डी-लिस्टिंग प्रक्रिया के तहत जनजातीय समुदाय के लोगों को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाने का मुद्दा उठा है, जिससे उनके सांस्कृतिक अस्तित्व पर प्रभाव पड़ रहा है।
डॉ. सोनाली नरगुन्दे
कांकेर जिले के अंतागढ़ विकासखंड के ग्राम बड़े तेवड़ा में हुई ग्राम सभा में एक बड़ा निर्णय लिया गया। इसमें सरपंच ने पूर्व सरपंच सहित 14 व्यक्तियों के अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र निरस्त करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया। अब इस निर्णय को जिला प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत किए जाने का निर्णय लिया गया है। पंचायत के अनुसार, ये सभी गोंड समुदाय के पारंपरिक नियमों और नीतियों का पालन नहीं करते हैं। इनका विश्वास, संस्कार और पूजा-पद्धति गोंड समाज के अनुरूप नहीं है। अतः इन लोगों पर यह कार्रवाई की गई है। प्रस्ताव में कहा गया है कि इन व्यक्तियों की गोंड समाज की धार्मिक मान्यताओं में आस्था नहीं है। ये लोग अपने यहां चर्च की परंपराओं का पालन कर रहे हैं। ग्राम सभा के अनुसार, इन्हें गोंड समाज की पारंपरिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताएं भी स्वीकार नहीं हैं।
यह समाचार इसलिए चर्चा में है क्योंकि मतांतरित लोग जनजातीय आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। जनजातीय सुरक्षा मंच के अनुसार, भारत में लगभग 18 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति समाज का मतांतरण हो चुका है। यही मतांतरित लोग जनजातीय आरक्षण और शासकीय योजनाओं का लगभग 80 प्रतिशत लाभ प्राप्त कर रहे हैं। शेष 82 प्रतिशत मूल जनजातीय समाज को मात्र 20 प्रतिशत लाभ मिल रहा है। इससे न सिर्फ सामाजिक असमानता बढ़ रही है, बल्कि यह संविधान की मूल भावना के भी विपरीत है। समस्त जनजातीय समाज ने इसके लिए मांग उठाई है और यह बात सबसे पहले अनुसूचित जनजाति के हित में केंद्रीय मंत्री कार्तिक उरांव ने उठाई थी। वर्ष 1967 में उनके प्रयासों के बाद संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया, जिसमें स्पष्ट सिफारिश की गई थी कि यदि किसी ने ईसाई या इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया है, तो उसे जनजातीय नहीं माना जाएगा। हालांकि इस पर अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं हुआ है। जनजातीय सुरक्षा मंच ने इसे वर्ष 2006 में आंदोलन का स्वरूप दिया।
इस संपूर्ण प्रक्रिया का नाम डी-लिस्टिंग है। डी-लिस्टिंग वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यक्ति या समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाया जाता है, जिससे उसकी उस स्थिति से जुड़े संवैधानिक लाभ और आरक्षण के अधिकार समाप्त हो जाते हैं। अनुच्छेद 342 भारत के राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे सार्वजनिक अधिसूचना के माध्यम से अनुसूचित जनजातियों का निर्धारण कर सकें, जबकि संसद के पास अधिसूचित सूची में समुदायों को शामिल करने या बाहर करने का अधिकार होता है। यह आदेश स्वतंत्रता के बाद पहली बार वर्ष 1950 में जारी किया गया था, जिसमें भारत की अनुसूचित जनजातियों की आधिकारिक सूची प्रकाशित की गई थी।
समस्त जनजातीय समाज की अस्मिता से जुड़े इस मुद्दे पर संघर्ष इसलिए जारी है, क्योंकि यह केवल जनजातीय लोगों के मतांतरण का विषय नहीं है। बल्कि इस कारण लोगों को अनुसूचित जनजाति की स्पष्ट परिभाषा का ज्ञान होना भी आवश्यक हो गया है। जनजातीय पहचान से जुड़े सभी बिंदुओं पर चर्चा करना जरूरी हो गया है, ताकि ऐसे विषयों से उत्पन्न भ्रम और विवाद का समाधान हो सके। जो व्यक्ति मतांतरण के बाद अपनी पारंपरिक जनजातीय आस्था, संस्कृति, रीति-रिवाज, सामाजिक परंपराओं और जीवन-पद्धति का परित्याग कर देता है, उसे अनुसूचित जनजाति का संवैधानिक दर्जा और उससे जुड़े लाभ प्राप्त नहीं होने चाहिए। यह विषय केवल आरक्षण का नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की सांस्कृतिक अस्मिता और अस्तित्व से भी जुड़ा हुआ है।
भारत के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो जनजातीय राजनीति जमीन, स्वायत्तता, परंपरागत अधिकारों और जीवन-रक्षा के इर्द-गिर्द रही है। उत्तर-पूर्व के संदर्भ में नागा, मिजो, कुकी, गारो, खासी, बोडो, त्रिपुरी, संथाल, मुंडा या भील—किसी भी जनजातीय समूह में प्रतिरोध का आधार सम्मान, क्षेत्रीय शासन और बाहरी प्रभुत्व से सुरक्षा रहा है। इसका धार्मिक पहचान से कोई संबंध नहीं था। भारत में जनजातीय विद्रोह भूमि हरण, शोषक कराधान, मिशनरी हस्तक्षेप और पारंपरिक सत्ता के पतन के विरोध में हुए। स्वतंत्रता के बाद इसमें राजनीति, राज्य, आंदोलन, स्वायत्तता की मांग, संवैधानिक अधिकार, सुरक्षा, वन अधिकार और सांस्कृतिक संरक्षण के मुद्दे ही जुड़े रहे हैं।
जनजातीय आरक्षण के लाभ और अनुसूचित जनजातियों की डी-लिस्टिंग के संबंध में 1 जून 2026 को दिल्ली में एक प्रतिनिधि सभा का आयोजन हुआ, जिसमें लगभग 500 जनजातियों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उन सभी ने मुख्य मांग रखी कि जो लोग अपने जनजातीय धर्म को छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपनाते हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति की सूची से हटा दिया जाना चाहिए। यह न सिर्फ एक समुदाय के हितों का मसला है, बल्कि लाभों के न्यायसंगत वितरण से जुड़ा विषय भी है।
जनजातीय क्षेत्रों में राजनीतिक रूप लेता यह विषय अब एक अलग दिशा में प्रवेश कर रहा है। मतांतरण के कारण समुदाय की पारंपरिक पहचान, जनसंख्या की चिंता, धार्मिक प्रामाणिकता के प्रश्न और सांस्कृतिक परिवर्तनों के दौर में यह देश की सुरक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। उत्तर-पूर्व में यह विषय पहले से मौजूद था, लेकिन वर्तमान में मध्य भारत में भी यह गंभीरता से उभरता दिखाई दे रहा है। जनजातीय समुदायों में स्कूल, अस्पताल तथा आर्थिक सहायता के साथ सांस्कृतिक हस्तक्षेप के बड़े नेटवर्क हमारे सामने एक चुनौती बनकर उभरे हैं।
डी-लिस्टिंग की बात आज की नहीं है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और जनजातीय नेता कार्तिक उरांव ने प्रारंभ में ही इस विचार को रखा था। उन्होंने तभी भांप लिया था कि यदि इस दिशा में कार्य नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यही स्थिति जनजातीय समाज के वास्तविक लाभार्थियों के अधिकारों का हनन करेगी। क्योंकि अनुसूचित जनजाति का दर्जा बनाए रखने के साथ मतांतरण करने वाला व्यक्ति दोनों तरफ के लाभ प्राप्त करेगा, जिससे वास्तविक जनजातीय व्यक्ति अपने अधिकारों से वंचित रह जाएगा। उत्तर-पूर्व की स्थिति में धार्मिक आस्था का स्वरूप भिन्न है, लेकिन मध्य भारत में स्थिति अलग है। यहां की जनजातीय बहुल आबादी के संदर्भ में यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि मतांतरण की स्थिति उनके अपने ही अधिकारों से उन्हें वंचित कर सकती है।