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Emergency: Jail, Illness and Democracy

आपातकाल की आपबीती: जेल, बीमारी और अटूट लोकतांत्रिक विश्वास

आपातकाल के दौरान चंदेरी के अधिवक्ता पंडित श्रीकृष्ण कांत भार्गव को जेल भेज दिया गया। बीमारी और दबाव के बावजूद उन्होंने लोकतंत्र और राष्ट्रवादी विचारों से समझौता नहीं किया।


आपातकाल की आपबीती जेल बीमारी और अटूट लोकतांत्रिक विश्वास

गुना। आपातकाल ने देशभर में हजारों लोगों के जीवन को झकझोर दिया था। यह केवल जेल और यातनाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने परिवारों की मानसिक शांति, सामाजिक जीवन और स्वास्थ्य तक को प्रभावित किया। चंदेरी निवासी लोकतंत्र सेनानी पंडित श्रीकृष्ण कांत भार्गव की कहानी भी ऐसे ही संघर्ष और साहस की कहानी है।

जनसंघ से जुड़े श्रीकृष्ण भार्गव पेशे से अधिवक्ता थे। उस समय चंदेरी और मुंगावली में संयुक्त न्यायालय लगती थी। 15 दिन अदालत चंदेरी में और 15 दिन मुंगावली में संचालित होती थी। आपातकाल लागू होने के बाद एक दिन वह चंदेरी न्यायालय में अपने काम में व्यस्त थे। तभी पुलिस वहां पहुंची और 'साहब ने बुलाया है' कहकर उन्हें अपने साथ ले गई।

पहले तो किसी को समझ नहीं आया कि आखिर हुआ क्या है, लेकिन थोड़ी देर में खबर परिवार तक पहुंच गई कि पंडित श्रीकृष्ण कांत भार्गव को मीसा के तहत जेल भेज दिया गया है। यह सुनते ही पूरे परिवार में हड़कंप मच गया। उस समय देशभर में विरोधियों और राष्ट्रवादी विचारों से जुड़े लोगों को चुन-चुनकर जेल में पं श्री कृष्णकांत भार्गवी चंदेरी डाला जा रहा था। ऐसे माहौल में उनका जेल जाना परिवार के लिए गहरे भय और चिंता का कारण बन गया।

परिवार संयुक्त था। पिता शिवदयाल चौबे, पत्नी कमला भार्गव और घर के अन्य सदस्य एक-दूसरे को संभालने की कोशिश कर रहे थे। घर में चार छोटे बच्चे संख्या, श्रीकांत, शशिकांत और अजयकांत भय और अनिश्चितता के माहौल में सहमे रहते थे।

पुत्र श्रीकांत बताते हैं कि उस समय उनकी उम्र महज सात-आठ वर्ष थी, इसलिए बहुत सी बातें धुंधली हैं, लेकिन इतना जरूर याद है कि घर का हर व्यक्ति चिंता में डूबा रहता था। सभी को यही डर सताता था कि श्रीकृष्ण जेल से छूटेंगे भी या नहीं। चंदेरी का वातावरण ऐसा था कि लोग आपातकाल पर चर्चा करने से भी डरते थे। पुलिस और प्रशासन का भय हर तरफ दिखाई देता था।

हालांकि श्रीकृष्ण पर मीसा की धारा औपचारिक रूप से नहीं लगाई गई थी, फिर भी उन्हें 20 से 25 दिन तक जेल में  रखा गया। परिवार के लिए यह समय मानो 20-25 वर्षों जैसा भारी था। इस दौरान परिवार पर आपातकाल के समर्थन का दबाव भी बनाया जाता रहा, जिसने उनकी चिंता और बढ़ा दी।

जब श्रीकृष्ण जेल से वापस लौटे तो परिवार ने राहत की सांस ली, लेकिन जेल की यातनाओं ने उनके स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर दिया था। वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। उस समय चंदेरी में बेहतर चिकित्सा सुविधाएं नहीं थीं, इसलिए बाद में उनका इलाज इंदौर में कराया गया। लंबी बीमारी ने उन्हें शारीरिक रूप से कमजोर कर दिया, लेकिन उनके विचार और संकल्प कभी कमजोर नहीं हुए।

श्रीकृष्ण भार्गव ने जनसंघ और बाद में भाजपा में विभिन्न दायित्व निभाए। संगठन के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण की छाप आज भी लोगों के मन में जीवित है। उनके पुत्र श्रीकांत भार्गव भी आज उन्हीं आदशों और राष्ट्रवादी विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं।

वर्ष 2015 में श्रीकृष्ण भार्गव का निधन हो गया, जबकि 2016 में उनकी पत्नी कमला भार्गव ने भी दुनिया को अलविदा कहा। लेकिन लोकतंत्र की रक्षा के लिए उनका संघर्ष आज भी चंदेरी की स्मृतियों में जीवित है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि कठिन से कठिन दौर में भी लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रहित के प्रति आस्था कमजोर नहीं पड़नी चाहिए।

आपातकाल का दौर केवल राजनीतिक दमन का समय नहीं था, बल्कि हजारों परिवारों की पीड़ा, भय और संघर्ष का भी कालखंड था। गुना जिले के चंदेरी निवासी अधिवक्ता पंडित श्रीकृष्ण कांत भार्गव भी उन लोकतंत्र सेनानियों में थे, जिन्हें बिना किसी स्पष्ट अपराध के जेल में डाल दिया गया। अदालत से सीधे जेल पहुंचाए गए श्रीकृष्ण ने न केवल कारावास झेला, बल्कि उसकी भारी कीमत अपने स्वास्थ्य से भी चुकाई। फिर भी उन्होंने लोकतंत्र और राष्ट्रवादी विचारों के प्रति अपनी निष्ठा कभी कमजोर नहीं पड़ने दी।

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