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मध्य प्रदेश की नई जल नीति

स्मार्ट वॉटर पॉलिसीः जल-समृद्ध मध्य प्रदेश का रोडमैप

मध्य प्रदेश सरकार ने जल संकट के समाधान हेतु स्मार्ट वॉटर पॉलिसी की शुरुआत की। इसमें जल संचयन, पुनर्भरण और उपयोग के नवीन उपाय शामिल हैं।


स्मार्ट वॉटर पॉलिसीः जल-समृद्ध मध्य प्रदेश का रोडमैप

प्रवीण कक्कड़

मानसून की पहली तेज बारिश जब सूखी धरती को भिगोती है, तो ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने अपनी तिजोरी खोल दी हो। लेकिन कुछ ही दिनों में यही अमूल्य जल नदियों और नालों के रास्ते बहकर व्यर्थ चला जाता है। विडंबना यह है कि जिस मध्य प्रदेश की धरती से नर्मदा, चंबल, सोन, ताप्ती, बेतवा और केन जैसी जीवनदायिनी नदियां निकलती हैं, वहीं मालवा, बुंदेलखंड और निमाड़ के कई हिस्से गर्मी आते-आते जल संकट से जूझने लगते हैं।

इस चुनौती को जलवायु परिवर्तन ने और गंभीर बना दिया है। कभी अतिवृष्टि, कभी अल्पवृष्टि और कभी असमान वर्षा का अनियमित चक्र जल प्रबंधन की चुनौती को बढ़ा रहा है। आवश्यकता ऐसी नीति की है, जो हर बूंद को संसाधन मानकर उसके संग्रहण, पुनर्भरण, पुनर्चक्रण और उपयोग की पूरी श्रृंखला को एक साथ देखे। मध्य प्रदेश के लिए एक समग्र स्मार्ट वॉटर पॉलिसी इसी दिशा में निर्णायक कदम साबित हो सकती है।

कैस्केड स्टोरेज मॉडल

राज्य को अपने बड़े जलाशयों की क्षमता का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना होगा। इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर और अन्य प्रमुख बांध मानसून के दौरान विशाल मात्रा में जल संग्रहित करते हैं। इसके बावजूद बड़ी मात्रा में पानी आगे बह जाता है। यदि योजना के तहत अधिशेष जल को बैकवॉटर क्षेत्रों से लिफ्ट कर ऊंचे पठारी इलाकों के तालाबों और जल संरचनाओं तक पहुंचाया जाए, तो वर्षा जल का उपयोग बढ़ सकता है। छोटे-बड़े जलाशयों की एक श्रृंखला विकसित कर 'कैस्केड स्टोरेज मॉडल' तैयार किया जा सकता है। तेलंगाना का कालेश्वरम लिफ्ट इरिगेशन प्रोजेक्ट यह सिद्ध कर चुका है कि तकनीक और दूरदर्शिता का सही उपयोग सूखे क्षेत्रों की तस्वीर बदल सकता है।

धरती की भाषा

मध्य प्रदेश की धरती हर क्षेत्र में एक जैसी नहीं है। मालवा की बेसाल्टिक चट्टानें और बुंदेलखंड की ग्रेनाइट संरचनाएं जल संचयन और भूजल पुनर्भरण के अलग-अलग व्यवहार को जन्म देती हैं। इसलिए पूरे प्रदेश के लिए एक समान मॉडल प्रभावी नहीं हो सकता। केंद्रीय भूजल बोर्ड और राज्य एजेंसियों के सहयोग से विस्तृत भूगर्भीय मानचित्रण कर जलभृतों (एक्वीफर) की पहचान की जानी चाहिए। जहां बड़े बांध व्यवहारिक नहीं हैं, वहां चेक डैम, सब-सर्फेस डाइक और विकेंद्रीकृत जल संरचनाएं कहीं अधिक कारगर साबित हो सकती हैं।

विकसित हों डिजिटल ट्विन

इक्कीसवीं सदी का जल प्रबंधन डेटा और तकनीक से संचालित होगा। सैटेलाइट, मौसम रडार, स्वचालित जलमापन प्रणाली और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के समन्वय से प्रदेश की प्रमुख नदी प्रणालियों और जलाशयों का 'डिजिटल ट्विन' विकसित किया जा सकता है। यह एक वर्चुअल 3D मॉडल होगा, जो वर्षा, जल प्रवाह, जलाशय क्षमता और संभावित बाढ़ का पूर्वानुमान देगा। इससे जल संग्रहण की क्षमता बढ़ेगी, बाढ़ के जोखिम घटेंगे और जल बर्बादी पर नियंत्रण संभव होगा। इसके साथ प्रमुख बांधों और जलाशयों पर रीयल-टाइम डेटा एक्विजिशन सिस्टम (RTDAS) स्थापित किए जाने चाहिए, ताकि निर्णय अनुमान नहीं, बल्कि वास्तविक आंकड़ों के आधार पर लिए जा सकें।

'स्पंज सिटी' अवधारणा

शहरी क्षेत्रों में एक ओर बारिश के दौरान सड़कें जलमग्न हो जाती हैं, तो दूसरी ओर गर्मियों में पेयजल संकट खड़ा हो जाता है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे शहर इसका उदाहरण हैं। इसका समाधान 'स्पंज सिटी' अवधारणा में छिपा है। स्पंज सिटी ऐसे शहर होते हैं, जो वर्षा जल को रोकते नहीं, बल्कि उसे जमीन में उतारते हैं। चीन ने अपने कई शहरों में इस मॉडल को अपनाते हुए वर्षा जल के लगभग 70 प्रतिशत तक संग्रहण और पुनः उपयोग का लक्ष्य रखा है। मध्य प्रदेश के शहरों में परमीएबल पेवमेंट, रेन गार्डन, बायो-रिटेंशन जोन और शहरी जलाशयों का संरक्षण इस दिशा में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है।

जल सुरक्षा की चर्चा तब तक अधूरी है, जब तक अपशिष्ट जल को संसाधन के रूप में नहीं देखा जाता। देश के कई शहर उपचारित सीवेज जल का उपयोग उद्योगों और अन्य गैर-पीने योग्य कार्यों में कर रहे हैं। यदि मध्य प्रदेश के नगर निकाय नागपुर मॉडल की तर्ज पर उपचारित जल के अधिकतम औद्योगिक उपयोग को बढ़ावा दें, तो शहरी जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

जनभागीदारी की शक्ति

कृषि क्षेत्र में सुधार के बिना जल प्रबंधन की कोई भी नीति सफल नहीं हो सकती। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार प्रदेश में उपलब्ध जल का लगभग 80 प्रतिशत उपयोग कृषि में होता है। ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को व्यापक स्तर पर बढ़ावा देना होगा। विशेषज्ञों के अनुसार ये प्रणालियां 30 से 50 प्रतिशत तक जल बचत कर सकती हैं। नहरों की स्मार्ट मॉनिटरिंग (SCADA प्रणाली), पाइप आधारित जल वितरण और जल दक्ष फसलों को प्रोत्साहन भी उतना ही आवश्यक है।

केवल सरकारी योजनाएं जल संकट का समाधान नहीं कर सकतीं। इसके लिए जनभागीदारी को नीति का केंद्रीय तत्व बनाना होगा। इसी संदर्भ में 'वाटर क्रेडिट' जैसी अभिनव अवधारणा पर विचार किया जा सकता है। जिस प्रकार कार्बन क्रेडिट पर्यावरणीय प्रयासों को प्रोत्साहित करता है, उसी प्रकार पंचायतों, उद्योगों और संस्थाओं को वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और जल संरक्षण के उत्कृष्ट कार्यों के लिए प्रोत्साहन दिया जा सकता है।

कृत्रिम जलाशयों का निर्माण

परित्यक्त खदानों को कृत्रिम जलाशयों में बदलना, कैचमेंट क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर वनीकरण, पारंपरिक तालाबों का पुनर्जीवन और वेटलैंड्स का संरक्षण भी दीर्घकालिक जल सुरक्षा रणनीति का हिस्सा होना चाहिए।मध्य प्रदेश के सामने आज एक ऐतिहासिक अवसर है। यदि राज्य स्मार्ट वॉटर पॉलिसी, कैस्केड स्टोरेज, डिजिटल ट्विन, स्पंज सिटी और वाटर क्रेडिट जैसी दूरदर्शी अवधारणाओं को नीति और व्यवहार का हिस्सा बना लेता है, तो वह केवल जल संकट का समाधान नहीं करेगा, बल्कि देश के सामने जल प्रबंधन का नया मानक स्थापित करेगा। मानसून की हर बूंद को भविष्य की पूंजी मानकर किया गया निवेश आने वाली पीढ़ियों के लिए समृद्ध, सुरक्षित और जल-संपन्न मध्य प्रदेश का मार्ग प्रशस्त करेगा।

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