चैत्र नवरात्रि शक्ति उपासना का पर्व है, जो लोक और शास्त्र के समन्वय को दर्शाता है। यह उपवास, साधना और आत्मशुद्धि के माध्यम से जीवन में संतुलन और सकारात्मकता का संदेश देता है।
प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल
चैत्र की हलकी गर्म दोपहरियों में, में, जब हवा के थपेड़े किवाड़ों पर दस्तक देते हैं और प्रकृति एक अनजानी व्याकुलता से भरी होती है, मेरे घर के भौतर शांत जलती अखंड ज्योति केवल एक टिमटिमाते दीपक का भौतिक अस्तित्व नहीं रह जाती। वह तो दर्शनशास्त्र के उस चिति-शक्ति का मूर्त रूप बन जाती है, जो समस्त ब्रह्मांड को आलोकित किए हुए है। मुझे याद आता है बचपन का वह कोना, जहाँ कलश स्थापना के समय मिट्टी की वह सोंधी गंध पूरे घर में व्याप्त हो जाती थी। बाहर धूप तेज होती थी, लेकिन भीतर माँ के स्वर में गूंजती दुर्गा सप्तशती की त्रह्माएं एक शीतलता का संचार करती थीं। दार्शनिक दृष्टि से देखें तो नवरात्रि का यह नौ-दिवसीय अनुष्ठान 'माया' के आवरण को हटाकर सत्य के साक्षात्कार की एक लंबी और धैर्यपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा है। शास्वीय दर्शन का वह गहन सूत्र 'शक्तिः शक्तिमतीः अभेदः' जो कहता है कि शक्ति और शक्तिमान में कोई भेद नहीं है, लोक जीवन के आंगन में पहुँचकर एक अत्यंत सरल और सुलभ रूप धारण कर लेता है।
जब गाँव की कोई बूढ़ी काकी, जो मिट्टी के चूल्हे पर सात्विक भोजन बनाती है और उपवास के कठोर नियमों का पालन करती है, तो वह जाने अनजाने में ही अत्रपूर्णा के उस विराट दर्शन को जी रही है, जिसे समझने में बड़े-बड़े विद्वानों को दशकों लग जाते है। लोक-मानस में देवी कोई दूर आकाश में स्थित दुर्गम सत्ता नहीं है, बल्कि वह मईया है, वह कुलदेवी है और वह घर की देहरी पर उकेरी गई बेत अल्पना में साक्षात उपस्थिति है। दर्शन जहाँ निर्गुण-निराकार की अमूर्त चर्चाओं में उलझा रहता है, वहीं लोक उसे लाल चुनरी और सोने की नथ पहनाकर सगुण और आत्मीय बना देता है। यह सामंजस्य ही भारतीय संस्कृति की वह अमर आत्मा है जहाँ कठिन ब्रहम-ज्ञान और सहज लोक संस्कार मिलकर एक हो जाते हैं। प्रकृति, पुरुष और शून्य का अंतराल के उस 'प्रकृति-पुरुष' सिद्धांत का भी जीवंत उत्सव है, जो सृष्टि के सूजन का मूलाधार है। ऋतु-संधि का यह समय, जिसे दर्शन में दो अवस्थाओं के बीच का शून्य माना गया है, पुराने के अंत और नए के बीजारोपण का प्रतीक है। मेरे लिए यह समय केवल एक कैलेंडर का बदलाव नहीं, बल्कि स्वयं के नवीनीकरण का अवसर है। जहाँ दार्शनिक इसे आत्मा के उस संक्रांति काल के रूप में देखता है जहाँ साधक तमस (अंधकार) को पार कर सत्त्व (प्रकाश) की ओर बढ़ता है, वहीं लोक इसे नीम के पत्तों के कड़वे रस, पवित्र उपवास और रबी की फसल की कटाई के उल्लास में व्यक्त करता है। किसान के लिए उसके लहानहाते खेत ही देवी की वास्तविक सिद्धि है।
खलिहानों में सुनहरी गेहूँ की बालियों को देख क, उसमें 'कुष्मांडा' देवी का रूप दर्शन होता है, जिन्होंने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। शास्त्र और लोक का यह मेल कितना अद्भुत है। शास्त्र हमें सृष्टि की उत्पत्ति का सिद्धांत बताते हैं और लोक उस उत्पत्ति का उत्सव फसल काटकर मनाता है। नीम की कड़वाहट का सेवन करना जाहाँ एक ओर शरीर के शोधन की वैज्ञानिक प्रक्रिया है, वहीं दूसरी ओर यह दार्शनिक सत्य भी है कि जीवन के अमृत तक पहुँचने के लिए कड़वे अनुभवों का घूंट पीना अनिवार्य है। दुर्गा सप्तशती की कथाएँ केवल पौराणिक युद्ध की गाथा नहीं हैं, बल्कि वे हमारे अंतर्मन में निरंतर चलने वाले द्वंद्र का एक सूक्ष्म रूपक भी हैं। महिषासुर हमारे भीतर का वह जड़त्व, वह प्रमाद और वह अज्ञान है जो हमें चेतना के निचले स्तरों की ओर खींचता है। वह कभी क्रोध बनकर आता है, तो कभी लोभ बनकर। इसके विपरीत, देवी हमारी वह विवेक-शक्ति है जो दृढ़ संकल्प से उत्पन होती है। जब हम लोक उत्सवों में ढोल-नगाड़ों के साथ 'जय माता दी' का उद्घोष करते हैं, तो वह केवल बाहरी ध्वनि नहीं होती, बल्कि वह हमारे सामूहिक अवचेतन का वह गर्जन होता है जो भीतर दबे अवसाद और निराशा के राक्षसों को खदेड़ देता है।
शास्त्र जिसे असुर संहार कहकर महिमामंडित करते हैं, लोक उसे अत्यंत सरलता से अपने 'कष्ट निवारण' की प्रार्थना बना लेता है। चंडी पाठ की वह लयबद्ध गूँज जब वातावरण में फैलती है, तो ऐसा लगता है मानो ब्रह्मांड की सारी सकारात्मक ऊर्जा एक बिंदु पर केंद्रित हो रही हो। यह वह समय होता 卐 लांगकर असीमित शक्ति से जुड़ने का प्रयास करता है।
यह साधना हमें सिखाती है कि बुराई चाहे कितनी भी बलवान क्यों न हो, यदि संकल्प में पवित्रता है, तो विजय सुनिश्चित है। चैत्र नवरात्रि का चरमोत्कर्ष जब राम नवमी के रूप में प्रकट होता है, तब दर्शन अपनी शास्त्रीय गरिमा त्यागकर 'मर्यादा' और 'करुणा' का चोला पहनकर लोक के बीच उतर आता है। दार्शनिक सत्य यदि राम के जन्म को चित् या विशुद्ध चेतना का उदय मानता है, तो लोक सत्य उसे एक आदर्श पुत्र, एक त्यागी भाई और एक न्यायी राजा के प्राकट्य के रूप में पूजता है। नौ दिनों की कठोर शक्ति समाराधना के बाद राम का आगमन यह संदेश देता है कि शक्ति का अंतिम विनियोग मर्यादा और लोक-कल्याण में ही सार्थक है। मैं अक्सर सोचता हूँ कि राम और शक्ति का यह संबंध कितना गहरा है। बिना शक्ति के राम धर्म की रक्षा नहीं कर सकते और बिना विवेक (राम) के शक्ति चंडिका की तरह केवल विनाशकारी हो सकती है। यही वह बिंदु है जहाँ अध्यात्म, नीति और समाजशास्त्र एक ही सूत्र में पिरोए हुए नजर आते हैं। राम का चरित्र हमें सिखाता है कि शक्ति का उपयोग अहंकार के पोषण के लिए नहीं, बल्कि पीड़ितों के आँसू पोंछने के लिए होना चाहिए। चैत्र की वह दोपहर, जब मंदिरों में 'भये प्रगट कृपाला' का गान होता है, तो पूरा समाज एक अलौकिक समरसता में डूब जाता है।
कन्या पूजन के विधान में तो दर्शन का सारा अहंकार ही ढह जाता है। शास्व जिस 'अद्वैत' को पाने के लिए नेति नेति कहते थकते नहीं, वह कन्या पूजन के समय गली-मुहले की छोटी-छोटी बच्चियों के रूप में हमारे सामने साक्षात खड़ा होता है। जब एक प्रौढ़ व्यक्ति, जो पद और प्रतिष्छ के मद में चूर हो सकता है, एक नन्हीं कन्या के चरण पखारता है, तब वह भाव सिद्ध होता है जिसे पाने के लिए ऋषि युगों तक तपस्या करते हैं। यह लोक की ही देन है जो हमें सिखाती है कि उस विराट ब्रह्म को एक सूक्ष्म बालिका की निश्छल मुस्कान में कैसे देखा जाए। उन छोटी बच्चियों के पैरों में लगा महावर और उनके हाथों में दी गई दक्षिणा यह के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का एक सांस्कृतिक तरीका है। आज के समाज में जहाँ स्त्री के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए रहते हैं, वहाँ नवरात्रि का यह लोक-पक्ष हमें बार-बार सचेत करता है कि यदि हम अपनी बेटियों में देवी नहीं देख सकते, तो मंदिरों की मूर्तियों में उन्हें खोजना व्यर्थ है। नवरात्रि का उपवास मेरी दृष्टि में केवल अत्र का त्याग नहीं है, बल्कि यह स्वयं के 'केंद्र' की ओर लौटने की प्रक्रिया है। चैत्र की गर्मी में जब जठराग्नि तेज होती है, तब हरका और सात्विक भोजन करना शरीर को एक नई ऊर्जा से भर देता है। दर्शन की भाषा में इसे 'इंद्रिय निग्रह' कहा जाता है। जब हम अपनी भूख पर नियंत्रण पाते हैं, तो हम अपनी इच्छाओं पर भी नियंत्रण पाना सीखते हैं। फलाहार और कुहू की पूरियों से लोक ने उपवास को भी एक उत्सव का स्वाद दे दिया है।
उपवास की शारीरिक थकान जब नवमी के प्रसाद के स्वाद में बदलती है, तो वह स्वाद केवल जिल्हा का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पूर्णता का अनुभव होता है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में भोग और त्याग का संतुलन कैसे बनाया जाए। अंततः, चैत्र नवरात्रि हमें एक ऐसे धरातल पर खड़ा करती है जहाँ शास्त्र की जटिलता लोक की तरलता में विलीन हो जाती है। आम के बौर की मादक महक से भरी चैत्र की वह दोपहर हमें याद दिलाती है कि हम उसी महाशक्ति के अंश है जो निरंतर सुजनरत है। दर्शन हमें सोऽहम्, मैं वही हूँ की उच्चतम शिक्षा देता है और लोक हमें 'मईया की जय' कहना सिखाता है। नवरात्रि का यह अनुष्ठान समाप्त हो जाता है, पर उसकी गूंज पूरे वर्ष हमारे भीतर बनी रहनी चाहिए। यह पर्व हमें जड़ता से चेतनता की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और संकीर्णता से विराटता की ओर ले जाने वाला एक महामार्ग है। इन नौ रात्रियों के बाद जब हम दसवें दिन अपनी सामान्य दिनचर्या में लौटते हैं, तो हमारे भीतर एक नया मनुष्य जन्म लेना चाहिए-वह मनुष्य जो मर्यादा में राम जैसा हो और संकल्प में दुर्गा जैसा। इन दोनों के बीच ही जीवन का वह वासंतिक वसंत खिलता है, जो काल की सीमाओं से परे है और जो कभी मुरझाता नहीं है।