन धर्म के पंच महाव्रतों (अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) का आधार है।
भगवान महावीर स्वामी के 2625 वे जन्म कल्याणक महोत्सव पूरे विश्व में धूम धाम से मनाई जा रही है,तब उनके इन कालजयी संदेशों को पुनर्जीवित कर अपनाने का अवसर आया है। भगवान महावीर के अनुसार संसार के सभी प्राणियों में चाहे वे मनुष्य हों, पशु-पक्षी हों या सूक्ष्म जीव एक जैसी ही आत्मा निवास करती है। जैसे हमें अपना जीवन प्रिय है और हम दुख नहीं चाहते, वैसे ही हर जीव सुख से जीना चाहता है।सत्य के कई पहलू हो सकते हैं। "जीने दो" का एक अर्थ यह भी है कि हम दूसरों के विचारों और मान्यताओं का सम्मान करें। जब हम दूसरों के नजरिए को समझते हैं, तो वैचारिक मतभेद खत्म होते हैं और शांति स्थापित होती है।जरूरत से ज्यादा वस्तुओं का संग्रह करना भी दूसरों के अधिकारों का हनन जैसा है। सीमित इच्छाएं रखने से न केवल व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है,अपितु समाज में भी संतुलन बना रहता है।
विश्व शांति की स्थापना में अहिंसा एक नींव की तरह कार्य करती है। यह केवल शारीरिक चोट न पहुँचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी का अहित न करने का एक व्यापक मार्ग है। अहिंसा शांति का एक निश्चित मार्ग है।अहिंसा परमो धर्मः अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म, सबसे बड़ी तपस्या और परम सत्य है ।अहिंसा हमें विनाश से बचाकर मानवता और बंधुत्व की ओर ले जाती है। हिंसा अक्सर प्रतिशोध और नए संघर्षों को जन्म देती है, जबकि अहिंसक मार्ग से निकाला गया समाधान स्थायी होता है। यह विरोधियों के हृदय में परिवर्तन लाकर स्थायी मित्रता और शांति का मार्ग प्रशस्त करता है।अहिंसा का गहरा संबंध न्याय और मानवाधिकारों से है। एक शांतिपूर्ण विश्व तभी संभव है जब संसाधनों का समान वितरण हो और किसी का दमन न किया जाए। अहिंसक नीतियां समाज में सामंजस्य और परस्पर सहयोग को बढ़ावा देती हैं।
अहिंसक वातावरण में विश्व अपनी ऊर्जा और धन का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास कार्यों में कर सकते हैं। विश्व शांति की शुरुआत व्यक्ति के आंतरिक शांति से होती है। जब व्यक्ति क्रोध, घृणा और ईर्ष्या को त्यागकर अहिंसा को अपनाता है, तो वह समाज में सकारात्मकता और सहानुभूति फैलाता है। अहिंसा कोई निष्क्रिय विचार नहीं है, बल्कि महात्मा गांधी के शब्दों में, यह दुनिया की सबसे "सक्रिय और शक्तिशाली शक्ति" है जो बड़े से बड़े संकट का समाधान कर सकती हैं।
प्रेम और क्षमा से जीतो, तुम ये सारा संसार।
चलो चलें उस राह पर, जहाँ शांति का वास हो।।
पुनश्च: - वर्तमान समय में परमाणु हथियारों और सामूहिक विनाश के साधनों से मानवता को सर्वाधिक खतरा है। अहिंसा और निरस्त्रीकरण के माध्यम से ही इन खतरों को टाला जा सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित दुनिया छोड़ी जा सकती है।

डॉ. राहुल जैन विदिशा जिला मीडिया प्रभारी (भाजपा) है