सुबह का धुंधलका अभी पूरी तरह छँटा नहीं था। ग्वालियर के केदारधाम परिसर में हल्की ठंडी हवा बह रही थी। कुछ स्वयंसेवक चुपचाप खड़े थे, मानो किसी अदृश्य उपस्थिति को महसूस कर रहे हों। तभी किसी ने धीमे से कहा- 'अगर तराणेकर जी होते, तो इस समय तक शाखा लग चुकी होती...' और वातावरण में एक साथ श्रद्धा, अनुशासन और आत्ममंथन की लहर दौड़ गई। यही तो थे स्वर्गीय लक्ष्मणराव तराणेकर, जो उपस्थित न होकर भी हर कार्यकर्ता के भीतर जीवित रहते थे।
समर्पण का पर्यायः जीवन का एकमात्र लक्ष्य- तराणेकर जी का जीवन किसी साधारण व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि एक जीवंत साधना था। वे केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक ही नहीं थे, बल्कि आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों के सजीव प्रतिबिंब माने जाते थे। उनके जीवन का हर क्षण राष्ट्रकार्य के लिए समर्पित था, न कोई व्यक्तिगत आकांक्षा, न कोई सुविधा की चाह।
कर्तव्यनिष्ठा की मिसालः समय से बड़ा कुछ नहीं- उनकी समयनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता के अनेक प्रसंग आज भी कार्यकर्ताओं के बीच प्रेरणा बनकर गूंजते हैं। एक बार डबरा में बैठक के लिए जाते समय उनका वाहन रास्ते में खराब हो गया। दूरी लंबी थी, मौसम प्रतिकूल था, पर समय की पाबंदी उनके स्वभाव में थी। बिना क्षण गंवाए वे पैदल ही चल पड़े। जब वे बैठक में पहुँचे, तो उनके पैरों की थकान से अधिक उनके चेहरे पर कर्तव्यपूर्ति का तेज झलक रहा था। यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि उनके जीवन का सिद्धांत था कार्य पहले, सुविधा बाद में।
प्रेरणा जो है निरंतर प्रवाहित: तराणेकर जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि महानता बड़े कार्यों में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे आचरणों में छिपी होती है। उनका हर कदम, हर निर्णय, हर व्यवहार एक संदेश देता है - निष्ठा, ईमानदारी, सादगी और पूर्ण समर्पण का। आज जब हम उनके संस्मरणों को याद करते हैं, तो यह केवल अतीत की स्मृति नहीं होती, बल्कि वर्तमान को जाग्रत करने का आह्वान होता है। वे हमें झकझोरते हैं- क्या हम भी अपने जीवन में उतनी ही निष्ठा और सजगता ला पा रहे हैं? स्व. लक्ष्मणराव तराणेकर केवल एक व्यक्ति नहीं थे बल्कि एक विचार, एक संस्कार और एक जीवंत प्रेरणा हैं। उनके पदचिन्हों पर चलना कठिन अवश्य है, पर उन्हें स्मरण करना ही हमें सही दिशा में अग्रसर कर देता है।
सादगी और त्यागः जीवन का वास्तविक सौंदर्य उनकी सादगी तो मानो किंवदंती थी। वे स्वयं फटे-पुराने कपड़े पहन लेते, लेकिन किसी कार्यकर्ता के वस्त्र फ्ट जाएँ तो तुरंत उसकी चिंता करते। भोजन के प्रति भी वे अत्यंत उदासीन रहते। कभी साधारण ब्रेड और चूड़ा ही उनका आहार होता, पर दूसरों को खिलाने में उन्हें अपार आनंद मिलता। उनके जीवन का यह विरोधाभास ही उनकी महानता का प्रमाण था, अपने लिए कठोर, दूसरों के लिए कोमल।
ईमानदारी का आग्रह: सूक्ष्म बातों में भी राष्ट्रभावः एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग उनकी आर्थिक शुचिता का परिचायक है। संघ कार्यालय में आने वाले पत्रों के टिकट यदि बिना सील के होते, तो कुछ लोग उन्हें दोबारा उपयोग में लेने का विचार करते। पर तराणेकर जी तुरंत रोक देते कहते थे कि यह देश के साथ धोखा है। उनके लिए ईमानदारी कोई बड़ी बात नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थी। इसी प्रकार एक बार बस यात्रा के दौरान कंडक्टर ने टिकट नहीं बनाया, यह जानकर उन्होंने स्वयंसेवकों को डांटा 'यात्रा की है, तो टिकट लेना ही होगा।'
छोटे- छोटे प्रसंगों में भी उनका चरित्र उज्ज्वल दिखाई देता था। संगठन कौशल और दूरदृष्टिः सूक्ष्मता में विराट दृष्टिः उनकी दूरदर्शिता भी अद्भुत थी। वे कार्यकर्ताओं की सूचियाँ, उनकी रुचियाँ, उनके कार्यक्षेत्र, सब कुछ अपनी छोटी-छोटी डायरियों में संजोकर रखते। यही कारण था कि जब नए संगठनात्मक कार्य प्रारंभ होते, तो उनके पास पहले से ही सुसंगठित आधार तैयार होता। यह केवल संगठन कौशल नहीं, बल्कि राष्ट्रकार्य के प्रति उनकी गहरी समझ थी।
त्याग की पराकाष्ठाः उनके जीवन का अंतिम प्रसंग तो जैसे त्याग की पराकाष्ठा है। जब शरीर शिथिल होने लगा, तो उन्होंने स्वयं कहा कि वे किसी पर बोझ नहीं बनना चाहते। उन्होंने हरिद्वार जाने की इच्छा जताई मानो जीवन की अंतिम यात्रा भी आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान के साथ पूरी करना चाहते हों। जब उनकी बात नहीं मानी गई, तो उन्होंने भोजन त्याग दिया और अंततः प्राणों का परित्याग कर दिया। यह निर्णय जितना कठोर था, उतना ही उनके आत्मसंयम और त्याग का प्रमाण भी।
आत्मीयता का स्पर्शः हर कार्यकर्ता उनका अपना
तराणेकर जी केवल अनुशासनप्रिय ही नहीं, अपितु अत्यंत आत्मीय भी थे। छोटे कार्यकर्ताओं के साथ उनका व्यवहार सखा जैसा होता। वे उनकी समस्याएँ सुनते, मार्गदर्शन करते और आवश्यक होने पर उनके जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों में सहभागी भी बनते। एक कार्यकर्ता के पारिवारिक विवाह में वे स्वयं अनेक वरिष्ठों को लेकर पहुँचे, ताकि समाज में उस कार्यकर्ता का सम्मान बढ़े। यह उनके व्यक्तित्व का वह पक्ष था, जिसमें संगठन और परिवार का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
(मध्यभारत संघ अभिलेखागार भोपाल एवं स्वदेश रिसर्च फाउंडेशन)