हरिद्वार में अर्धकुंभ 2027 से पहले मीट बैन पर संत समाज का समर्थन। अयोध्या के संतों ने देशभर के धार्मिक स्थलों पर भी प्रतिबंध लागू करने की मांग उठाई।
अर्धकुंभ 2027 की तैयारियों के बीच हरिद्वार में मीट की दुकानों पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर संत समाज का समर्थन सामने आया है। इस फैसले के बाद अब देशभर के धार्मिक स्थलों पर भी ऐसे ही प्रतिबंध लागू करने की मांग तेज हो गई है। राज्य सरकार के इस निर्णय का अयोध्या के संतों ने स्वागत करते हुए कहा है कि धार्मिक स्थलों की पवित्रता बनाए रखने के लिए ऐसे कदम जरूरी हैं।
अयोध्या के संतों का समर्थन
अयोध्या के संत सुमित दासजी महाराज ने कहा कि इस तरह के नियमों की मांग लंबे समय से की जा रही थी। उन्होंने बताया कि अयोध्या के 14 कोसी परिक्रमा क्षेत्र में पहले से ही मांस और शराब की दुकानों पर रोक है। उनके अनुसार, धार्मिक स्थलों के आसपास का वातावरण पूरी तरह शांत और पवित्र होना चाहिए, ताकि श्रद्धालु बिना किसी बाधा के पूजा-पाठ कर सकें।
देशभर में लागू करने की उठी मांग
आचार्य हरीश दास जी महाराज ने हरिद्वार के फैसले का स्वागत करते हुए इसे पूरे देश में लागू करने की मांग की। उन्होंने कहा कि जहां-जहां सनातन धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थल और पवित्र नदियां हैं, वहां इस तरह के प्रतिबंध जरूरी हैं। इसी कड़ी में संत वरुण दास जी महाराज ने कहा कि हरिद्वार की पहचान गंगा नगरी के रूप में है, और यहां की पवित्रता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। ऐसे कदम समाज में सकारात्मक संदेश देते हैं और धार्मिक भावनाओं को मजबूत करते हैं। महंत सीताराम दास ने भी इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि हरिद्वार मोक्षदायिनी नगरी है, जहां लोग आत्मिक शांति के लिए आते हैं। ऐसे में मांस और शराब की दुकानों का होना उचित नहीं है।
धार्मिक आयोजनों में पवित्रता पर जोर
आचार्य अयोध्या प्रसाद शास्त्री ने कहा कि अर्धकुंभ के दौरान बड़ी संख्या में साधु-संत और श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। वे यज्ञ, तप, अनुष्ठान और व्रत जैसे धार्मिक कार्यों में संलग्न रहते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में वातावरण की शुद्धता बेहद जरूरी होती है, और इस प्रकार के प्रतिबंध उसी दिशा में उठाया गया कदम है।
क्या है अर्धकुंभ का महत्व
अर्धकुंभ एक महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है, जो हर छह साल में आयोजित होता है। यह मुख्य रूप से प्रयागराज और हरिद्वार में होता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि इस पवित्र स्नान से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। कुंभ और अर्धकुंभ की परंपरा का संबंध पौराणिक समुद्र मंथन से जुड़ा माना जाता है, जिसके अनुसार अमृत की बूंदें जिन स्थानों पर गिरीं, वहीं इन आयोजनों का आयोजन होता है।
इस फैसले के बाद अब यह देखना अहम होगा कि क्या अन्य राज्यों में भी धार्मिक स्थलों के आसपास इसी तरह के प्रतिबंध लागू किए जाते हैं या नहीं।