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भारत में ब्रेन ड्रेन और ब्रेन गेन

'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' और भारत की चमक

भारतीय प्रतिभाओं के विदेश जाने की घटनाएँ और उनकी वापसी का विश्लेषण। वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका पर चर्चा।


 रिवर्स ब्रेन ड्रेन और भारत की चमक

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आलोक मेहता

आजकल इस बात की चर्चा कभी सराहना के रूप में होती है, तो कभी आलोचना के रूप में कि क्या भारत छोड़कर विदेश जाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह प्रश्न आज संसद से लेकर विश्वविद्यालयों, उद्योग जगत और आम नागरिकों तक चर्चा का विषय है। पिछले कुछ वर्षों में एक और तथ्य ने इस बहस को तेज किया है। हर वर्ष दो लाख से अधिक भारतीय अपनी नागरिकता त्यागकर अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी तथा अन्य देशों की नागरिकता ग्रहण कर रहे हैं। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि भारत से प्रतिभा पलायन (बेन ड्रेन) लगातार बढ़ रहा है, अथवा यह कि अवसर, योग्यता और भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा से प्रभावित होकर दुनिया के अनेक देश भारतीय प्रतिभाओं का स्वागत करने को उत्सुक है? इतना ही नहीं, विदेशों में रहने वाले भारतीय अपनी आय और बचत का बड़ा हिस्सा परिवारों तथा भारत में निवेश के लिए भेजते हैं। इसलिए इस प्रश्न का उत्तर केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों, आँकड़ों और बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में खोजा जाना चाहिए.

विदेश मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011 से 2024 के बीच 20.6 लाख से अधिक भारतीयों ने भारतीय नागरिकता का त्याग किया। केवल 2022, 2023 और 2024 में ही यह संख्या लगातार दो लाख से अधिक प्रति वर्ष रही। 2024 में 2,06,378 भारतीयों ने नागरिकता छोड़ी, जबकि 2023 में यह संख्या 2,16,219 और 2022 में 2,25,620 थी। लगभग 140 करोड़ की आबादी वाले देश के संदर्भ में यह संख्या बहुत बड़ी नहीं कही जा सकती। हालाँकि इन आँकड़ों को समझते समय एक महत्वपूर्ण तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि इनमें अधिकांश वे लोग हैं जो कई वर्ष पहले छात्र, इंजीनियर, डॉक्टर, शोधकर्ता, उद्यमी या अन्य पेशेवर के रूप में विदेश गए थे और वहाँ स्थायी निवास प्राप्त करने के बाद नागरिकता के पात्र बने। इसलिए नागरिकता त्याग का आंकड़ा उसी वर्ष भारत छोड़कर जाने वालों की संख्या का प्रत्यक्ष संकेतक नहीं है।

भारत सरकार के देशवार आँकड़ों और विभिन्न देशों के आधिकारिक अभिलेखों से स्पष्ट है कि भारतीय मुख्यतः अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, नीदरलैंड, फ्रांस और इटली की नागरिकता ग्रहण कर रहे हैं। इन देशों में भारतीय समुदाय पहले से स्थापित है तथा उच्च शिक्षा, चिकित्सा, सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त, अनुसंधान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में व्यापक अवसर उपलब्ध है।

लोकप्रिय धारणा यह है कि लोग केवल अधिक शक्तिशाली पासपोर्ट पाने के लिए भारतीय नागरिकता छोड़ते हैं, किंतु यह पूरी सच्चाई नहीं है। इसके पीछे अनेक कारण हैं। पहला, स्थायी जीवन और रोजगार की सुरक्षा। दूसरा, बच्चों का भविष्य, क्योंकि विदेशी नागरिक बनने पर उन्हें स्थानीय विश्वविद्यालयों में कम शुल्क, छात्रवृत्ति तथा रोजगार के बेहतर अवसर मिलते हैं। तीसरा, सामाजिक सुरक्षा, जिसमें पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, बेरोजगारी सहायता और वृद्धावस्था सुरक्षा जैसी सुविधाएँ शामिल है। चौधा, वैश्विक स्तर पर रोजगार के अधिक अवसर।

भारत पूर्ण दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं देता। इसलिए जब कोई भारतीय किसी दूसरे देश की नागरिकता ग्रहण करता है, तो उसे भारतीय नागरिकता त्यागनी पड़ती है। विदेश मंत्रालय के अनुसार विश्व में 3.5 करोड़ से अधिक भारतीय मूल के लोग और अनिवासी भारतीय रहते हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है। यह समुदाय केवल रेमिटेंस ही नहीं भेजता, बल्कि निवेश, तकनीक, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और भारत की वैश्विक छवि को भी सुदृढ़ करता है। इनकी उल्लेखनीय उपस्थिति अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, सिंगापुर, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस, फिजी तथा यूरोप के अनेक देशों में है। विश्व बैंक के अनुसार भारत कई वर्षों से दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है। विदेशों में रहने वाले भारतीय हर वर्ष 100 अरब डॉलर से अधिक की धनराशि भारत भेजते हैं। अनेक वर्षों में यह राशि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के बराबर या उससे भी अधिक रही है। यह धन केवल परिवारों के खर्च तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, कृषि, लघु उद्योग, सेवा क्षेत्र और स्थानीय अर्थव्यवस्था में निवेश के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। केरल, पंजाब, गुजरात, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों की अर्थव्यवस्था में इसका विशेष योगदान है।

भारत अब 'ब्रेन ड्रेन' की पुरानी बहस से आगे बढ़कर 'ब्रेन गेन' और 'ब्रेन नेटवर्क' का वैश्विक उदाहरण बन सकता है। भारतीय नागरिकता त्यागने वालों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय अवश्य हो सकती है, लेकिन इसे केवल नकारात्मक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। वैश्वीकरण के इस दौर में प्रतिभा सीमाओं में बँधी नहीं रहती। आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल अपने युवाओं को रोकना नहीं, बल्कि दुनिया भर में फैली भारतीय प्रतिभा को राष्ट्र निर्माण से जोड़ना है। यदि 2047 तक विकसित भारत का सपना साकार करना है, तो विदेशों में बसे भारतीयों को 'खोई हुई प्रतिभा' नहीं, बल्कि 'वैश्विक भारतीय शक्ति' के रूप में देखना होगा। यही दृष्टिकोण भारत को ज्ञान, पूँजी, नवाचार और वैश्विक प्रभाव इन चारों क्षेत्रों में नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है।

बीसवीं शताब्दी में जब भारतीय वैज्ञानिक, डॉक्टर और इंजीनियर स्थायी रूप से विदेशों में बस जाते थे, तब इसे 'ब्रेन ड्रेन' कहा जाता था। आज स्थिति बदल चुकी है। अमेरिका की सिलिकॉन वैली, लंदन, सिंगापुर, टोरंटो, सिडनी और बर्लिन में बसे भारतीय केवल विदेशी अर्थव्यवस्थाओं का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे भारत में निवेश कर रहे हैं, स्टार्टअप स्थापित कर रहे हैं, विश्वविद्यालयों के साथ शोध सहयोग बढ़ रहे हैं, भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजारों से जोड़ रहे हैं और हर वर्ष बड़ी मात्रा में धन भारत भेज रहे हैं। विश्व बैंक के अनुसार 2024 में भारत को लगभग 135 अरब अमेरिकी डॉलर का रेमिटेंस प्राप्त हुआ। यह धन करोड़ों भारतीय परिवारों, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और छोटे व्यवसायों के लिए महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है।

बदलते समय में एक नई प्रवृत्ति भी उभरकर सामने आई है। अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका तथा कई एशियाई देशों में कार्यरत अनेक भारतीय अब वापस लौटकर भारत में नए उद्यम और व्यवसाय स्थापित कर रहे हैं। यहाँ उन्हें परिवार के साथ आधुनिक जीवन-सुविधाएँ, बेहतर अवसंरचना, विश्वस्तरीय हवाई अड्डे, आधुनिक रेल सेवाएँ, विकसित नगर और व्यापार के अनुकूल वातावरण उपलब्ध हो रहा है।

पिछले दो वर्षों में ब्रिटेन, कनाडा और कुछ अन्य देशों में आव्रजन नियम कड़े हुए हैं। ब्रिटेन में छात्र वीजा नियमों में बदलाव, आश्रितों पर प्रतिबंध, रोजगार बाजार में मंदी और बढ़ती जीवन-यापन लागत के कारण बड़ी संख्या में भारतीय छात्र और पेशेवर अन्य विकल्प तलाशने लगे हैं। इसी प्रकार कनाडा ने भी अस्थायी निवास और छात्र वीजा संबंधी नियमों को अधिक कठोर बनाया है।

यह भी उतना ही सत्य है कि पिछले दशक में भारत की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) का प्रमुख केंद्र बन चुका है तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में बड़े निवेश आकर्षित कर रहा है। आधार, यूपीआई, ओएनडीसी और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने भारत को वैश्विक नवाचार का एक सफल मॉडल बना दिया है।

इसी कारण विदेशों में कार्यरत अनेक भारतीय विशेषज्ञ भारत में निवेश कर रहे हैं अथवा परियोजना-आधारित कार्यों के लिए लौट रहे हैं। यद्यपि इसकी आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है, फिर भी उद्योग जगत में 'ब्रेन सर्कुलेशन' अर्थात प्रतिभा के वैश्विक आवागमन की चर्चा निरंतर बढ़ रही है।

गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन, एप्पल, जेपी मॉर्गन, गोल्डमैन सैक्स, डेलॉइट, एरिक्सन, बोइंग, एयरबस, मर्सिडीज-बेंज और बीएमडब्ल्यू जैसी अनेक वैश्विक कंपनियों ने भारत में अपने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर स्थापित किए हैं। आज बेंगलुरु, हैदरावाद, पुणे, गुरुग्राम, नोएडा और चेन्नई विश्वस्तरीय अनुसंधान एवं इंजीनियरिंग केंद्र बन चुके हैं। इन केंद्रों में विदेशों में कार्य कर चुके भारतीय विशेषज्ञों की माँग लगातार बढ़ रही है।

भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन और चिप डिजाइन के क्षेत्र में बड़े निवेश आरंभ हो चुके हैं। इन क्षेत्रों में ताइवान, अमेरिका और यूरोप में कार्यरत भारतीय विशेषज्ञों के लिए आकर्षक अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। रक्षा उत्पादन, ड्रोन, मिसाइल, उपग्रह, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और निजी अंतरिक्ष उद्योग के विस्तार ने भी उच्च कौशल वाले भारतीय इंजीनियरों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। यूपीआई, आधार, डिजिटल भुगतान, ई-गवर्नेस और ओएनडीसी जैसी व्यवस्थाओं ने भारत को विश्व का एक अनूठा डिजिटल बाजार बना दिया है। विदेशी कंपनियाँ अब भारत को केवल 'आउटसोर्सिंग सेंटर' नहीं, बल्कि 'नवाचार केंद्र' के रूप में देखने लगी हैं।

कुछ विशेषज्ञ इस प्रवृत्ति को 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' कहते हैं, किंतु अधिक उपयुक्त शब्द है-'ब्रेन सर्कुलेशन, अर्थात प्रतिभा का वैश्विक आवागमन। यही वह नई वास्तविकता है, जो भारत को वैश्विक ज्ञान-आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ा रही है।




 

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