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भारत-अफगानिस्तान की मजबूत दोस्ती

बारूद बनाम भरोसा: पाकिस्तान-अफगानिस्तान संघर्ष के बीच भारत-अफगानिस्तान की अटूट दोस्ती

पाकिस्तान-अफगानिस्तान में तनाव के बीच, भारत ने अफगानिस्तान के साथ अपने सांस्कृतिक, विकास और क्रिकेट के माध्यम से मजबूत संबंधों को बरकरार रखा है।


बारूद बनाम भरोसा पाकिस्तान-अफगानिस्तान संघर्ष के बीच भारत-अफगानिस्तान की अटूट दोस्ती

AI इमेज |

अनुराग तागड़े

दक्षिण एशिया एक बार फिर अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। 28-29 जून 2026 की रात पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के पक्तिका और कुनार प्रांतों में बड़े पैमाने पर हवाई और जमीनी सैन्य अभियान चलाया। इस्लामाबाद का दावा है कि उसने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और जमात-उल-अहरार के ठिकानों को निशाना बनाकर 29 आतंकवादियों को मार गिराया। दूसरी ओर तालिबान सरकार का आरोप है कि इन हमलों में 36 से अधिक निर्दोष नागरिकों, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं, की मौत हुई तथा 160 से अधिक लोग घायल हुए। संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (UNAMA) ने भी नागरिक हताहतों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।

यह केवल एक सीमा संघर्ष नहीं है। यह उस रिश्ते का परिणाम है जो पिछले पाँच वर्षों में लगातार अविश्वास, आतंकवाद और रणनीतिक विफलताओं के कारण टूटता चला गया। जिस तालिबान सरकार को वर्ष 2021 में पाकिस्तान अपनी सबसे बड़ी सामरिक सफलता मान रहा था, वही आज उसके लिए सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती बन चुकी है।

2021 के बाद क्यों बिगड़ गए रिश्ते?

अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद पाकिस्तान को उम्मीद थी कि काबुल उसकी सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता देगा और टीटीपी पर कठोर कार्रवाई करेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान लगातार आरोप लगाता रहा कि टीटीपी के लड़ाके अफगानिस्तान की सीमा के भीतर सुरक्षित ठिकानों से पाकिस्तान में आतंकी हमले कर रहे हैं। तालिबान सरकार इन आरोपों को निराधार बताती रही।

दूसरा बड़ा विवाद ड्यूरंड रेखा है। 2,600 किलोमीटर लंबी यह सीमा पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जबकि अफगानिस्तान इसे कभी औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं करता। पाकिस्तान द्वारा सीमा पर बाड़ लगाने और सैन्य चौकियां बनाने का तालिबान लगातार विरोध करता रहा है। यही कारण है कि सीमा पर छोटी-छोटी झड़पें अब बड़े सैन्य संघर्ष का रूप ले चुकी हैं।

युद्ध जैसी स्थिति तक पहुंचा विवाद

फरवरी 2026 से दोनों देशों के बीच लगातार सैन्य कार्रवाई चल रही है। पाकिस्तान ने कई बार अफगान क्षेत्र में हवाई हमले किए, जबकि तालिबान ने भी जवाबी गोलाबारी और सीमा चौकियों पर हमले किए। मार्च में सऊदी अरब, कतर, तुर्किये और चीन की मध्यस्थता से अस्थायी युद्धविराम हुआ, लेकिन कुछ ही दिनों में वह भी टूट गया। आज दोनों देशों ने एक-दूसरे के राजनयिकों को तलब कर दिया है और सीमाएं लगभग बंद जैसी स्थिति में हैं। विशेषज्ञ इसे दोनों देशों के बीच "लगभग युद्ध" की स्थिति मान रहे हैं।

चीन की मध्यस्थता क्यों हुई विफल?

चीन ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच संवाद कायम रखने की कई कोशिशें कीं। उसका उद्देश्य केवल क्षेत्रीय शांति नहीं, बल्कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की सुरक्षा और मध्य एशिया तक अपनी आर्थिक पहुंच को सुरक्षित रखना भी है। लेकिन टीटीपी, ड्यूरंड रेखा और सीमा सुरक्षा को लेकर दोनों देशों की सोच में इतना गहरा मतभेद है कि बीजिंग की कूटनीतिक पहल भी स्थायी समाधान नहीं दे सकी। हालिया हमलों ने साबित कर दिया कि मध्यस्थता से अधिक मजबूत दोनों देशों का अविश्वास है।

भारत और अफगानिस्तान: भरोसे की साझेदारी

जहां पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्ते बारूद की गंध से भर गए हैं, वहीं भारत और अफगानिस्तान का संबंध विश्वास, विकास और सांस्कृतिक निकटता पर आधारित है। भारत और अफगानिस्तान के संबंध हजारों वर्ष पुराने हैं। गांधार सभ्यता, बौद्ध विरासत, सूफी परंपरा और प्राचीन व्यापार मार्ग दोनों देशों को ऐतिहासिक रूप से जोड़ते हैं। आधुनिक दौर में भी भारत ने अफगानिस्तान में संसद भवन, अफगान-भारत मैत्री बांध (सलमा डैम), जरांज-देलाराम राजमार्ग, विद्युत परियोजनाओं, अस्पतालों और विद्यालयों के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसी कारण सत्ता परिवर्तन के बावजूद अफगान जनता में भारत के प्रति सकारात्मक भावना बनी हुई है।

क्रिकेट बना सबसे मजबूत सेतु

भारत और अफगानिस्तान की मित्रता का सबसे लोकप्रिय प्रतीक क्रिकेट है। अफगानिस्तान की राष्ट्रीय टीम ने वर्षों तक भारत में अपने घरेलू मुकाबले खेले। भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने प्रशिक्षण सुविधाएं, मैदान और प्रतियोगिताओं का मंच उपलब्ध कराया।आज राशिद खान, मोहम्मद नबी, रहमानुल्लाह गुरबाज, नवीन-उल-हक जैसे अफगान खिलाड़ी भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के चहेते हैं। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) ने दोनों देशों के खिलाड़ियों और लोगों के बीच भावनात्मक संबंध और मजबूत किए हैं। क्रिकेट ने वह काम किया जो राजनीति अक्सर नहीं कर पाती दो देशों के लोगों को दिल से जोड़ दिया।

भारत का स्पष्ट संदेश

ताजा घटनाक्रम के बाद भारत ने पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई की आलोचना करते हुए इसे अफगानिस्तान की संप्रभुता पर हमला बताया। भारत ने कहा कि किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान होना चाहिए तथा आतंकवाद के नाम पर दूसरे देश की सीमा का उल्लंघन क्षेत्रीय शांति के लिए खतरनाक है। यह बयान बताता है कि भारत आज भी अफगानिस्तान के साथ सम्मान और साझेदारी की नीति पर कायम है।

भारत के लिए क्या हैं अवसर?

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर बढ़ता संकट भारत के लिए सामरिक अवसर भी लेकर आया है। भारत यदि मानवीय सहायता, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और संपर्क परियोजनाओं के माध्यम से अफगानिस्तान के साथ सहयोग बढ़ाता है तो मध्य एशिया तक उसकी रणनीतिक पहुंच और मजबूत हो सकती है। भारत की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसने कभी अफगानिस्तान को अपने भू-राजनीतिक खेल का मोहरा नहीं बनाया, बल्कि हमेशा अफगान जनता के साथ विकास साझेदार के रूप में खड़ा रहा।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच मौजूदा संघर्ष केवल सीमा विवाद नहीं, बल्कि असफल सुरक्षा रणनीति, आतंकवाद और गहरे अविश्वास का परिणाम है। दूसरी ओर भारत और अफगानिस्तान का रिश्ता हथियारों से नहीं, बल्कि संस्कृति, शिक्षा, विकास, मानवीय सहायता और क्रिकेट जैसे साझा मूल्यों पर टिका है।दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति में यही सबसे बड़ा अंतर है एक ओर बारूद की राजनीति है, दूसरी ओर भरोसे की कूटनीति। आने वाले वर्षों में यही भरोसा भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक पूंजी साबित हो सकता है।

 

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