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Hanuman Janmotsav: Bhakti aur Samarpan

श्री हनुमानजी जन्मोत्सव:  समर्पण की पराकाष्ठा और भक्ति का शिखर

हनुमान जन्मोत्सव पर विशेष: भक्ति, समर्पण और पराक्रम के प्रतीक हनुमानजी का जीवन दर्शन। तुलसीदास और वाल्मीकि के संदर्भ में जानिए उनका आध्यात्मिक महत्व।


श्री हनुमानजी जन्मोत्सव  समर्पण की पराकाष्ठा और भक्ति का शिखर

अनुराग तागड़े

भक्ति, पराक्रम और पूर्ण समर्पण का यदि कोई सजीव प्रतिमान है, तो वह श्री हनुमानजी हैं। गोस्वामी तुलसीदासजी का यह कथन “हनुमान सम नहीं बड़भागी, नहीं कोउ चरन अनुरागी”केवल काव्य नहीं, बल्कि सनातन दर्शन का निष्कर्ष है। हनुमानजी वह सेतु हैं, जहां जीव और ब्रह्म का अद्वैत भाव साकार होता है।

तुलसीकृत रामायण में हनुमान का अद्वितीय स्वरूप श्रीरामचरितमानस में तुलसीदासजी ने हनुमानजी को केवल वीर नहीं, बल्कि भक्ति के परम शिखर के रूप में चित्रित किया है “प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥” यहां हनुमान केवल श्रोता नहीं, बल्कि रामकथा में तन्मय आत्मा हैं।

एक अन्य गूढ़ चौपाई “जाकी गति है हनुमान की, ता पर कृपा करहिं भगवान की॥” यह स्पष्ट करती है कि हनुमान का मार्ग ही भगवान तक पहुंचने का सहज मार्ग है। तुलसीदासजी ने उनकी कार्यकुशलता और विवेक का भी अद्भुत वर्णन किया “सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा, विकट रूप धरि लंक जरावा॥” यह केवल बल का प्रदर्शन नहीं, बल्कि स्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की दिव्य क्षमता है।

वाल्मीकि रामायण में हनुमान बुद्धि, बल और नीति के आदर्श। यदि तुलसीदासजी ने हनुमान को भक्ति का शिखर बनाया, तो महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें नीति, बुद्धि और कूटनीति का अद्वितीय संगम बताया। श्री हनुमान के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है-

“नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः।
न सामवेदविदुषः शक्यमेवं प्रभाषितुम्॥”

अर्थात, जो ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का ज्ञाता न हो, वह हनुमान की तरह मधुर और प्रभावशाली वाणी नहीं बोल सकता। यहां हनुमान केवल बलवान नहीं, बल्कि उच्च कोटि के विद्वान और वक्ता के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

“यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किम।
लोचनाभ्यां विहीनस्य, दर्पणः किं करिष्यति॥”

इस भाव को हनुमानजी अपने आचरण से सिद्ध करते हैं ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह व्यवहार में उतरे। जब हनुमान समुद्र लांघने का संकल्प लेते हैं, तब जाम्बवन्त उनके भीतर की शक्ति को जागृत करते हैं। यह प्रसंग बताता है कि हर व्यक्ति में हनुमान जैसी क्षमता होती है, बस उसे पहचानने की आवश्यकता है।

हनुमान बाहुक: पीड़ा से परे भक्ति का उत्कर्ष

तुलसीदासजी द्वारा रचित हनुमान बाहुक भक्ति का वह रूप है, जहां भक्त अपनी सम्पूर्ण वेदना को ईश्वर के चरणों में अर्पित कर देता है-

“नाथ हनुमंत कृपा करि कीजै,
रोग दोष दुख दारिद्र हरि लीजै॥”

यह केवल शारीरिक रोग नहीं, बल्कि जीवन के समस्त क्लेशों से मुक्ति की पुकार है।

“बाहु पीर अति बाढ़ी भारी,
हरहु नाथ मम संकट भारी॥”

यहां ‘बाहु पीर’ मानव जीवन के संघर्ष, असहायता और पीड़ा का प्रतीक है। हनुमान बाहुक हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल सुख में नहीं, बल्कि दुःख में भी अटूट विश्वास बनाए रखना है।

भक्ति, नीति और कर्म का संगम-हनुमान

तुलसी और वाल्मीकि, दोनों ही दृष्टिकोणों में हनुमानजी एक ऐसे चरित्र के रूप में उभरते हैं, जो
भक्ति में पूर्ण (तुलसीदास),
बुद्धि और नीति में अद्वितीय (वाल्मीकि),
और कर्म में निष्काम (गीता का आदर्श) हैं।

वे कहते हैं-
“देह बुद्धि से दास हूं, जीव बुद्धि से अंश,
आत्म बुद्धि से तुम ही मैं हूं।”

यह अद्वैत का सर्वोच्च दर्शन है, जहां भक्त और भगवान में भेद समाप्त हो जाता है।

आज के युग में हनुमान का संदेश

आधुनिक युग में, जहां मनुष्य तनाव, प्रतिस्पर्धा और आत्मकेंद्रितता से ग्रस्त है, हनुमानजी का जीवन एक जीवंत मार्गदर्शक है निष्काम कर्म (बिना स्वार्थ के कार्य करना), विनम्रता (शक्ति होने पर भी अहंकार न करना) और अटूट श्रद्धा (हर परिस्थिति में विश्वास बनाए रखना)।

आज वैज्ञानिक शोध भी यह स्वीकार करते हैं कि मंत्र जाप, ध्यान और श्रद्धा मानसिक संतुलन, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाते हैं।

हनुमान: केवल आराध्य नहीं, जीवन-दर्शन

हनुमानजी केवल पूजा के विषय नहीं, बल्कि जीवन के पथप्रदर्शक हैं। वे हमें सिखाते हैं “राम काज कीन्हे बिना, मोहि कहां विश्राम।”यही भाव यदि जीवन में उतर जाए, तो हर व्यक्ति अपने भीतर के हनुमान को जागृत कर सकता है।हनुमानजी का चरित्र यह उद्घोष करता है कि सच्ची महानता शक्ति में नहीं, बल्कि समर्पण में है। सच्ची भक्ति शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में है, और सच्चा जीवन वही है, जो सेवा में समर्पित हो।

 

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