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Day Zero Warning Amid India Water Crisis

'डे ज़ीरो' की आहट, एल-नीनो का दंश और प्रकृति का प्रकोप

एल-नीनो, बढ़ती गर्मी और गिरते भूजल स्तर ने भारत में ‘डे ज़ीरो’ का खतरा बढ़ा दिया है। इंदौर समेत कई शहर जल संकट और सूखते स्रोतों से जूझ रहे हैं।


डे ज़ीरो की आहट एल-नीनो का दंश और प्रकृति का प्रकोप

प्रवीण कक्कड़

“पानी केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि सभ्यता की सांस है। जिस दिन यह सांस टूटेगी, विकास के सारे दावे धूल बन जाएंगे।”हम अक्सर कहते हैं कि मौसम बदल गया है। गर्मियां अब पहले जैसी नहीं रहीं। पारा 45-46 डिग्री के पार पहुंचने लगा है, हवा में तपिश बढ़ गई है और प्रकृति के इस उग्र प्रकोप के सामने धरती का धैर्य जैसे टूटता जा रहा है। वैश्विक स्तर पर सक्रिय हुए एल-नीनो के दंश ने हमारे पूरे मौसम चक्र को बिगाड़ कर रख दिया है, लेकिन इस नाराजगी का सबसे भयावह चेहरा सिर्फ झुलसाती लू नहीं है।

असली डर उस खाली बर्तन और हांफते ट्यूबवेल का है, जो एक बूंद पानी के लिए चीख रहे हैं। जल संकट और 'डे ज़ीरो' की आहट अब कोई दूर की आशंका नहीं, बल्कि हमारे दरवाजे पर खड़ी वर्तमान की सबसे कठोर सच्चाई है। हालात इतने विकराल हैं कि जिन शहरों को कभी ‘वॉटर सरप्लस’ कहकर सराहा जाता था, आज वहीं टैंकरों की अंतहीन कतारें और पानी के लिए संघर्ष करती पथराई आंखें दिखाई दे रही हैं। ऐसा लगता है मानो सचमुच पानी देने से अब इस ज़मीन ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए हैं।

पाताल भी रीता : जब ज़मीन ने हाथ खड़े कर दिए

मानव ने धरती को एक अंतहीन भंडार समझकर उससे सिर्फ लेना सीखा, लौटाने की जिम्मेदारी हम भूल गए। सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार भारत हर वर्ष लगभग 230 से 240 अरब घन मीटर भूजल निकाल रहा है। दुनिया में इस्तेमाल होने वाले कुल भूजल का लगभग एक-चौथाई (25 प्रतिशत) हिस्सा अकेले हमारा देश खपत कर रहा है। परिणाम अब सामने हैं। देश के 54 प्रतिशत से अधिक पारंपरिक जल स्रोत कुएं, बावड़ियां और तालाब या तो सूख चुके हैं या गंभीर संकट में हैं। कभी 40-50 फीट पर मिलने वाला पानी अब 600 से 800 फीट नीचे भी मुश्किल से मिल रहा है। बोरवेल की अंधी दौड़ ने धरती के सीने को छलनी कर दिया, तो वहीं शहरों में फैले सीमेंट और कंक्रीट के जाल ने मिट्टी की वह सांसें बंद कर दी हैं, जिससे बारिश का पानी रिसकर भूजल को रिचार्ज करता था।

इंदौर से देश तक : 'डे ज़ीरो' की दस्तक:नीति आयोग की ‘कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स’ रिपोर्ट ने वर्षों पहले जिस ‘डे ज़ीरो’ की चेतावनी दी थी, वह अब हकीकत में बदलती दिखाई दे रही है। देश के 21 बड़े शहर इस समय भूजल संकट की कगार पर खड़े हैं।हमारा इंदौर और मालवा क्षेत्र, जो कभी अपने बेहतरीन पारंपरिक जल प्रबंधन के लिए मिसाल माने जाते थे, आज इस भीषण चुनौती से सीधे जूझ रहे हैं। मालवा की भौगोलिक संरचना ‘बेसाल्ट चट्टानों’ वाली है, जो भूजल संचयन के लिहाज से बेहद संवेदनशील मानी जाती है। अत्यधिक दोहन के कारण मई की इस धूप में कई इलाकों का वाटर लेवल 200 से 300 फीट तक नीचे खिसक गया है।बढ़ते तापमान के कारण नर्मदा का बैकवॉटर और बड़े जलाशय भी तेज़ी से वाष्पीकरण का शिकार होकर पीछे हट रहे हैं, जिससे सप्लाई व्यवस्था पर भारी दबाव है।संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि पृथ्वी पर उपलब्ध कुल पानी में केवल 2.5 प्रतिशत ही मीठा और उपयोग योग्य है, जिसका बड़ा हिस्सा ग्लेशियरों में कैद है। जो पानी हमारी नदियों और भूमिगत स्रोतों में बचा भी है, उसका 70 प्रतिशत हिस्सा औद्योगिक कचरे, रसायनों और सीवेज के कारण प्रदूषित हो चुका है। यानी संकट केवल पानी की कमी का नहीं, बल्कि साफ पानी की भारी किल्लत का है।

एल-नीनो का दंश और बदलता मौसम चक्र: इस जल संकट के पीछे प्रकृति की नाराजगी और इंसानी गलतियों का एक खतरनाक घालमेल है। हाल के वर्षों में आए ‘एल-नीनो’ के प्रभाव ने देश भर में वर्षा के पैटर्न को पूरी तरह बिगाड़ दिया।कमज़ोर मानसून, सर्दियों में असामान्य रूप से कम ठंड और असमय बढ़ती गर्मी ने ज़मीन की बची-कुची नमी को भी सोख लिया है। कंक्रीट के जंगलों के कारण जब बारिश का पानी जमीन में समाने के बजाय तेज़ी से बहकर नालों में निकल जाता है, तो भूजल रिचार्ज नहीं हो पाता। यही वजह है कि पारा चढ़ते ही हमारे नलकूप हांफने लगते हैं, क्योंकि नीचे प्रकृति का ‘वाटर बैंक’ खाली हो चुका होता है।

व्यर्थ बहता अमृत और सिकुड़ती नदियां:एक ओर लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हमारी लापरवाही स्थिति को और विकराल बना रही है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़े बताते हैं कि भारत में शहरी सप्लाई का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा पाइपलाइन लीकेज, अव्यवस्थित वितरण और अनियंत्रित बर्बादी में नष्ट हो जाता है। गाड़ियों को घंटों पाइप से धोना, सड़कों पर अनावश्यक छिड़काव करना और घरों में खुले नलों से पानी बहने देनाये केवल खराब आदतें नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के हिस्से का जीवन छीनने जैसा अपराध हैं।जब तापमान बढ़ता है, तो जलाशयों से पानी उड़ने की रफ्तार 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। नदियां सिकुड़ रही हैं, बांध खाली हो रहे हैं और हमारी पूरी निर्भरता उस पाताल पर है, जिसे हम पहले ही सुखा चुके हैं।

जल संरक्षण अब विकल्प नहीं, राष्ट्रीय संस्कार बने:यह समस्या केवल सरकारों की नहीं, हम सबकी है। योजनाएं और नीतियां तब तक अधूरी रहेंगी, जब तक जल संरक्षण हमारी जीवनशैली का हिस्सा नहीं बनेगा।रेन वॉटर हार्वेस्टिंग अब कोई “अच्छा विकल्प” नहीं, बल्कि हर घर की नैतिक और कानूनी ज़रूरत बननी चाहिए। गांवों के पुराने तालाब, बावड़ियां और पारंपरिक जल स्रोत केवल इतिहास नहीं, बल्कि हमारा भविष्य बचाने के आखिरी उपाय हैं।हमें अपने बच्चों को सिखाना होगा कि पानी केवल नल से आने वाली कोई सुविधा नहीं, बल्कि प्रकृति का सबसे बड़ा कर्ज और आशीर्वाद है।

ठहरिए, सोचिए और जागिए:कल जब सुबह आप अपने घर का नल खोलें और उसमें पानी की धार दिखाई दे, तो उसे अपनी खुशकिस्मती समझिए। क्योंकि दुनिया में करोड़ों लोग ऐसे भी हैं, जिनके लिए एक बाल्टी पानी आज की सुबह का सबसे बड़ा संघर्ष है।अगर आज भी हमने पानी को केवल एक सुविधा समझा, जिम्मेदारी नहीं, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। तब इतिहास यह लिखेगा कि इंसान ने विकास की दौड़ में सब कुछ बचाने की कोशिश की सिवाय पानी के।

 

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