मंदिर में परिक्रमा करने की परंपरा का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। जानिए सही दिशा, परिक्रमा की संख्या, नियम और वह मंत्र जिसे परिक्रमा करते समय जपना चाहिए।
हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के दौरान परिक्रमा या प्रदक्षिणा करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। मंदिरों में भक्त भगवान की मूर्ति या गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। इसे केवल धार्मिक कर्म नहीं बल्कि आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
परिक्रमा का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व
भोपाल निवासी ज्योतिषाचार्य पं. हितेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार शास्त्रों में परिक्रमा को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि प्रदक्षिणा करने से व्यक्ति के जाने-अनजाने पाप नष्ट होते हैं और जीवन में शुभ फल प्राप्त होते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो मंदिर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। परिक्रमा के दौरान व्यक्ति उस ऊर्जा क्षेत्र के संपर्क में आता है, जिससे मानसिक शांति मिलती है और नकारात्मक विचार कम होते हैं।
सही दिशा में करें परिक्रमा
परिक्रमा हमेशा दाहिने हाथ की ओर से शुरू करनी चाहिए। इसे प्रदक्षिणा भी कहा जाता है। दाहिनी दिशा से घूमने की परंपरा को शुभ माना गया है और यह ऊर्जा संतुलन से जुड़ा हुआ माना जाता है।
अलग-अलग देवताओं की परिक्रमा संख्या
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विभिन्न देवताओं के लिए परिक्रमा की संख्या अलग-अलग बताई गई है—
- सूर्य देव: 7 परिक्रमा
- श्री गणेश: 3 परिक्रमा
- भगवान विष्णु और उनके अवतार: 4 परिक्रमा
- देवी दुर्गा: 1 परिक्रमा
- हनुमान जी: 3 परिक्रमा
- शिव जी: आधी परिक्रमा
- पीपल वृक्ष: 7 या 108 परिक्रमा
शिव मंदिर में केवल आधी परिक्रमा करने का नियम है क्योंकि शिवलिंग की जलधारी को पार करना निषेध माना गया है।
परिक्रमा करते समय जपने वाला मंत्र
शास्त्रों में प्रदक्षिणा के दौरान एक विशेष मंत्र का उल्लेख मिलता है
यानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे-पदे।।
इस मंत्र का अर्थ है कि जीवन में किए गए सभी पाप परिक्रमा के साथ नष्ट हो जाएं और व्यक्ति का मन शुद्ध होकर सही मार्ग की ओर अग्रसर हो। अब जान लीजिए परिक्रमा करने का सही तरीका
- परिक्रमा हमेशा श्रद्धा और ध्यान के साथ करनी चाहिए
- चलते समय भगवान के नाम का स्मरण करते रहें
- मंदिर में उपलब्ध स्थान के अनुसार गोल घूमकर या निर्धारित मार्ग से परिक्रमा करें
- जल्दबाजी से बचें और शांत मन से परिक्रमा करें
- यह केवल शारीरिक क्रिया नहीं बल्कि ध्यान और भक्ति का अभ्यास भी है
पं. हितेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार परिक्रमा की परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आत्मिक शुद्धि से भी जुड़ी हुई है। सही विधि और श्रद्धा के साथ की गई परिक्रमा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।