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इन्फ्लुएंसर अर्थव्यवस्था को नियामक आवश्यकता

इन्फ्लुएंसर्स के लिए संतुलित नियमन की मांग बढ़ी

डिजिटल युग में इन्फ्लुएंसर्स का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे वित्तीय, स्वास्थ्य और कानूनी क्षेत्र में जोखिम उभर रहा है। नियामक ढांचे की अवश्यकता पर जोर दिया गया है।


इन्फ्लुएंसर्स के लिए संतुलित नियमन की मांग बढ़ी

AI |

डॉ. शिवेशप्रताप

इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा वर्ष 2026 में जारी सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) द्वितीय संशोधन नियम, 2026 का मसौदा एक सुरक्षित और जवाबदेह इंटरनेट पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। हालांकि, इसका प्रमुख फोकस 'समाचार और समसामयिक विषयों' तक सीमित दिखाई देता है, जबकि आज डिजिटल माध्यम केवल समाचार का स्रोत नहीं रह गए हैं। निवेश सलाह, स्वास्थ्य मार्गदर्शन, कानूनी जानकारी और जीवनशैली जैसे अनेक संवेदनशील क्षेत्रों में भी सोशल मीडिया का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में भ्रामक जानकारी केवल विचार निर्माण को ही नहीं, बल्कि नागरिकों के आर्थिक निर्णयों, स्वास्थ्य सुरक्षा और सामाजिक व्यवहार को भी प्रभावित करती है। इसलिए आवश्यक है कि डिजिटल नियामक ढांचे में इन सभी पहलुओं को शामिल किया जाए, ताकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।

आज सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर केवल मनोरंजन या प्रचार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जनमत निर्माण और व्यवहारिक निर्णयों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। वित्तीय निवेश से लेकर स्वास्थ्य सलाह, कानूनी जानकारी और जीवनशैली तक उनका प्रभाव उन क्षेत्रों में भी पहुंच गया है, जो पहले केवल प्रशिक्षित और प्रमाणित विशेषज्ञों तक सीमित थे। भारत इस परिवर्तन का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। देश में 80 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं और लगभग 45 से 50 करोड़ लोग सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। औसतन प्रत्येक भारतीय प्रतिदिन ढाई से तीन घंटे सोशल मीडिया पर व्यतीत करता है। इसी के साथ भारत की इन्फ्लुएंसर अर्थव्यवस्था भी तेजी से विकसित हुई है। देश में लगभग 35 से 45 लाख इन्फ्लुएंसर्स सक्रिय हैं और यह उद्योग वर्ष 2024 तक लगभग 3500 करोड़ रुपये का हो चुका है। इसमें लगभग 25 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर्ज की जा रही है। 65 प्रतिशत से अधिक उपभोक्ता किसी न किसी रूप में इन्फ्लुएंसर की सिफारिशों पर भरोसा करते हैं, जबकि लगभग 70 प्रतिशत ब्रांड अपनी विपणन रणनीति में इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग को शामिल कर चुके हैं।

लेकिन इस तीव्र विस्तार ने एक गंभीर चुनौती भी उत्पन्न की है। सूचना तक पहुंच आसान हुई है, पर उसकी विश्वसनीयता और जवाबदेही कम हुई है। बिना किसी औपचारिक योग्यता के अनेक इन्फ्लुएंसर्स वित्त, स्वास्थ्य और कानून जैसे संवेदनशील विषयों पर सलाह दे रहे हैं, जिससे आर्थिक नुकसान, स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और कानूनी भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

इस चुनौती को देखते हुए कई देशों ने नियामक कदम उठाए हैं। चीन का मॉडल सबसे अधिक संरचित माना जाता है। वहां वित्त, चिकित्सा और कानून जैसे क्षेत्रों में केवल वही इन्फ्लुएंसर सामग्री साझा कर सकते हैं, जिनके पास मान्यता प्राप्त डिग्री या लाइसेंस हो। 'नो डिग्री, नो एडवाइस' के सिद्धांत के साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर भी यह जिम्मेदारी डाली गई है कि वे इन्फ्लुएंसर्स की योग्यता का सत्यापन करें और भ्रामक सामग्री को रोकें। 'वन अकाउंट, वन आइडेंटिटी' जैसी व्यवस्था के माध्यम से प्रत्येक इन्फ्लुएंसर की पहचान सुनिश्चित की गई है तथा भ्रामक सामग्री के विरुद्ध व्यापक कार्रवाई भी की गई है।

अमेरिका में नियमन का आधार पारदर्शिता है, जहां पेड प्रमोशन का स्पष्ट खुलासा अनिवार्य किया गया है। वहीं यूरोपीय संघ ने डिजिटल सर्विसेज एक्ट के माध्यम से प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही, एल्गोरिदम की पारदर्शिता और भ्रामक सामग्री पर नियंत्रण जैसे प्रावधान लागू किए हैं। यह सह-विनियमन का ऐसा मॉडल है, जिसमें सरकार और डिजिटल प्लेटफॉर्म दोनों की जिम्मेदारी तय की गई है।

भारत में इन्फ्लुएंसर अर्थव्यवस्था तेजी से विकसित हो रही है, लेकिन इसके अनुरूप व्यापक नियामक व्यवस्था अभी भी अनुपस्थित है। विज्ञापन मानक परिषद द्वारा पेड कंटेंट के खुलासे तथा सेबी द्वारा अनधिकृत निवेश सलाह पर रोक जैसे प्रयास हुए हैं, लेकिन ये सीमित और बिखरे हुए हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में बिना किसी प्रमाणिक योग्यता के सलाह दी जा रही है।

वित्तीय क्षेत्र में अनेक इन्फ्लुएंसर्स बिना पंजीकरण के निवेश सलाह देते हैं तथा इंट्राडे ट्रेडिंग, क्रिप्टोकरेंसी और गारंटीड रिटर्न जैसे भ्रामक दावे करते हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में बिना वैज्ञानिक प्रमाण के डाइट, वैकल्पिक चिकित्सा और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सलाह दी जा रही है। इसी प्रकार कानूनों की गलत व्याख्या लोगों को भ्रमित करती है और कई बार अनजाने में कानूनी उल्लंघन का कारण बनती है। स्पष्ट है कि इन्फ्लुएंसर्स अब केवल कंटेंट क्रिएटर नहीं, बल्कि अनौपचारिक सलाहकार बन चुके हैं, जबकि उनके लिए कोई प्रभावी जवाबदेही व्यवस्था मौजूद नहीं है।

भारत के लिए एक संतुलित और लोकतांत्रिक नियामक ढांचा समय की आवश्यकता है। इसका उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी सुनिश्चित करना होना चाहिए। ऐसा ढांचा नागरिकों को वित्तीय, स्वास्थ्य और कानूनी जोखिमों से सुरक्षित करेगा, इन्फ्लुएंसर अर्थव्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बनाएगा और जिम्मेदार डिजिटल शासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

इसके लिए सबसे पहले कंटेंट को जोखिम के आधार पर वर्गीकृत किया जाना चाहिए। मनोरंजन और जीवनशैली जैसे विषयों को कम जोखिम तथा वित्त, स्वास्थ्य और कानून को उच्च जोखिम की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में केवल प्रमाणित पेशेवरों को ही सलाह देने की अनुमति हो। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को इन्फ्लुएंसर्स की योग्यता सत्यापित करने तथा भ्रामक सामग्री को चिह्नित कर हटाने की जिम्मेदारी दी जाए। साथ ही, पेड कंटेंट का स्पष्ट खुलासा, स्रोतों का उल्लेख और आवश्यक जोखिम चेतावनी अनिवार्य की जाए। प्रभावी दंड व्यवस्था के साथ-साथ व्यापक डिजिटल साक्षरता अभियान भी चलाए जाएं, ताकि नागरिक स्वयं सही और गलत जानकारी में अंतर कर सकें।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि नियमन से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होगी, जबकि विचार और पेशेवर सलाह में स्पष्ट अंतर है। विचारों की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है, लेकिन वित्त, स्वास्थ्य और कानून जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है। भारत को न तो पूर्ण अनियंत्रण की स्थिति स्वीकार करनी चाहिए और न ही अत्यधिक कठोर नियंत्रण की। आवश्यकता 'नियंत्रित स्वतंत्रता' के ऐसे मॉडल की है, जिसमें नवाचार और रचनात्मकता को प्रोत्साहन मिले, लेकिन नागरिकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।

इन्फ्लुएंसर अर्थव्यवस्था डिजिटल युग का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुकी है। इसे पूरी तरह अनियंत्रित छोड़ना भविष्य में बड़े सामाजिक और आर्थिक संकट का कारण बन सकता है। भारत के पास अवसर है कि वह ऐसा संतुलित और प्रभावी नियामक मॉडल विकसित करे, जो नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर जिम्मेदार डिजिटल शासन का उदाहरण भी प्रस्तुत करे। अंततः समय की मांग यही है कि प्रभाव को जिम्मेदारी के साथ जोड़ा जाए, ताकि डिजिटल युग में विकास और विश्वास दोनों समान रूप से आगे बढ़ सकें।

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