आम आदमी पार्टी में बड़ा राजनीतिक संकट सामने आया है। राघव चड्ढा और अन्य नेताओं के कथित भाजपा में जाने की चर्चा से AAP की आंतरिक राजनीति और नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठे हैं।
अव तक तो अरविंद अ केजरीवाल ही लोगों को आम आदमी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा देते थे। इसकी शुरुआत संस्थापक सदस्य योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने के साथ हुई थी। इनके अलावा और भी कई नाम है जो या तो पार्टी से हटा दिए गए या फिर मजबूर होकर अपना अलग रास्ता चुन लिया, लेकिन राज्यसभा के दस सांसदों में से सात का एक साथ पार्टी छोड देना कोई आम बात नहीं है। भारतीय राजनीति में 24 अप्रैल का दिन आम आदमी पार्टी (आप) के लिए किसी काले अध्याय से कम नहीं रहा। इस दिन पार्टी के युवा चेहरे राघव चड्ढा सहित संदीप पाठक और अशोक मितल ने आप की झाडू छोड़कर भाजपा का कमल थाम लिया।
चड्ढा ने यह भी दावा किया है कि दस में से सात सांसद उनके साथ हैं जो तकनीकी रूप से दल बदल कानून से बचने के लिए काफी है। यानी राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के कुनबे का पूरी तरह बिखर जाना तय है। राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो कहा। उसने पार्टी की नैतिकता की जड़ों को हिलाकर रख दिया। उन्होंने कहा कि जिस पार्टी को उन्होंने 15 साल तक खून-पसीने से सींचा। वह अब अपने मूल मार्ग से भटक चुकी है। चड्ढा का यह कहना कि आप अब देशहित के बजाय निजी फायदों के लिए काम कर रही है जी सीधे तौर पर केजरीवाल के नेतृत्व पर है हमला है। चड्ढा ने खुद को गलत पार्टी सही व्यक्त्ति' बताया जो यह संकेत देता कि पार्टी के भीतर लंबे समय से सब कुछ ठीक नहीं था।
चड्ढा जैसे कद्दावर नेता का यह बयान उन लाखों कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ सकता है जो ईमानदारी के नाम पर पार्टी से जुड़े थे। राघव का पार्टी छोड़ना सिर्फ एक नेता की नाराजगी नहीं, बल्कि यह एक सुनियोजित, चरणबद्ध राजनीतिक ऑपरेशन की इनसाइड स्टोरी है। जिसने न सिर्फ आम आदमी पार्टी की अंदरूनी राजनीति को हिला दिया, बल्कि केजरीवाल की नेतृत्व क्षमता पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। इसकी शुरुआत अप्रैल 2026 से हुई थी। इसी दिन पार्टी ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने आगे चलकर इस पूरे घटनाक्रम को जन्म दिया। राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से हटा दिया जो पार्टी के भीतर चिंगारी साबित 2 हुआ।
राघव उन चेहरों में से थे, जिन्हें आप ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रोजेक्ट किया था। ऐसे में अचानक उन्हें उपनेता पद से हटाना पार्टी में असंतोष का कारण बना। यह वही क्षण था, जब बगावत की पहली आधिकारिक नींव रखी गई। राघव चड्द्धा के करीबियों में है में यह बात साफ थी कि यह सिर्फ शुरुआत आगे कुछ बड़ा होने वाला है। राज्यसभा उपनेता की कुर्सी जाने के बाद राघव चड्ढा ने खुद को पीड़ित की तरह पेश करने के बजाय रणनीतिक मोर्चाबंदी शुरू की। उन्होंने संगठन के अंदर उस धूरी को पकड़ा जो पहले से ही पार्टी के कुछ फैसलों से असंतुष्ट थी। यहां एक अहम नाम आता है डॉ. संदीप पाठक का। पार्टी संगठन के मास्टरमाइंड माने जाने वाले पाठक खासकर चुनावी रणनीति और संसदीय प्रबंधन में बेहद प्रभावशाली माने जाते थे।
राघव चड्ढा ने उनके साथ तालमेल बैठाया और पंजाब के अन्य प्रभावशाली सांसदों जैसे हरभजन सिंह, अशोक मित्तल आदि से बातचीत आगे बढ़ाई। धीरे-धीरे यह सिर्फ व्यक्तिगत नाराजगी नहीं रही, बल्कि एक संगठित गुट के रूप में आकार लेने लगी। इस गुट ने पार्टी के भीतर पहले से चल रहे मतभेदों को अपनी ढाल बनाया। पंजाब इकाई में हरपाल चीमा और अमन अरोड़ा जैसे नेताओं के साथ चल रहे टकराव और असहमति को बारीकी से इस्तेमाल किया गया। अंदर ही अंदर यह साबित किया गया कि दिल्ली नेतृत्व पंजाब की राजनीति और नेतृत्व पर भरोसा नहीं करता और फैसले बिना स्थानीय नेतृत्व से सलाह लिए थोपे जा रहे है। राघव और उनके साथियों ने इन्हीं दरारों को चौड़ा करने का काम किया। इसकी परिणिति यह रही कि आप के सात राज्यसभा सांसद भाजपा के साथ चले गए।