प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के बीच भाजपा नेताओं के आचरण पर उठे सवाल। संगठन में अनुशासन, सादगी और राजनीतिक शुचिता पर विशेष टिप्पणी।
अतुल तारे
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक युगधर्म के प्रति देश का आह्वान किया है। यह पहली बार किसी प्रधान मंत्री ने किया है, ऐसा नहीं है। आपात स्थिति में प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री ने भी किया और स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी। और यही, तब भी समय की माँग थी और आज भी है। पर, जब हम देश को आह्वान करते हैं तब स्वयं आह्वान करने वाले का दायित्व और बढ़ जाता है। कारण, उनके अपने दल पर सभी की निगाहें स्वाभाविक होती हैं।
एक निगम-मंडल का अध्यक्ष बनना, व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा का अपूर्व उत्सव हो सकता है, पर इसके लिए जो फूहड़ प्रदर्शन का दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंग देश ने देखा, उस आह्वान पर ही अनावश्यक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। वहीं, भाजपा के पास भूषण भी है, आज यह भी राजधानी की सड़कों ने देखा। शुचिता के प्रदर्शन की एक शालीन परंपरा मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने पहले दिन से एक उदाहरण के साथ रखी है। वह विधायक भी हैं। पर सरकारी आवास और सरकारी गाड़ी और अन्य तामझाम से परहेज रखतें हैं और इसका प्रचार भी नहीं करते। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का अपना परिवार शासकीय सुविधाओं से दूर है।
स्वयं प्रधानमंत्री ने अपनी विदेश यात्राओं को कितने किफायत के साथ किया है, इसके आंकड़ें उपलब्ध हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह दर्शाया है कि राजा को योगी ही होना चाहिए। छत्तीसगगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भी शुचिता का उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसी तरह भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी समय-समय पर उदाहरण प्रस्तुत किए हैं।
पर इस तरह के दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंग कहीं न कहीं करनी और कथनी के अंतर को दर्शाते हैं। भाजपा के कतिपय वरिष्ठ नेताओं के सुपुत्रों (?) ने अपने पिता के राजनीतिक ठसक की दम पर कहीं टोल पर उत्पात मचाया तो कहीं राजधानी की सड़कों पर बंदूके लहराकर फायर भी करने का घिनौना काम किया। किसी ने देव दर्शन में स्वयं को ईश्वर से बड़ा साबित करने का दुस्साहस किया। तो कइयों ने अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के बजाय जमीनों के अवैध कब्जे का पुरुषार्थ? दिखाया। इसलिए, सौभाग्य सिंह का यह पहला पराक्रम नहीं है। भाजपा में मंडल अध्यक्ष से लेकर अन्य पद के पदभार ग्रहण में भी यह फूहड़ता पूरी निर्लज्जता के साथ एक परंपरा बन चुकी है। सड़कों पर जाम, होर्डिंग्स से शहर को बदरंग करने की होड़ सी बन गई है।
प्रधानमंत्री जिस नागरिक बोध की बात कर रहे हैं, उसकी स्वाभाविक अपेक्षा स्वयं भाजपा से तो प्राथमिक तौर पर तो बनती ही है। किसी राज्य में भाजपा की विजय और मुख्यमंत्री का पद ग्रहण समारोह। राजनीतिक संदेश के लिए दर्जनों मुख्यमंत्री का शपथ विधि में पहुंचना आवश्यक हो सकता है, पर जब देश में पेट्रोल, डीजल का संकट हो तो क्या यह आवश्यक है?
कार पूल के साथ, प्रधानमंत्री ने जो-जो सुझाव दिए उन पर देश को अमल में लाना ही एक राष्ट्रीय कर्तव्य है, पर उसके पहले सरकार और संगठन के स्तर पर सामूहिक उदाहरण आग्रह पूर्वक प्रस्तुत करने होंगे।
अन्यथा, विपक्ष जिसके पास आज न तो नैतिक बल है न ही कोई दिशा बोध वह देश हित के प्रत्येक आह्वान पर प्रलाप करने का प्रयास करेंगे। देशवासी परिपक्व हैं, उन पर इसका कोई असर नहीं होता, पर भाजपा को और अधिक संवेदनशील और परिपक्व होना होगा। नेतृत्व को भी चाहिए कि ऐसे सभी सौभाग्यशाली (?) नेताओं पर तत्काल कार्यवाही कर एक कठोर संदेश दें।
वहीं, प्रयास करें कि भाजपा में भूषणों की श्रृंखला और बढ़े, ताकि पार्टी, सही अर्थों में 'पार्टी विथ डिफरेंट' दिखे।