चैत्र नवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व, मां दुर्गा की उपासना, साधना विधि और इससे मिलने वाले फल के बारे में जानें विस्तार से।
श्रीराम माहेश्वरी
भारतीय संस्कृति में नवरात्रि भा पर्व का विशेष महत्व है। आध्यात्मिक दृष्टि से शक्ति का स्वरूप विशेष दिव्य और उदात्त है। शक्ति ही सृष्टि का सृजन करती है। मां जगत जननी ही सृष्टि का आदि कारण है।
यह शक्ति ही पराशक्ति है। इसके अनेक स्वरूप हैं। मां दुर्गा, काली, गायत्री, तारा, भुवनेश्वरी, बगला, षोडशी, धूमावती, त्रिपुरा, कमला, मातंगी तथा पद्मावती इन्हीं के रूप हैं। नवरात्रि के इन दिनों में श्री महालक्ष्मी, श्री मां सरस्वती, महिषासुरमर्दिनी, मां शैलपुत्री, मां ब्रह्मचारिणी, मां चंद्रघंटा, मां कुष्मांडा, मां स्कंदमाता, मां कात्यायनी, मां कालरात्रि, मां महागौरी तथा मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। साधक को पहले दिन स्नान आदि से पवित्र होकर पूजा का स्थानस्वच्छ कर लेना चाहिए। शुभ मुहूर्त में घटस्थापना करना चाहिए। नवरात्र व्रत स्त्री-पुरुष दोनों करते हैं। कई श्रद्धालु श्रद्धा अनुसार एक समय फलाहार करके व्रत रखते हैं। कुछ लोग पहले और अष्टमी के दिन व्रत रखते हैं।
शक्ति रहस्य : दुर्गा शक्तिस्वरुपा हैं। प्रकृति के तीन लक्षण हैं। प्र, क्र और ति, प्र का अर्थ प्रकृष्ट और कृति का अर्थ सृष्टि है, जो सृष्टि रचने की सामर्थ्य रखती है, वह प्रकृति है। प्र सत्व अक्षर, क्र रज तथा ति तम का प्रतीक है। इन तीन गुणों के कारण त्रिदेव सृष्टि की रचना करते हैं। मां भगवती जगत की उत्पत्ति, पालन तथा लय करती है। उपनिषद में उल्लेख है कि सृष्टि के आरंभ में एक ही देवी थी। उसने ही ब्रह्मांड उत्पन्न किया। यही देवी पराशक्ति है। प्राधानिक रहस्य में लिखा है कि ब्रह्मा-विष्णु और महेश अपनी तीनों शक्ति सरस्वती, लक्ष्मी और गौरी की सहायता से इस जगत का निर्माण, पालन और लय करते हैं।
देवी भागवत में लिखा है कि बिना शक्ति के आत्मदेव सृष्टि की रचना नहीं कर सकते। भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के समय कुरुक्षेत्र में अर्जुन को उपदेश किया कि विजय के लिए आप शक्ति की उपासना करो। मां दुर्गा की अर्जुन ने उपासना की। उन्हें रण में विजय मिली। महाभारत के भीष्म पर्व में इसका उल्लेख मिलता है।
शक्ति की उपासना का महत्व: दुर्गा सप्तशती का पाठ नियमित रूप से करने का विशेष महत्व है। पूर्ण श्रद्धा नियम ब्रह्मचर्य निष्ठा से यदि साधक नियमित पाठ करता है तो उसकी साधना अवश्य फलदायी होती है। किसी योग्य गुरु से दुर्गा सप्तशती की विधिपूर्वक दीक्षा लेना चाहिए। यदि ऐसा न हो सके तो किसी गुरु का मार्गदर्शन लेकर पाठ करना चाहिए। एक निश्चित अवधि में एक सहस्त्र पाठ स्वयं करना चाहिए। पाठ उपरांत दशांश होम, दशांश तर्पण, दशांश मार्जन तथा उसका दशांश ब्राह्मण भोजन करना चाहिए। इसके साथ ही नवार्ण मंत्र की दीक्षा और उपदेश ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार विधिपूर्वक अनुष्ठान किया जाए तो साधक को अभीष्ट फल की प्राप्ति हो सकेगी।
साधना से विचारों में रूपांतरण: देवी साधना नियमित रूप से करने पर साधक के विचारों का रूपांतरण होने लगता है। उसके मन में सत्य, अहिंसा, करुणा, दया तथा सबके प्रति समानता भाव जैसे गुणों का विकास होने लगता है। विनम्रता और सहनशीलता उसका आभूषण बन जाता है। भौतिक सुख सुविधा छोटी और क्षणिक लगते हैं। साधक के मन में संतोष का भाव आ जाता है। उसे एकांत प्रिय लगता है। ऐसा होना साधना की सफलता के लक्षण हैं। इससे स्पष्ट है कि कोई भी कार्य इच्छा, ज्ञान और क्रिया के बिना संपन्न नहीं हो सकता। व्यक्ति अपने आप में कुछ नहीं है। वह स्वयं को करता मानने लगता है। मां भगवती की कृपा से ही मनुष्य को सर्व सामर्थ्य मिलती है। साधक सच्चे मन से विधिपूर्वक माता की उपासना करता है तो उसे अवश्य अभीष्ट फल की प्राप्ति हो सकती है। मां का हृदय बहुत कोमल और उदार है। उनकी ममता निश्छल है। साधक को स्वयं को एक पुत्र की भांति साधना पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा से करना चाहिए। नियमित साधना उसे शिखर पर पहुंचा सकती है।