ईरान-इजराइल संघर्ष से वैश्विक तेल बाजार अस्थिर, कीमतें 100 डॉलर पार। भारत ने संतुलित नीति से पेट्रोल-डीजल कीमतों को नियंत्रित रखा, जिससे देश में स्थिरता बनी रही।
ईरान इजराइल संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अभूतपूर्व अस्थिरता में डाल दिया है। पश्चिम एशिया, जो विश्व के कच्चे तेल का प्रमुख केंद्र है, आज युद्ध की चपेट में है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य, जिसके माध्यम से विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होती है, इस संघर्ष के कारण प्रभावित हो रहा है। परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है, और इसका असर 80 से अधिक देशों में
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तीव्र वृद्धि के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका जैसे विकसित देश में डीजल 5 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर चला गया है, जबकि एशिया के कई देशों, वियतनाम, लाओस और कंबोडिया में 20 से 50 प्रतिशत तक मूल्य वृद्धि दर्ज की गई है। कुछ देशों में ईंधन संकट के चलते बिजली कटौती और राशनिंग जैसी स्थितियां उत्पन्न हो गई हैं। यह परिदृश्य इस बात का प्रमाण है कि यह संकट केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है। ऐसे समय में भारत की स्थिति तो अपेक्षाकृत स्थिर और नियंत्रित दिखाई देती है। भारत अपनी लगभग 85-90 प्रतिशत तेल आवश्यकता आयात करता है, इसके बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को स्थिर बनाए रखना एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। यह स्थिति अपने आप में नहीं बनी, बल्कि इसके पीछे केंद्र सरकार की सुनियोजित रणनीति और संतुलित आर्थिक प्रबंधन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने वैश्विक संकट के बावजूद आम नागरिक पर अतिरिक्त बोझ न डालने की नीति अपनाई है।
तेल कंपनियों पर पड़ रहे आर्थिक दबाव के बावजूद कीमतों को नियंत्रित रखना यह दर्शाता है कि सरकार जनहित को सर्वोपरि मानते हुए निर्णय ले रही है। ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों का विविधीकरण, सामरिक पेट्रोलियम भंडार का निर्माण और त्वरित कूटनीतिक प्रयास ये सभी कदम आज भारत के लिए सुरक्षा कवच सिद्ध हो रहे हैं। लेकिन इस पूरे परिदृश्य में एक चिंताजनक पक्ष भी सामने आता है- देश की विपक्षी राजनीति, विशेषकर कांग्रेस का रवैया। जिस समय देश एक वैश्विक संकट से जूझ रहा है, उस समयतथ्यों की गहराई में जाए बिना सरकार को कटघरे में खड़ा करना न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल भी है। संसद के भीतर और बाहर कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा यह आरोप लगाया गया कि सरकार तेल संकट को लेकर संवेदनशील नहीं है, जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। जब विश्व के अधिकांश देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं, तब भारत में उन्हें स्थिर बनाए रखना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। ऐसे में बिना तथ्यों के राजनीतिक बयानबाजी करना जनता को भ्रमित करने का प्रयास प्रतीत होता है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि रचनात्मक सुझाव देना और राष्ट्रीय संकट के समय सरकार के साथ खड़े होना भी है। दुर्भाग्यवश, इस मुद्दे पर कांग्रेस उस कसौटी पर खरी नहीं उतरती दिख रही है। यह अपेक्षा की जाती है कि विपक्ष कम से कम ऐसे संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर तथ्यपरक और जिम्मेदार रुख अपनाए।
यह भी सत्य है कि यह स्थिति लंबे समय तक बनी नहीं रह सकती। यदि संघर्ष लंबा चलता है या होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह बाधित होता है, तो भारत के लिए भी कीमतों को स्थिर रखना कठिन हो सकता है। फिर भी वर्तमान संदर्भ में यह स्पष्ट है कि भारत ने इस वैश्विक संकट का सामना अन्य देशों की तुलना में अधिक संतुलित ढंग से किया है। जहां कई राष्ट्र ईंधन संकट और मूल्यवृद्धि से जूझ रहे हैं, वहीं भारत में स्थिति नियंत्रण में है। यह सरकार की दूरदर्शिता और कुशल प्रबंधन का परिणाम है।