प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा से भारत-इजरायल संबंधों को नई धार मिल सकती है। रक्षा, तकनीक, व्यापार और सामरिक सहयोग के क्षेत्र में रिश्ते औपचारिकता से आगे बढ़ते दिख रहे हैं
भारत और इजरायल के संबंध आज केवल औपचारिक कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे रणनीतिक विश्वास, तकनीकी साझेदारी और साझा सुरक्षा चिंताओं पर आधारित एक परिपक्व रिश्ते में बदल चुके हैं। ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नौ वर्ष बाद इजरायल की यात्रा पर गए हैं, यह दौरा दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई देने वाला साबित हो सकता है।भारत ने 1950 में इजरायल को मान्यता दी और 1992 में पूर्ण कूटनीतिक संबंध स्थापित किए। लंबे समय तक भारत की पश्चिम एशिया नीति संतुलन पर आधारित रही, किंतु 2017 में प्रधानमंत्री मोदी की ऐतिहासिक यात्रा ने इस संबंध को सार्वजनिक रूप से नई दिशा दी।अब यह रिश्ता केवल रक्षा खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि संयुक्त अनुसंधान, तकनीक हस्तांतरण, कृषि नवाचार, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों तक विस्तृत हो चुका है। रणनीतिक दृष्टि से देखें तो भारत और इजरायल दोनों आतंकवाद से प्रभावित लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं। दोनों की सुरक्षा चुनौतियां जटिल और बहुआयामी हैं।
ऐसे में रक्षा सहयोग केवल हथियारों की खरीद नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामरिक साझेदारी का हिस्सा है। ड्रोन तकनीक, मिसाइल रक्षा प्रणाली, साइबर डिफेंस और इंटेलिजेंस साझाकरण जैसे क्षेत्र भारत की सुरक्षा संरचना को मजबूत कर सकते हैं। यदि ड्रोन और एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम जैसे प्रस्तावित समझौते आगे बढ़ते हैं, तो यह भारतीय सशस्त्र बलों की तकनीकी क्षमता में गुणात्मक वृद्धि करेगा।इजरायल ने सीमित संसाधनों के बावजूद रक्षा और कृषि नवाचार में वैश्विक पहचान बनाई है। जल प्रबंधन, सूक्ष्म सिंचाई और स्टार्टअप इकोसिस्टम में उसका अनुभव भारत जैसे विशाल देश के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकता है। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत संयुक्त निर्माण और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भारत को आयातक से निर्माता बनने की दिशा में आगे बढ़ा सकता है। इससे रोजगार, निवेश और कौशल विकास को भी बल मिलेगा।
आर्थिक आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। दोनों देशों के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता व्यापार को नई गति दे सकता है। वर्तमान व्यापार आंकड़ों की तुलना में संभावनाएं कहीं अधिक व्यापक हैं, विशेषकर फार्मास्यूटिकल्स, आईटी, रक्षा उत्पादन, कृषि तकनीक और स्टार्टअप सहयोग के क्षेत्र में। यदि यह समझौता संतुलित और व्यावहारिक ढंग से संपन्न होता है, तो छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए भी नए बाजार खुल सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी का इजरायली संसद को संबोधित करना प्रतीकात्मक और रणनीतिक, दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यह संकेत देता है कि भारत अपने वैश्विक संबंधों को आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ा रहा है। यह यात्रा केवल द्विपक्षीय सहयोग नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्र और बहु-आयामी विदेश नीति का प्रदर्शन भी है।
निश्चित ही कुछ आलोचनाएं समय-चयन को लेकर उठी हैं, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के संदर्भ में। किंतु परिपक्व कूटनीति का अर्थ ही यह है कि संवाद और सहयोग कठिन परिस्थितियों में भी जारी रहें। भारत की नीति परंपरागत रूप से बहुध्रुवीय संतुलन पर आधारित रही है, जहां इजरायल के साथ मजबूत संबंध फिलिस्तीन और अरब देशों के साथ मित्रता के विरोधाभासी नहीं हैं, बल्कि पूरक हो सकते हैं।समग्र रूप से देखें तो यह यात्रा रक्षा, व्यापार, तकनीक और सामरिक सहयोग के नए अध्याय खोलने की क्षमता रखती है। यदि प्रस्तावित समझौते ठोस परिणामों में बदलते हैं, तो यह दौरा भारत की सुरक्षा संरचना, आर्थिक विकास और वैश्विक रणनीतिक स्थिति तीनों के लिए फलदायी सिद्ध हो सकता है। भारत-इजरायल संबंध अब औपचारिकता से आगे बढ़कर विश्वास, नवाचार और साझा हितों पर आधारित साझेदारी में रूपांतरित हो रहे हैं, और यही इस यात्रा का सबसे बड़ा सकारात्मक संदेश है।