ईरान पर जमीनी हमले को लेकर अमेरिका-इजराइल की रणनीति, खार्ग द्वीप की अहमियत और संभावित चुनौतियों का विश्लेषण। क्या कब्जा संभव है? जानें पूरी रिपोर्ट।
मेजर सरस् त्रिपाठी
अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान की धरती पर थलसेना या कमांडो के माध्यम से प्रवेश कर कब्ज़ा स्थापित करने का प्रश्न केवल सैन्य शक्ति का नहीं, बल्कि भू-राजनीति, भूगोल, रणनीति, लॉजिस्टिक्स और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया जैसे कई जटिल कारकों से जुड़ा है। चूंकि अभी तक इस्त्राइल और अमेरिका को योजनानुसार सफलता नहीं मिली है तो इस बात की योजना चल रही है कि वहां खार्ग द्वीप पर कमांडो आपरेशन कर कब्जा किया जाये। ईरान की 40% अर्थव्यवस्था खार्ग द्वीप से चलती है।
संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति है। उसके पास लगभग 13 लाख सक्रिय सैनिक, 800 से अधिक विदेशी सैन्य ठिकाने और अत्याधुनिक हथियार प्रणाली हैं। इस्राइल की सेना तुलनात्मक रूप से छोटी (लगभग 1.7 लाख सक्रिय सैनिक) लेकिन अत्यधिक प्रशिक्षित और तकनीकी रूप से उन्नत है। इस्त्राइल की सेना जमीनी सैन्य कार्रवाई का अनुभव भी बहुत समृद्ध है।इसके मुकाबले ईरान के पास लगभग 5.8 लाख सक्रिय सैनिक और 3.5 लाख रिजर्व फोर्स है। इसके अतिरिक्त, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्स (IRGC) और उससे जुड़े अर्धसैनिक बल लगभग 1-2 लाख अतिरिक्त लड़ाकों की क्षमता रखते हैं। यानी, केवल संख्या के आधार पर देखें तो ईरान की जमीनी रक्षा मजबूत है। लेकिन अमेरिका की तकनीकी श्रेष्ठता और वायु शक्ति इसे संतुलित करती है।
थलसेना भेजने की चुनौतियां
1. भौगोलिक और सामरिक चुनौतियाँ
ईरान का भूगोल आक्रमणकारी सेना के लिए सबसे बड़ी बाधा है। ईरान का क्षेत्रफल लगभग 16.5 लाख वर्ग किमी (इराक से लगभग 4 गुना बड़ा) है। जहां काफी बड़ा भूभाग पहाड़ी है। जाग्रोस और एल्बुर्ज पर्वत श्रृंखलाएँ कठोर चट्टानों से बनी है। यह भाग अजनबी थलसेना के लिए 'वाटरलू' बन सकता है।
2. शहरी करण और शहरी आबादी
ईरान में लगभग 60% लोग शहरों में रहते हैं। इराक युद्ध के दौरान अमेरिका ने लगभग 1.7 लाख सैनिकों के साथ इराक पर हमला किया था, जो ईरान से कहीं छोटा और सैन्यरूप से कमजोर था। इसके बावजूद स्थिति पर नियंत्रण स्थापित करने में वर्षों लग गए।ईरान में इसी तरह का ऑपरेशन करने के लिए अनुमानतः 5-10 लाख सैनिकों की आवश्यकता हो सकती है जो वर्तमान वैश्विक तैनाती के हिसाब से अमेरिका के लिए भी कठिन है, क्योंकि यह अमेरिका की लगभग एक तिहाई सेना को ईरान में ही उलझा देगी।
3. संभावित सैन्य रणनीति
यदि अमेरिका और इस्त्राइल ईरान में प्रवेश करते हैं, तो यह पूर्ण पैमाने के आक्रमण के बजाय सीमित ऑपरेशन के रूप में अधिक संभावित है। इसमें खार्ग द्वीप और अन्य लगभग 40 छोटे छोटे द्वीपो पर कब्जा की योजना हो सकती है। इसके साथ एयर स्ट्राइक और साइबर वॉर परमाणु ठिकानों, मिसाइल बेस और IRGC ठिकानों पर हमले जारी रहना आवश्यक होगा। पहले से ही इस्राइल द्वारा गुप्त ऑपरेशन और साइबर हमले (जैसे Stu&net) किए जा चुके हैं। थलसेना का प्रवेश स्पेशल फोर्स ऑपरेशन और कमांडो मिशन के रुप में लक्ष्य आधारित हमले, उच्च मूल्य वाले टारगेट (HVTs) को समाप्त करने के रूप में हो सकता है। लेकिन ये ऑपरेशन 'कब्जा' स्थापित नहीं कर सकते। सीमित जमीनी घुसपैठ, सीमावर्ती क्षेत्रों या सामरिक ठिकानों पर अस्थायी नियंत्रण और द्वीपों पर कब्जा तो संभव हो सकता है परन्तु संपूर्ण देश पर कब्जा करना लगभग असंभव है। 4. लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन की समस्या ईरान पर जमीनी आक्रमण का सबसे बड़ा अवरोध सप्लाई लाइन है। अमेरिका के पास ईरान के पड़ोस में बड़े जमीनी बेस सीमित हैं। इराक और अफगानिस्तान से अनुभव मिला कि लंबी सप्लाई लाइनें हमलों के लिए संवेदनशील होती हैं। ईरान के पास बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हैं, जो सप्लाई लाइनों को निशाना बना सकते हैं।
5. ईरान की 'असिमेट्रिक वॉरफेयर' रणनीति
ईरान पारंपरिक युद्ध में अमेरिका से कमजोर है, लेकिन असममित युद्ध (asymmetric warfare) में मजबूत है। प्रॉक्सी समूहों जैसे हिज्बुल्लाह, हूती, इराकी मिलिशिया, हमास इत्यादि के माध्यम से ईरान गुरिल्ला युद्ध करके अमेरिका और इस्राइल की सप्लाई लाइन में बाधा डाल सकता है। चूंकि ये मिलिशिया ग्रुप पूरे मध्य पूर्व में फैले हैं, इससे युद्ध केवल ईरान की सीमा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व में फैल सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया और राजनीतिक लागत
6. ईरान पर जमीनी हमला वैश्विक स्तर पर बड़े विरोध का कारण बन सकता है। अमेरिका और इस्त्राइल ने ईरान पर हवाई और मिसाइल आक्रमण इस बात को आधार बनाकर किया था कि ईरान परमाणु बम बनाने के बहुत निकट है। अब तक इन आक्रमणों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अनेक बार दावा किया है कि उन्होंने ईरान के परमाणु संयंत्र नष्ट कर दिए हैं तो अब किस आधार पर भूमि पर आक्रमण को उचित ठहरायेंगे? इस बात की पूरी संभावना है कि चीन और रूस इस पर कड़ा रूख अपना सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ में इसका व्यापक विरोध हो सकता है।
क्या कब्जा संभव है?
अल्पकालिक सीमित क्षेत्र या सैन्य ठिकानों पर कब्जा संभव है और कमांडो ऑपरेशन सफल हो सकते हैं, लेकिन ईरान पर स्थायी और दीर्घकालिक कब्जा लगभग असंभव है। इसके अनेक कारण हैं। ईरान का विशाल क्षेत्रफल, विशाल जनसंख्या, वैविध्य पूर्ण भूमि रचना, आम जनता की इस्राइल और अमेरिका के प्रति शत्रुतापूर्ण भावना, ईरानियों का प्रबल राष्ट्रवाद और प्रतिरोध का मनोभाव इत्यादि प्रमुख हैं।अमेरिका और इस्त्राइल के पास ईरान में प्रवेश करने की सैन्य क्षमता अवश्य है, विशेषकर वायु और विशेष बलों के माध्यम से, लेकिन जमीनी स्तर पर व्यापक आक्रमण और दीर्घकालिक कब्ज़ा स्थापित करना व्यावहारिक रूप से अत्यंत कठिन, महंगा और जोखिमपूर्ण होगा।
ईरान का भूगोल, उसकी बड़ी सेना, असममित युद्ध क्षमता और संभावित अंतरराष्ट्रीय समर्थन इसे 'आसान लक्ष्य' नहीं बनने देते। इसलिए यदि संघर्ष होता भी है, तो वह सीमित, लक्षित और तकनीकी युद्ध के रूप में अधिक संभावित है-न कि पूर्ण पैमाने के जमीनी कब्जे के रूप में।