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Democracy Restoration Day

लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का पुण्य दिवस : 22 मार्च

डॉ. राघवेंद्र शर्मा


लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का पुण्य दिवस  22 मार्च

भारतीय लोकतंत्र की गौरवशाली यात्रा में कुछ तिथियाँ ऐसी हैं जो मात्र कालखंड का हिस्सा नहीं, बल्कि राष्ट्र के चरित्र और जनता की अजेय इच्छाशक्ति का जीवंत प्रमाण हैं। इन्ही में से एक ऐतिहासिक दिन 22 मार्च 1977 का है, जो भारतीय राजनीति के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। यह वह दिन था जब सत्ता के अहंकार में डूबी एक तानाशाही शक्ति को जन-गण-मन की सामूहिक चेतना के सम्मुख नतमस्तक होना पड़ा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गए आपातकाल के काले साये को हटाकर देश ने लोकतंत्र की नई सुबह का स्वागत किया था।

यह घटना आज भी हमें निरंतर इस सत्य का बोध कराती है कि यदि देश की जनता सजग रहे और अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति पूर्ण निष्ठावान रहे, तो दुनिया की कोई भी दमनकारी शक्ति जनभावनाओं का गला नहीं घोंट सकती। 1975 से 1977 के बीच का वह कालखंड, जिसे स्वतंत्र भारत का सबसे अंधकारमय अध्याय माना जाता है, वास्तव में लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा का समय था। जब राजनीतिक विरोधियों को जेलों में ठूंस दिया गया, प्रेस की स्वतंत्रता पर बेड़ियाँ डाल दी गईं और सामान्य नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन किया गया, तब सत्ता पर काबिज तानाशाह शासकों को यह मुगालता होने लगा था कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ें इतनी गहरी नहीं हैं। परंतु 22 मार्च 1977 के परिणामों ने इस धारणा को निर्मूल सिद्ध कर दिया। यह केवल एक सरकार का पतन नहीं था, बल्कि उन शक्तियों का पराभव था जिन्होंने संविधान को अपनी जागीर समझ लिया था।

​इस ऐतिहासिक मोड़ ने देश के राजनेताओं और सभी राजनीतिक दलों को एक स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया कि भारत की मिट्टी में तानाशाही के बीज कभी पनप नहीं सकते। यहाँ की जनता शांत अवश्य रहती है, परंतु जब संविधान की मर्यादाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रहार होता है, तो वह विराट रूप धारण कर सत्ता के ऊंचे बुर्जों को ढहाने का सामर्थ्य भी दिखा देती है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह कहते हैं कि हमारा संविधान आज इतना सशक्त है कि इसकी हत्या करना तो दूर, ऐसा विचार करना भी असंभव है, तो यह उसी ऐतिहासिक विरासत और संवैधानिक मजबूती का परिचायक है। आज के समय में जब वे राजनीतिक दल, जिन्होंने स्वयं 1975 में लोकतंत्र की हत्या का कुत्सित प्रयास किया था,

सड़कों पर उतरकर लोकतंत्र के खतरे में होने का राग अलापते हैं, तो उनकी बातें जनता के गले नहीं उतरतीं। इसके दो प्रमुख और ठोस कारण हैं। पहला यह कि कांग्रेस का अपना इतिहास संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन और आपातकाल लादने जैसे पापपूर्ण कृत्यों से भरा पड़ा है। दूसरा कारण यह है कि आज भारत में एक ऐसी मजबूत और लोकतांत्रिक सरकार है, जो न केवल संविधान का संरक्षण कर रही है, बल्कि उन ऐतिहासिक विसंगतियों को भी दूर कर रही है जिनका उपयोग कर केंद्र की पूर्ववर्ती तानाशाही सरकारों जनता द्वारा चुनी हुई राज्य सरकारों को बार-बार बर्खास्त किया था।
​विडंबना देखिए कि आज राजनीति की बिसात पर वे लोग भी कांग्रेस के हमकदम बने हुए हैं, जो स्वयं को समाजवाद का उत्तराधिकारी बताते हैं। यह अत्यंत विस्मयकारी और आत्मघाती दृश्य है कि जिन नेताओं के राजनीतिक पुरखों ने आपातकाल के दौरान जेल की यातनाएं सही और इंदिरा गांधी की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध संघर्ष किया, आज वही नेता सत्ता की लालसा में उसी तानाशाह और लोकतंत्र विरोधी विचारधारा की गोद में बैठे हैं। यह न केवल उनके पूर्वजों के बलिदान का अपमान है, बल्कि उन करोड़ों देशवासियों के साथ भी विश्वासघात है जिन्होंने लोकतंत्र को बचाने के लिए लाठियां खाई थीं। राजनीतिक स्वार्थ के वशीभूत होकर आपातकाल के उस कलंक को भूलने का नाटक करना राष्ट्र की स्मृति के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। मुझे भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे राष्ट्रनिष्ठ संगठन के स्वयंसेवक के रूप में यह देखना संतोष प्रदान करता है कि भले ही कुछ अवसरवादी नेता अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं को ताक पर रखकर लोकतंत्र के हत्यारों से संधि कर लें, परंतु संघ और भाजपा जैसे संगठन सदैव जनता को जागरूक करने के अपने पथ से विचलित नहीं होंगे।
​संविधान केवल कागजों पर लिखा एक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं का सुरक्षा कवच है। 19 75 से 22 मार्च 1977 तक की वह क्रांति हमें सिखाती है कि लोकतंत्र की रक्षा का भार केवल संस्थाओं पर नहीं, बल्कि अंतिम पायदान पर खड़े नागरिक के कंधों पर भी है। जब भी कोई सत्तालोलुप शक्ति संविधान को अपनी मुट्ठी में भींचने की कोशिश करेगी, उसे 22 मार्च के उस ऐतिहासिक सबक को याद रखना होगा। आज का भारत बदल चुका है। यह अब सूचनाओं और चेतना के स्तर पर इतना सशक्त है कि यहाँ भ्रम फैलाने की राजनीति अधिक समय तक नहीं टिक सकती। जनता अब नारों से नहीं, बल्कि नीति और नियत से शासन का आकलन करती है। विपक्षी दलों द्वारा फैलाया जा रहा 'लोकतंत्र बचाओ' का शोर वास्तव में उनकी अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने की छटपटाहट मात्र है।

ऐतिहासिक रूप से जिन लोगों ने व्यवस्थाओं का दुरुपयोग कर देश को डराने का काम किया, वे आज स्वयं डरे हुए हैं क्योंकि वर्तमान सरकार ने पारदर्शिता और संवैधानिक सुचिता को शासन का मूल मंत्र बना लिया है। ​अंततः 22 मार्च का दिन हमें इस संकल्प के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है कि भारत का लोकतंत्र सदैव अक्षुण्ण रहेगा। यह दिन उन सभी गुमनाम बलिदानियों को नमन करने का है जिन्होंने जेल की काल कोठरियों में रहकर भी लोकतंत्र की लौ को बुझने नहीं दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने जिस प्रकार उस कठिन समय में जनजागरण का कार्य किया, वह आज भी हमारे लिए मार्गदर्शक है। हमारा दायित्व है कि हम आने वाली पीढ़ियों को आपातकाल की विभीषिका के बारे में बताते रहें, ताकि भविष्य में कोई भी दल या नेता फिर कभी जनता की आवाज को दबाने का दुस्साहस न कर सके। यदि कोई फिर से लोकतंत्र की हत्या का स्वप्न देखता है, तो उसे यह जान लेना चाहिए कि भारत की जागरूक जनता ऐसे किसी भी प्रयास का अंतिम क्रिया-कर्म करने के लिए सदैव तत्पर है। लोकतंत्र के इस उत्सव में सजगता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है और 22 मार्च 1977 की वह विजय गाथा हमारे इस विश्वास का सबसे बड़ा आधार स्तंभ है।
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लेखक - डॉ. राघवेंद्र शर्मा (म.प्र. बाल आयोग के अध्यक्ष रहे हैं)

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